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Ana Sayfaya Dön

यह साजिश पहली बारी नहीं बार-बार की जाती है एजेंसियों द्वारा। यह वह लोग हैं जो पंजाब को बसता देखना नहीं चाहते। यह वह लोग हैं जो दलित V/S सिख करना चाहते हैं पंथ को तोड़ना चाहते हैं, फुट की राजनीति करना चाहते हैं एक दूसरे में नफरत डलवा...

107,437 görüntüleme • 1 yıl önce •via X (Twitter)

11 Yorum

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बीएसपी असन्ध विधानसभा1 yıl önce

सख्त से सख्त कार्यवाही होनी चाहिए

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American Stories Network2 yıl önce

What does it take to be the best? 🔥 Witness the struggle, the triumphs, and the raw emotion on Surviving Mann. Follow for more! #SurvivingMann #BestOfTheBest #NavySEALs #SpecOps #TacticalTraining

Vimal Yaduvanshi profil fotoğrafı
Vimal Yaduvanshi1 yıl önce

जय भीम हर जगह युवाओं के साथ धोखाधड़ी हो रही है

Jitendrakumar bsp🐘🐘🐘🐘🐘🐘🐘 profil fotoğrafı
Jitendrakumar bsp🐘🐘🐘🐘🐘🐘🐘1 yıl önce

मनुवादी व्यवस्था चरम सीमा पर हर जगह जंगल राज कायम है

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Er. Anuj Rao1 yıl önce

ऐसे पागलों को बिल्कुल छूट नहीं दी जाए इसको पकड़कर फांसी मुकर्रर की जाए वरना कही किसी और को काट खायेगा

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Harishankar Sharma1 yıl önce

डॉ रितु सिंह जी किसी महान व्यक्ति की मूर्ति को तोड़ने से उसका अपमान नहीं होता, अपमान तब होता है जब बाबा साहब के महान आदर्श महान सामाजिक,संवैधानिक मूल्यों को राजनीतिक दलों द्वारा तिलांजलि देखकर उनके नाम का उपयोग सत्ता स्वार्थ के लिए कर रहे हैं, यह है बाबा साहब का अपमान, इसे रोकिए

Rahul Soni profil fotoğrafı
Rahul Soni1 yıl önce

चाहे ईट से ईट क्यों ना बजनी पड़े हम आपके साथ हैं सिस्टर

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Suman Devi1 yıl önce

जय भीम🙏🙏

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PRAMOD KUMAR1 yıl önce

आज का समय ऐसा हैँ कि जहाँ जहाँ बसपा मजबूती से चुनाव लड़ जीत रही थी वहाँ वहाँ मनुवादी चाल ने चमचे पैदा करके sc st ओबीसी माइनोरती के साथ साथ सर्व समाज के बुद्ध जीवी वर्ग को भारी भरकम गुमराह किया गया हैँ और अभी भी भाजपा कांग्रेस और आप जैसे सपा जैसे खतरनाक मनुवादी दलों से बच कर रहे

प्रमोद राजपूत (सनकी .7 ) 🇮🇳🚩 profil fotoğrafı
प्रमोद राजपूत (सनकी .7 ) 🇮🇳🚩1 yıl önce

🙊🙈🙉

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SN K Rao1 yıl önce

अपने घर में आग लगा कर दूसरे के घर को रोशन करने वाले में से है यह लोग .. अपने घर के हिंदुओं के पास रोजगार नहीं है। बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदुओं को बुलाकर यह रोजगार Dene ki Baat karte हैं।🥱🥱🥱🥱🥱🥱

Benzer Videolar

इस भीड़ को देखिए यह भाड़े पर बुलाई गई भीड़ नहीं है, यह लोग अपने हक अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए दिल्ली अपने अपने संसाधनों से पहुंचे हैं। इनको ट्रेक्टर ट्राली बसों और सरकारी वाहनों में भरकर नहीं लाया गया है यह वह लोग हैं जिनका जमीर जिंदा है, जिनकी अंदर से आत्मा कचोटती है कि नहीं सुन जिस जाति में पैदा हुए हो उसके लिए तुम्हें हक अधिकार मांगने के लिए सड़कों पर संघर्ष करना होगा, वरना यह तानाशाही सरकारें तुमसे जीने तक का अधिकार छीन लेंगी। यह वही लोग हैं जिन्हें अपने बच्चों के भविष्य की चिंता है। यह वही लोग हैं जो समानता के पक्षधर हैं। यह वही लोग हैं जिन्होंने हमेशा देश और धर्म के लिए बलिदान दिया। यह वही लोग हैं जो आज भी देश की अखंडता को अक्षुण्ण रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं। #8March_Ramleela_Maidan

Anuj Agnihotri Swatntra

54,244 görüntüleme • 7 ay önce

आरक्षण का पहला और वास्तविक अधिकार उसी को मिलना चाहिए जो वास्तव में गरीब, वंचित और ज़रूरतमंद है न कि उसे जो पहले से ही संपन्न, प्रभावशाली और संसाधनों से युक्त है।यह लड़ाई आसान नहीं है। यह संघर्ष लंबा है और कठिन भी। हमारे सामने कई लोग विपक्ष के रूप में खड़े हैं, जो यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं। परंतु हमें पूर्ण विश्वास है कि हम इस ऐतिहासिक संघर्ष में पीछे नहीं हटेंगे।आज 150 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में सरकार को 85 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन देने के लिए मजबूर होना पड़ा है। यह आंकड़ा स्वयं इस बात का प्रमाण है कि देश में गरीबी कितनी गहरी और व्यापक है। जब इतनी बड़ी आबादी आज भी बुनियादी आवश्यकताओं पर निर्भर है, तब आरक्षण जैसी नीतियों का उद्देश्य केवल जाति नहीं, बल्कि गरीबी, भूख और असमानता का उन्मूलन होना चाहिए। हमारी लड़ाई उन लोगों के लिए है जो पंक्ति में सबसे अंत में खड़े हैं, जो आज भी अवसर से वंचित हैं, जो वास्तव में गरीब, लाचार और ज़रूरतमंद हैं। गरीबी को मिटाने की यह लड़ाई केवल नीति परिवर्तन की नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समान अवसर और मानवीय गरिमा की लड़ाई है। यह संघर्ष इतिहास में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध होगा। संघर्ष जारी रहेगा। संकल्प अडिग है। और न्याय तक यह यात्रा नहीं रुकेगी। #न्याय #गरीबी #supremecourtofindia #आरक्षण #जातिगतआरक्षण

Reena N Singh

14,228 görüntüleme • 8 ay önce

किसी को बदनाम करने के लिए दोगले लोग अपना जमीर बेच देते हैं, किसी भी व्यक्तिगत मुद्दे को जातिगत रूप दे देते हैं बल्कि जहां वाजिब मुद्दों पर आवाज बुलंद की जाती है वह चीजें नजर नहीं आती 🙏 होता कुछ नहीं है जब सब चीजों से ऊपर उठकर किसी की आवाज बनते हैं तो उसका श्रेय कभी नहीं मिलेगा और वो चाहिए भी नहीं, पर भ्रामक चीज फैलाकर किसी को बदनाम करोगे तो व्यक्ति अपने आवाज उठाने का दायरा सीमित कर लेगा क्योंकि सब कुछ करने के बावजूद भी होना तो बदनाम ही है, दुख उन नकारात्मक सोच के लोगों का नहीं है जो दिन-रात पैर खींचने का काम करते हैं क्योंकि उनकी सोच वहां तक ही सीमित है दुख इस बात का है कि भोले भाले अंजान दोस्त यह नहीं समझते कि हम भाईचारे को सबसे ऊपर मानते हैं, A छो k की तरह दो पैसे लेकर किसी पर कीचड़ नहीं उछालते,, मेरे से ले लेता खर्च पानी वाला कम से कम भाईचारे में तो दरार मत डाल बेटी का बाप....समय करवट जरूर लेता है👍🎉 ये नकारात्मक लोगों के लिए नहीं है क्योंकि उनके मन में नकारात्मकता भरी है वह किसी भी कीमत पर नहीं निकलेगी, यह उन भाइयों के लिए है जो यहां पर नये है और किसी की बातों में आकर सही और गलत में फर्क नहीं समझ पाते🙌

Bhera ram

55,821 görüntüleme • 1 yıl önce

यह जंतर-मंतर का वीडियो है। आज दिल्ली की उमस भरी गर्मी जान ले रही है। उस हाल में वहाँ लोग ठसा-ठस भरे हैं। हाथ का पंखा लेकर नौजवान एक दूसरे को हवा का मरहम लगा रहे हैं। घर में पंखे के नीचे राहत नहीं है, वहाँ तो क्या ही हालत होगी। इस गर्मी में वहां मौजूद लोगों की हालत भी ख़राब हो रही होगी। सोनम वांगचुक को जबरन हटाने के बाद भी धरना कमज़ोर नही हुआ है। लोगों ने आगे आकर इस धरने को थाम लिया है। कौन नेता है, कैसा नेता है, यह सब सवाल पीछे चला गया है। आज पूरे दिन जंतर-मंतर पर भारी भीड़ रही। धरना स्थल तक जाने के लिए लोग कतार में बिना शिकायत खड़े हैं। वहाँ से लौटने वाले लोगों की लाइन राजीव चौक मेट्रो में भी बढ़ती जा रही है। सोमवार को सरकार का इम्तहान है। कल वह मार्च में बाधा डालेगी या मार्च होने देगी। आप नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गुरुग्राम, ग़ाज़ियाबाद इन महानगरों, महाज़िलों में रहने वाले जेन ज़ी, जेन बी जेन एक्स, जेन जो भी, किसी से पूछ लीजिए। क्या यहाँ एक भी सरकारी शैक्षणिक संस्थान है, जिसकी दुनिया छोड़िए, भारत में पहचान हो। जिसकी गुणवत्ता की तारीफ होती हो। जिसमें पढ़ने का सपना देखा जाता हो। एक भी नहीं है। सोचिए लाखों करोड़ों की आबादी के बीच एक ढंग का कॉलेज नहीं है। जहाँ भारत का एस्पिरेशनल क्लास रहता है। वह 12 साल से व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी में डूबा रह गया। बच्चों के लिए अमेरिका का वीज़ा बनवाता रहा लेकिन मुड़ कर नहीं देखा कि उसके शहर में एक भी कॉलेज काम का क्यों नहीं है। इसके कारण मिडिल क्लास के साथ साथ नियो मिडिल क्लास के बच्चे भी घिस रहे हैं, पिस रहे हैं, मिट रहे हैं। जो मेहनत मज़दूरी करने वाला तबका है, जिसे लग रहा है कि पढ़ाई से उसके परिवार का भविष्य बदल सकता है, वह कड़ी मेहनत कर अपने बच्चों को किसी तरह स्कूल और कालेज भेज रहा है। उसे पता ही नहीं है कि वह अपने बच्चों को जिन सपनों के लिए तैयार कर रहा है, वह कब का रौंदा जा चुका है। नोएडा, ग्रेटर नोएडा, ग़ाज़ियाबाद और गुरुग्राम के घरों में काम करने वाली महिलाओं से पूछ लीजिए। हाड़ तोड़ मेहनत कर रही हैं और अपने बेटी की पढ़ाई के लिए फीस भर रही हैं। उनके बच्चे भी ख़ूब मेहनत करते हैं लेकिन सामाजिक पूंजी नहीं होने के कारण उन्हें गाइड नहीं मिल पाता। हर दिन लाखों सपनों की हत्या हो रही है। समाज के इस तबके को अभी शिक्षा से जुड़े मुद्दे की समझ नहीं है, कभी तो उन्हें भी पता चलेगा कि सारा सिस्टम इसी तरह डिज़ाइन किया गया है कि उनके बाद उनकी बेटियाँ भी घरों में काम करती रहेंगी । शिक्षा को बर्बाद किया गया ताकि लाखों लोगों का भविष्य बर्बाद हो सके और वे कम से कम पैसे में काम करने के लिए हमेशा मजबूर रहें। भारत के भविष्य के साथ लंबे समय तक यह धोखा हुआ है। हो सकता है भारत का युवा धर्म की राजनीति में फिर से सनक जाएगा, वह गौरव और पहचान राजनीति में धर्म से पाने लगेगा, यह सब हो सकता है, हो ही रहा है, लेकिन अगले तीस साल में भी वह अपने सपनों को पूरा करने के लिए बड़े स्तर के शैक्षणिक संस्थानों को नहीं पा सकता है। यह लड़ाई आज की नहीं है, अगले पचास साल की है।

ravish kumar

525,753 görüntüleme • 2 ay önce

हम सदन में अपनी बात रखना चाहते हैं। हम देश को बताना चाहते हैं कि जनता के मुद्दों के लिए हम किस स्तर से अपनी बात रख रहे हैं। लेकिन हमें वक़्त ही नहीं दिया जा रहा है। सत्ता पक्ष के लोग कानून के खिलाफ बात करते हैं तो उन्हें मौका दिया जाता है। मैं दुख के साथ कहना चाहता हूं कि जो लोग किसी विषय पर नहीं बोलना चाहते, सिर्फ दूसरों पर टीका-टिप्पणी करने में लगे रहते हैं, उन्हें सरकार और सभापति की ओर से प्रोत्साहन मिल रहा है। मैं बार-बार उठता रहा, लेकिन उन्होंने कभी हमारे लिए गंभीरता नहीं दिखाई। सभापति को किसी का पक्ष नहीं लेना चाहिए। दोनों पक्षों को बराबरी का दर्जा देना चाहिए। एक तरफ नेता सदन को बात करने के लिए मौका दिया जाता है, दूसरी तरफ विपक्ष में बैठे हुए लोगों को मौका ही नहीं मिलता। इस बारे में हमने कई बार अपील की, लेकिन वे सुनने के लिए तैयार ही नहीं हैं। जब हमें बोलने का मौका ही नहीं मिलता तो अपनी बात हम कहां रखें? आज तक ऐसा नहीं हुआ कि जब सत्ता पक्ष ही सदन बंद करने के लिए आगे आता है। हम लोग शांति से सुनना चाहते हैं, डिबेट करना चाहते हैं, लेकिन सत्ता पक्ष के लोग वेल के नजदीक आकर चिल्लाते हैं। सभापति हमेशा कहते हैं कि मैं किसान का बेटा हूं। इस पर मेरा कहना है कि हम भी किसान और मजदूर के बेटे हैं। मैं कभी डरने वाला नहीं हूं। मैं अपने स्वाभिमान के लिए लड़ता रहूंगा। हम लड़ते आए हैं और ये लड़ाई तब तक जारी रहेगी, जब तक हमें समान अधिकार नहीं मिल जाते। संविधान के तहत हमें जो मिलना चाहिए, वह अगर नहीं मिला तो हम लड़ते ही रहेंगे। सदन में जब हम खड़े होते हैं तो पूरा सत्ता पक्ष खड़ा हो जाता है। उन्हें शांत कराना और हमें बोलने देना यह सभापति का काम है और कई सारे लोग यह करते आए हैं। आजकल तो सदन में ऐसा माहौल हो गया है कि टीवी भी उनका, दिखाने वाले भी उनके... यानी सब कुछ उनके कंट्रोल में है। हम जब बोलते हैं, तब दिखाया नहीं जाता। ऐसा पहले नहीं था। पहले सभापति को भी दिखाया जाता था और जो बोलते थे, उनको भी दिखाया जाता था। हमारे लोग ही बाहर पूछते हैं क्या आप सदन में नहीं थे- क्योंकि आप दिखे नहीं। ये सब करके लोगों के बीच ऐसा नजरिया बनाना चाहते हैं कि सदन में विपक्ष के लोग ही हंगामा करते हैं। अगर आप कभी गैलरी में बैठेंगे तो आपको पता चलेगा कि असलियत में हंगामा सत्ता पक्ष कर रहा है। सदन में हमारे बोलने के समय सत्ता पक्ष के लोग हंगामा करने लगते हैं, ऐसे में हमें जोर से बोलना पड़ता है, जो कि हमें पसंद नहीं है, लेकिन ये सब मजबूरी में करना पड़ता है। अगर सत्ता पक्ष अपनी गलतियां नहीं सुधारेगा और दूसरों को बात करने के लिए मौका नहीं देगा, तो लोकतांत्रिक तरीके से सदन कैसे चल पाएगा?

Mallikarjun Kharge

50,714 görüntüleme • 1 yıl önce

यह है सारा, एक बीपीओ कंपनी मे काम करती है, जिनकी रील ने एक कड़वे सामाजिक सच का आईना दिखाया है, जो वायरल है l रात के 2:45 बजे जब दुनिया सो रही होती है, सारा ऑफिस के बाथरूम में होती हैं, नाइट शिफ्ट के दौरान अचानक पीरियड्स आ जाते हैं, वह किसी तरह 'ब्लिंकिट' से पैड्स मंगाकर स्थिति संभालती हैं, ब्रेक में जो एक्स्ट्रा टाइम लगा, उसे पूरा करने के लिए उन्हें बाद में और ज़्यादा जागकर कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, कॉर्पोरेट की दुनिया में शारीरिक दर्द के लिए कोई माफ़ी नहीं होती, इस रील का सबसे चुभने वाला हिस्सा वह है, जहाँ सारा उन लोगों पर बात करती हैं, जो यह तो देखते हैं कि आपके पास पैसा है, आप अच्छा खा-पहन रहे हैं, अच्छी लाइफस्टाइल, घूमना-फिरना भी करती है, लोग तुरंत कम्फर्ट को देखकर नजर लगाने लगते हैं, लेकिन उस कम्फर्ट को कमाने के लिए जो स्ट्रगल किया जाता है, उसे कोई नहीं देखता, किसी की लाइफ को बाहर से देखकर जज करना बंद करें, क्योंकि हर सफलता के पीछे एक कड़ा संघर्ष होता है।

Vishal M. Yadav

143,787 görüntüleme • 19 gün önce

आज नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने जिस प्रकार का कृत्य किया है, वह न केवल अशोभनीय है, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भी विपरीत और अत्यंत निंदनीय है। नेता प्रतिपक्ष जिस गरिमा का पद है, उस पद को भी राहुल गांधी गंभीरता से नहीं लेते हैं, ये उनके व्यवहार में साफ दिखाई दिया। लोकतंत्र में विरोध करना प्रत्येक विपक्ष का अधिकार है, लेकिन विरोध और अराजकता में स्पष्ट अंतर होता है। जब विरोध अपनी मर्यादा की सीमाओं को लांघ देता है, तब वह अराजकता का रूप ले लेता है। हम लगातार कहते आए हैं कि राहुल गांधी आज रचनात्मक विपक्ष की बजाय अराजकता के प्रतीक बन कर रह गए हैं। संसदीय लोकतंत्र में कुछ पद ऐसे होते हैं, जो किसी एक दल के नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के होते हैं। प्रधानमंत्री केवल किसी राजनीतिक दल के नेता नहीं, बल्कि 140 करोड़ देशवासियों द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधि हैं। वे देश की जनता की आस्था, विश्वास और लोकतांत्रिक व्यवस्था के सर्वोच्च प्रतीकों में से एक हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री आवास की ओर जिस प्रकार से माहौल को तनावपूर्ण और अव्यवस्थित बनाने का प्रयास किया गया, वह केवल राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और परंपराओं के प्रति असम्मान का परिचायक है। आज की घटना निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण है। भारत के राजनीतिक इतिहास का एक काला दिन है। हमने भी वर्षों तक विपक्ष में रहकर अपनी भूमिका निभाई है, लेकिन कभी लोकतांत्रिक मर्यादाओं और संसदीय परंपराओं का उल्लंघन नहीं किया। जिन मुद्दों को लेकर हमारे छात्र विषय रख रहे हैं, सरकार उस पर चर्चा करना चाहती है। राहुल गांधी ने स्वयं जो शर्तें रखीं, सरकार ने उन्हें भी स्वीकार किया। लेकिन जब संवाद और समाधान का अवसर आया, तो वे अपनी ही शर्तों और अपने ही रुख से पीछे हट गए। यह उनके राजनीतिक आचरण में अस्थिरता और अपरिपक्वता को स्पष्ट रूप से उजागर करता है। - माननीय राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री Nitin Nabin जी

Sambit Patra

151,890 görüntüleme • 2 ay önce

आज नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने जिस प्रकार का कृत्य किया है, वह न केवल अशोभनीय है, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भी विपरीत और अत्यंत निंदनीय है। नेता प्रतिपक्ष जिस गरिमा का पद है, उस पद को भी राहुल गांधी गंभीरता से नहीं लेते हैं, ये उनके व्यवहार में साफ दिखाई दिया। लोकतंत्र में विरोध करना प्रत्येक विपक्ष का अधिकार है, लेकिन विरोध और अराजकता में स्पष्ट अंतर होता है। जब विरोध अपनी मर्यादा की सीमाओं को लांघ देता है, तब वह अराजकता का रूप ले लेता है। हम लगातार कहते आए हैं कि राहुल गांधी आज रचनात्मक विपक्ष की बजाय अराजकता के प्रतीक बन कर रह गए हैं। संसदीय लोकतंत्र में कुछ पद ऐसे होते हैं, जो किसी एक दल के नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के होते हैं। प्रधानमंत्री केवल किसी राजनीतिक दल के नेता नहीं, बल्कि 140 करोड़ देशवासियों द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधि हैं। वे देश की जनता की आस्था, विश्वास और लोकतांत्रिक व्यवस्था के सर्वोच्च प्रतीकों में से एक हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री आवास की ओर जिस प्रकार से माहौल को तनावपूर्ण और अव्यवस्थित बनाने का प्रयास किया गया, वह केवल राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और परंपराओं के प्रति असम्मान का परिचायक है। आज की घटना निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण है। भारत के राजनीतिक इतिहास का एक काला दिन है। हमने भी वर्षों तक विपक्ष में रहकर अपनी भूमिका निभाई है, लेकिन कभी लोकतांत्रिक मर्यादाओं और संसदीय परंपराओं का उल्लंघन नहीं किया। जिन मुद्दों को लेकर हमारे छात्र विषय रख रहे हैं, सरकार उस पर चर्चा करना चाहती है। राहुल गांधी ने स्वयं जो शर्तें रखीं, सरकार ने उन्हें भी स्वीकार किया। लेकिन जब संवाद और समाधान का अवसर आया, तो वे अपनी ही शर्तों और अपने ही रुख से पीछे हट गए। यह उनके राजनीतिक आचरण में अस्थिरता और अपरिपक्वता को स्पष्ट रूप से उजागर करता है। - श्री Nitin Nabin

BJP

311,285 görüntüleme • 2 ay önce

प्रधानमंत्री के छत्तीसगढ़ दौरे के अगले दिन हसदेव जंगल में पेड़ों की कटाई फिर से शुरू हो गई है। यह संयोग नहीं, यह एक सुनियोजित विनाश है। भाजपा सरकार ने आदिवासी समुदाय के अस्तित्व और पर्यावरण को अदानी की लूट के लिए कुर्बान कर दिया। क्या यही है विकास का मॉडल? हसदेव अरण्य, वह अद्भुत जंगल, जहां प्रकृति ने अपनी पूरी खूबसूरती और जीवन को संजोया है, आज आंसू बहा रहा है। वह भूमि, जो सदियों से आदिवासियों की पहचान रही है, उनकी परंपराओं और आस्थाओं का प्रतीक रही है, आज एक अदानी के हाथों में बेची जा रही है। यह केवल एक जंगल की कटाई नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर और भविष्य की विनाश की शुरुआत है। जब हम इन जंगलों को खोते हैं, तो हम अपनी पहचान, अपने वजूद और हमारे आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन की नींव को खोते हैं। यह एक दर्दनाक सत्य है कि सत्ता के खातिर प्रकृति और आदिवासियों का शोषण किया जा रहा है, और यह हमें हर दिन और भी ज्यादा तोड़ रहा है। यह केवल पेड़ नहीं, बल्कि हमारे सपने, हमारे अधिकार और हमारी ज़िंदगी की जड़ें हैं।

Hansraj Meena

87,676 görüntüleme • 1 yıl önce

रिपोर्टर – जब भारत में fundamental rights छीने जा रहे हैं, तो नॉर्वे भारत पर भरोसा क्यों करे? MEA – हमारे पास गांधी हैं, प्राचीन सभ्यता है, और एक संविधान है जो मौलिक अधिकारों की गारंटी देता है। अगर अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो लोग कोर्ट जा सकते हैं। MEA ने यह क्यों नहीं बताया कि जिस संविधान की वह बात कर रहे हैं, उसके निर्माता के बारे में भारत सरकार के गृह मंत्री कहते हैं ~ “अंबेडकर, अंबेडकर मत करो।” MEA ने यह क्यों नहीं बताया कि वह गांधी की बात कर रहे हैं, लेकिन भारत सरकार गोडसे को पालने वालों के हाथों की कठपुतली मात्र बन गई है! MEA ने यह क्यों नहीं कहा कि संविधान मौलिक अधिकारों की गारंटी देता है, और उसी संविधान को बदलने की बात उनकी सरकार में बैठे कई नेता कर चुके हैं!

Priyanka Bharti

33,700 görüntüleme • 4 ay önce

हाल के दिनों में Pawan Khera 🇮🇳 ಪವನ್ ಖೇರಾ जी द्वारा Himanta Biswa Sarma एवं उनके परिवार से जुड़े जिन गंभीर प्रश्नों और तथ्यों को प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से सार्वजनिक किया गया है, वे केवल राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही की मांग हैं। लोकतंत्र की मूल भावना यही है कि सत्ता में बैठी सरकार जनता और विपक्ष दोनों के प्रति जवाबदेह रहे। विपक्ष का दायित्व है कि वह सवाल उठाए, और सरकार का कर्तव्य है कि वह उन सवालों का तथ्यों के साथ उत्तर दे। किंतु दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब तक उठाए गए किसी भी प्रश्न का स्पष्ट और संतोषजनक उत्तर नहीं दिया गया है। इसके विपरीत, बार-बार यह देखने को मिला है कि प्रश्नों का उत्तर देने के बजाय सत्ता के प्रभाव का उपयोग किया जा रहा है, कभी जांच एजेंसियों का सहारा, कभी प्रशासनिक दबाव, तो कभी पुलिस व्यवस्था में हस्तक्षेप की बातें। यह प्रवृत्ति न केवल चिंताजनक है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत भी है। Indian National Congress का इतिहास इस बात का साक्षी है कि उसने सत्य और लोकतंत्र की रक्षा के लिए हर संघर्ष लड़ा है। यह वही पार्टी है जिसने अंग्रेजों की सत्ता के सामने कभी घुटने नहीं टेके, और आज भी किसी भी प्रकार के दबाव या डर के आगे झुकने वाली नहीं है। पूरी कांग्रेस पार्टी और उसका प्रत्येक कार्यकर्ता, Pawan Khera के साथ मजबूती से खड़ा है। हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि यह लड़ाई व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सत्य, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की लड़ाई है। हम सत्ता से केवल इतना ही अपेक्षित करते हैं कि जो सवाल पूछे गए हैं, उनके उत्तर दिए जाएं। लोकतंत्र में संवाद और जवाबदेही ही सबसे बड़ी ताकत होती है, और हम इसी संवैधानिक मार्ग पर चलते हुए, पूरी मजबूती और धैर्य के साथ इस संघर्ष को अंतिम दम तक जारी रखेंगे।

Alok Sharma

40,705 görüntüleme • 5 ay önce