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यह है गांव की लड़कियां न किसी से डरती है न गांड मरवाने में पीछे हटती हैं

106,363 просмотров • 1 год назад •via X (Twitter)

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धोबी का कुत्ता अथवा धोबी का कुतका? कुछ बरसों से बार-बार अनेक लोगों द्वारा कहा जा रहा है “धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का” कहावत ठीक नहीं है, और सच्ची कहावत है “धोबी का कुतका न घर का न घाट का”। कई लोकप्रिय हिन्दीभाषी अभिनेता और पत्रकार भी डटकर यह कह चुके हैं, जिससे अनेक लोग इस बात को मानने लगे हैं। सच यह है “धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का” ही सच्ची कहावत है। हितोपदेश में एक धोबी के कुत्ते की कथा आती है और सम्भवतः यह कहावत वहीं से आई है। सोलहवीं/सत्रहवीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास ने कवितावली में “धोबी कै सो कूकर न घर को न घाट को” ऐसा प्रयोग किया है। सत्रहवीं शताब्दी में निपट निरंजन ने अपने काव्य में “धोबी का कुत्ता रहा, घर का न घाट का” ऐसा प्रयोग किया है। “धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का” के विविध रूपों के अनेक पुस्तकों और कोशों में प्रमाण हैं। इसके विपरीत “धोबी का कुतका न घर का न घाट का” ऐसी कहावत न किसी ऐताहिसिक साहित्यिक कृति में है और न किसी कोश में। ऐसी कहावत कभी थी ही नहीं, यह केवल सामाजिक संचार शोधशाला (Social Media Research Institute) और काहो विश्वविद्यालय (WhatsApp University) की उपज है।

Nityānanda Miśra (मिश्रोपाख्यो नित्यानन्दः)

87,880 просмотров • 1 месяц назад