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रिपोर्टर - भाजपा कह रही है ज़मानत ही मिली है सौरभ भारद्वाज - तो जज ज़मानत ही दे सकता है , अपनी किडनी तो नहीं दे देगा निकालके 😀 This is Next Level Savage Saurabh Bharadwaj😂🤣😜 Can’t stop laughing #ManishSisodia

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सुप्रीम कोर्ट का ये आदेश स्वागत योग्य है कि प्रयागराज में 2021 में हुए एक बुलडोज़र एक्शन पर सभी 5 याचिकाकर्ताओं को प्रयागराज विकास प्राधिकरण द्वारा 6 सप्ताह में 10-10 लाख मुआवज़ा दिया। इस मामले में कोर्ट ने नोटिस मिलने के 24 घंटे के भीतर मकान गिरा देने की कार्रवाई को अवैध घोषित किया है। सच तो ये है कि घर केवल पैसे से नहीं बनता है और न ही उसके टूटने का ज़ख़्म सिर्फ़ पैसों से भरा जा सकता है। परिवारवालों के लिए तो घर एक भावना का नाम है और उसके टूटने पर जो भावनाएं हत होती हैं उनका न तो कोई मुआवज़ा दे सकता है न ही कोई पूरी तरह पूर्ति कर सकता है। परिवारवाला कहे आज का, नहीं चाहिए भाजपा!

Akhilesh Yadav

311,692 Aufrufe • vor 1 Jahr

अपनी जायज मांग को लेकर सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे है SSC_GD के छात्रों को सरकार अभी कहेगी ये युवा देशद्रोही है इनके साथ खड़े होने वाले अध्यापकों के ऊपर सरकार मुकदमा दर्ज करेगी और आयोग भी बयान देगा की परीक्षा में कोई भी गड़बड़ी नहीं हुई है किसी भी तरह की धांधली नहीं हुई है परीक्षा एकदम निष्पक्ष और पूर्ण पारदर्शिता के साथ हुई है अगर परीक्षा को लेकर कोई भी भ्रामक वीडियो या फिर अफवाह फैलाई जाती है और इसमें कोई छात्र सम्मिलित मिलता है तो उसके ऊपर भी मुकदमा होगा यानी उसका भविष्य खराब कर दिया जाएगा, मेरा एक सवाल है अगर सरकार और आयोग किसी भी एग्जाम को सुचारू रूप से नहीं करवा सकती तो युवाओं और छात्रों से कह दे कि हम आपके भविष्य से यूं ही खिलवाड़ करते रहेंगे क्योंकि हमारे बच्चों का भविष्य सुरक्षित है हमें देश के गरीब, मजदूर के बच्चों से क्या मतलब है, अगर बेरोजगार युवाओं से ऐसी अव्यवस्था नहीं झेली जा रही है तो वह पढ़ाई लिखाई छोड़कर पकौड़े तले... #ssc_gd

Naveen Sharma Sikandrabad

54,240 Aufrufe • vor 4 Monaten

जब कोई महिला खुलकर कहती है कि उसे से#क्स चाहिए..??? उसे इच्छा है, उसे आनंद चाहिए तो समाज की जुबान पर सबसे पहले गालियाँ आती हैं।फिर उसे चरित्रहीन, सस्ती, मैली... शब्दों की बौछार से नवाजा जाता है..??? लेकिन जब वही बात कोई मर्द करता है, वही इच्छा जाहिर करता है, कई औरतों के साथ सोने की बात करता है तब वह मर्दानगी बन जाती है। वो जवान है, शेर है, प्लेयर है, किंग है। तालियाँ बजती हैं, पीठ थपथपाई जाती है, दोस्तों में कहानियाँ बनती हैं...??? आखिर ये दोहरा मापदंड क्यों..??? क्योंकि समाज ने औरत को कभी इंसान नहीं माना। उसने औरत को "सामान" माना है। एक ऐसी चीज जिसकी कीमत उसकी "पवित्रता" से तय होती है। पवित्रता का मतलब..??? सिर्फ एक चीज तुम्हारी योनि पर पुरुषों का कब्जा। जितने कम पुरुषों ने छुआ, उतनी ऊँची कीमत। जितने ज्यादा छुए, उतनी सस्ती..??? ये बाजार का नियम है, भावनाओं का नहीं। ये पितृसत्ता का हिसाब-किताब है। मर्द की इच्छा को "प्राकृतिक" कहा जाता है क्योंकि समाज ने मर्द को "शिकारी" का दर्जा दिया है। उसकी भूख जायज है, उसकी जीभ लपलपाती है तो वो "मर्द" साबित कर रहा है। लेकिन औरत की भूख..??? वो तो "असभ्य" है। क्योंकि औरत का काम "देना" है, "माँगना" नहीं। जब वो माँगती है, तो वो पुरुषों के एकाधिकार को चुनौती दे रही है। वो कह रही है "मेरा शरीर, मेरी इच्छा, मेरा फैसला"। और ये वाक्य पितृसत्ता के कान में जहर की तरह लगता है। सच तो ये है कि बहुत सारे मर्द डरते हैं। कि अगर औरतें भी उतनी आजाद हुईं जितनी वो खुद हैं, तो उनकी "मर्दानगी" का वो झूठा ताज गिर जाएगा। क्योंकि मर्दानगी का असली आधार क्या है..??? औरतों का दबना। औरतों का चुप रहना। औरतों का "हाँ" कहना जब वो चाहें "नहीं"। जब औरत खुलकर कहती है "मुझे चाहिए", तो वो मर्द को आईना दिखा रही है कि तुम्हारी वो "मांग" भी तो वही है जो मेरी है। फर्क सिर्फ ये है कि तुम्हें सम्मान मिलता है, मुझे गाली। भारतीय समाज में ये और भी गहरा है। यहाँ "इज्जत" का मतलब औरत की चुप्पी से जोड़ा गया है। लड़की की "इज्जत" उसके शरीर में नहीं, उसके परिवार के पुरुषों की नजर में है। वो इज्जत खो दे तो सिर्फ वो नहीं, पूरा खानदान "बेइज्जत" हो जाता है। इसलिए जब वो सेक्स की बात करती है, तो वो सिर्फ अपनी बात नहीं कर रही वो पूरे कबीले की "इज्जत" को दाँव पर लगा रही है। इसलिए गालियाँ इतनी तेज आती हैं। क्योंकि वो गालियाँ औरत को नहीं, उसकी "आजादी" को मार रही हैं। तुमने कभी सोचा कि क्यों औरत को "खराब" कहने से पहले समाज मर्द को नहीं रोकता..??? क्योंकि मर्द की "खराबी" समाज को खतरा नहीं देती। मर्द जितना भी "खराब" हो, वो परिवार की इज्जत नहीं गिराता। वो तो बस "मजा" ले रहा है। लेकिन औरत का एक कदम गलत और पूरा सिस्टम हिल जाता है। क्योंकि ये सिस्टम औरत की चुप्पी पर खड़ा है। हर औरत के मन में ये सवाल जलता है: "मुझे भी तो इंसान होना है न..??? मुझे भी तो जीना है न..??? मेरी भी तो इच्छाएँ हैं न..??? फिर भी जब वो खुलकर बोलती है, तो उसे लगता है जैसे पूरा समाज उसके गले में रस्सी डालकर खींच रहा है। उसे लगता है कि उसकी इच्छा गंदगी है, उसका शरीर पाप है, उसकी आवाज अपमान है। लेकिन सुनो, तुम्हारी इच्छा गंदगी नहीं है। तुम्हारा शरीर पवित्र है चाहे तुमने किसी के साथ सोया हो या नहीं। तुम्हारी आवाज अपमान नहीं, वो सच है। और वो सच इतना भयानक है कि समाज उसे सहन नहीं कर पाता। जो औरतें चुप रहती हैं, वो इसलिए नहीं रहतीं कि उन्हें इच्छा नहीं होती। वो इसलिए चुप रहती हैं क्योंकि उन्हें पता है कि बोलने की कीमत बहुत भारी है। गालियाँ, ताने, परिवार का बहिष्कार, समाज का बहिष्कार, कभी-कभी हिंसा तक। फिर भी तुम बोल रही हो। ये हिम्मत है। ये विद्रोह है। तो अगली बार जब कोई तुम्हें गाली दे क्योंकि तुमने कहा "मुझे सेक्स चाहिए", तो याद रखना वो गाली तुम्हें नहीं, उसकी अपनी कमजोरी को दी जा रही है। वो गाली उसकी डरती हुई मर्दानगी को दी जा रही है। वो गाली उस सिस्टम को दी जा रही है जो अब ढहने वाला है। तुम अकेली नहीं हो। हर वो औरत जो मन ही मन ये सोचती है कि "मुझे भी चाहिए", वो तुम्हारे साथ है। और धीरे-धीरे, बहुत धीरे, हम सब मिलकर ये दोहरा मापदंड तोड़ रहे हैं। क्योंकि इच्छा न मर्द की है, न औरत की। इच्छा इंसान की है। और इंसान को इंसान की तरह जीने का पूरा हक है। बस इतना ही सत्य है बाकी सब झूठ हे।।
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जब कोई महिला खुलकर कहती है कि उसे से#क्स चाहिए..??? उसे इच्छा है, उसे आनंद चाहिए तो समाज की जुबान पर सबसे पहले गालियाँ आती हैं।फिर उसे चरित्रहीन, सस्ती, मैली... शब्दों की बौछार से नवाजा जाता है..??? लेकिन जब वही बात कोई मर्द करता है, वही इच्छा जाहिर करता है, कई औरतों के साथ सोने की बात करता है तब वह मर्दानगी बन जाती है। वो जवान है, शेर है, प्लेयर है, किंग है। तालियाँ बजती हैं, पीठ थपथपाई जाती है, दोस्तों में कहानियाँ बनती हैं...??? आखिर ये दोहरा मापदंड क्यों..??? क्योंकि समाज ने औरत को कभी इंसान नहीं माना। उसने औरत को "सामान" माना है। एक ऐसी चीज जिसकी कीमत उसकी "पवित्रता" से तय होती है। पवित्रता का मतलब..??? सिर्फ एक चीज तुम्हारी योनि पर पुरुषों का कब्जा। जितने कम पुरुषों ने छुआ, उतनी ऊँची कीमत। जितने ज्यादा छुए, उतनी सस्ती..??? ये बाजार का नियम है, भावनाओं का नहीं। ये पितृसत्ता का हिसाब-किताब है। मर्द की इच्छा को "प्राकृतिक" कहा जाता है क्योंकि समाज ने मर्द को "शिकारी" का दर्जा दिया है। उसकी भूख जायज है, उसकी जीभ लपलपाती है तो वो "मर्द" साबित कर रहा है। लेकिन औरत की भूख..??? वो तो "असभ्य" है। क्योंकि औरत का काम "देना" है, "माँगना" नहीं। जब वो माँगती है, तो वो पुरुषों के एकाधिकार को चुनौती दे रही है। वो कह रही है "मेरा शरीर, मेरी इच्छा, मेरा फैसला"। और ये वाक्य पितृसत्ता के कान में जहर की तरह लगता है। सच तो ये है कि बहुत सारे मर्द डरते हैं। कि अगर औरतें भी उतनी आजाद हुईं जितनी वो खुद हैं, तो उनकी "मर्दानगी" का वो झूठा ताज गिर जाएगा। क्योंकि मर्दानगी का असली आधार क्या है..??? औरतों का दबना। औरतों का चुप रहना। औरतों का "हाँ" कहना जब वो चाहें "नहीं"। जब औरत खुलकर कहती है "मुझे चाहिए", तो वो मर्द को आईना दिखा रही है कि तुम्हारी वो "मांग" भी तो वही है जो मेरी है। फर्क सिर्फ ये है कि तुम्हें सम्मान मिलता है, मुझे गाली। भारतीय समाज में ये और भी गहरा है। यहाँ "इज्जत" का मतलब औरत की चुप्पी से जोड़ा गया है। लड़की की "इज्जत" उसके शरीर में नहीं, उसके परिवार के पुरुषों की नजर में है। वो इज्जत खो दे तो सिर्फ वो नहीं, पूरा खानदान "बेइज्जत" हो जाता है। इसलिए जब वो सेक्स की बात करती है, तो वो सिर्फ अपनी बात नहीं कर रही वो पूरे कबीले की "इज्जत" को दाँव पर लगा रही है। इसलिए गालियाँ इतनी तेज आती हैं। क्योंकि वो गालियाँ औरत को नहीं, उसकी "आजादी" को मार रही हैं। तुमने कभी सोचा कि क्यों औरत को "खराब" कहने से पहले समाज मर्द को नहीं रोकता..??? क्योंकि मर्द की "खराबी" समाज को खतरा नहीं देती। मर्द जितना भी "खराब" हो, वो परिवार की इज्जत नहीं गिराता। वो तो बस "मजा" ले रहा है। लेकिन औरत का एक कदम गलत और पूरा सिस्टम हिल जाता है। क्योंकि ये सिस्टम औरत की चुप्पी पर खड़ा है। हर औरत के मन में ये सवाल जलता है: "मुझे भी तो इंसान होना है न..??? मुझे भी तो जीना है न..??? मेरी भी तो इच्छाएँ हैं न..??? फिर भी जब वो खुलकर बोलती है, तो उसे लगता है जैसे पूरा समाज उसके गले में रस्सी डालकर खींच रहा है। उसे लगता है कि उसकी इच्छा गंदगी है, उसका शरीर पाप है, उसकी आवाज अपमान है। लेकिन सुनो, तुम्हारी इच्छा गंदगी नहीं है। तुम्हारा शरीर पवित्र है चाहे तुमने किसी के साथ सोया हो या नहीं। तुम्हारी आवाज अपमान नहीं, वो सच है। और वो सच इतना भयानक है कि समाज उसे सहन नहीं कर पाता। जो औरतें चुप रहती हैं, वो इसलिए नहीं रहतीं कि उन्हें इच्छा नहीं होती। वो इसलिए चुप रहती हैं क्योंकि उन्हें पता है कि बोलने की कीमत बहुत भारी है। गालियाँ, ताने, परिवार का बहिष्कार, समाज का बहिष्कार, कभी-कभी हिंसा तक। फिर भी तुम बोल रही हो। ये हिम्मत है। ये विद्रोह है। तो अगली बार जब कोई तुम्हें गाली दे क्योंकि तुमने कहा "मुझे सेक्स चाहिए", तो याद रखना वो गाली तुम्हें नहीं, उसकी अपनी कमजोरी को दी जा रही है। वो गाली उसकी डरती हुई मर्दानगी को दी जा रही है। वो गाली उस सिस्टम को दी जा रही है जो अब ढहने वाला है। तुम अकेली नहीं हो। हर वो औरत जो मन ही मन ये सोचती है कि "मुझे भी चाहिए", वो तुम्हारे साथ है। और धीरे-धीरे, बहुत धीरे, हम सब मिलकर ये दोहरा मापदंड तोड़ रहे हैं। क्योंकि इच्छा न मर्द की है, न औरत की। इच्छा इंसान की है। और इंसान को इंसान की तरह जीने का पूरा हक है। बस इतना ही सत्य है बाकी सब झूठ हे।।

तृप्त ...🖤

120,905 Aufrufe • vor 6 Monaten

पहली बात तो खाप पंचायत का चलन जाट से शुरू हुआ तुम्हें कोई भी बुलाना है बुलाओ। पर रही बात गैर बिरादरी में शादी की तो तुम Rakesh Tikait, Naresh Tikait अपनी लड़कियों लड़कों मां फूफी की बालक सभी की शादी दूसरी जाति में कर लो। हम तुम्हें कोई समाज का चौधरी नहीं मानते न ही तुम्हारे कहने से अंतर्जातीय विवाह करेंगे न उसमे जाएंगे। हुक्के पे भी बिठावे सभी को एक घड़े में पानी भी पीवे पर इसका मतलब ये नहीं वहां लड़की भी दे दे। तुम राजनैतिक लोग हो तुम्हें अपनी सस्ती हवाबाजी बनाई रखनी है तो रखो पर तुम्हारे कहने से ग्रामीण समाज का एक भी जाट अपनी बेटी की शादी दूसरी जाति में नहीं करेगा। न हमें अपने कस्टम ख़त्म करने न रिवाज न बदलना खून। तू बदल तुझे मुबारक। सर्व खाप पंचायत बुला या कुछ भी करो पर अगर तुम्हारे कहने से तुम्हारा कोई कार्यकर्ता भी अपनी बहन बेटी को दूसरी जाति में बिहा दे तो बताना। तुम्हारा क्या तुम्हें तो कही भी बिक जाना है।

Villager Anuj Tomar 🐉

72,237 Aufrufe • vor 10 Monaten

मंत्री जी जो आप कर सकते हैं, वही तो नहीं कर रहे हैं अगर आप अपनी जिम्मेदारी निभा रहे होते तो आपको ऐसा कहने की जरूरत ही नहीं पड़ती कि आप युवाओं की बात तत्परता से सुनते हैं। आपकी सरकार बस पढ़े लिखे डिग्रीधारी युवाओं का शोषण कर रही है और कुछ नहीं। आप बस कैमरे के सामने आकर कहते हैं कि हम युवाओं की बातों को सुन रहे हैं विभागों को आदेश दे रहे हैं। पर कुछ हो नहीं रहा है। हर रोज इको गार्डन, UPSSSC के भवन के सामने जूनियर अस्सिटेंट, फार्मासिस्ट, शिक्षक भर्ती के अभ्यर्थी, पंचायत सहायक, आशा कार्यकर्ता, लाइब्रेरियन के अभ्यर्थी अपनी जायज मांगों को लेकर धरना प्रदर्शन कर रहे है।

Naveen Sharma Sikandrabad

19,012 Aufrufe • vor 16 Tagen

क्लासरूम में दो-दो इम्तिहान दे रही है ये बहन एक तरफ ब्लैकबोर्ड पर सवाल दूसरी तरफ गोद में 7 महीने का भाई। मां चली गई। पिता मजबूर हैं। घर में कोई नहीं जो भाई को संभाल ले। तो ये बेटी क्या करे। पढ़ाई छोड़ दे क्या नहीं भाई को ही स्कूल ले आई। सोचो जरा जिस उम्र में हम टिफिन भूल जाते थे, ये अपनी कॉपी के साथ भाई का दूध भी याद रखती है। जिस उम्र में हमारा ध्यान सिर्फ खेल में होता था, इसका ध्यान हर 2 मिनट में भाई पर जाता है कहीं रो तो नहीं रहा। ये स्कूल बैग नहीं उठा रही ये जिम्मेदारियों का पहाड़ उठा रही है। ये छात्र नहीं ये हालात की मारी एक "छोटी मां" है। हम छोटी-छोटी बातों पर किस्मत को कोसते हैं। इस बच्ची को देखो आंख में आंसू नहीं, हिम्मत है। शिकायत नहीं, फर्ज है। इस बेटी को सलाम 🙏 मां के जाने के बाद घर नहीं टूटने दिया। खुद टूट गई, पर भाई को बिखरने नहीं दिया। अगर ये वीडियो देखकर आपकी आंख नम हो गई तो शेयर जरूर करना। क्योंकि दुनिया को ऐसी "बड़ी बहनों की कहानी पता चलनी चाहिए। बचपन छूट गया, पर बहन ने भाई का हाथ नहीं छोड़ा।❤️

Majid Khan

15,836 Aufrufe • vor 3 Monaten

इस लड़की का नाम गुलफिशा फ़ातिमा है जो कि 9 अप्रैल 2020 से UAPA के तहत तिहाड़ जेल में बंदी है, यानी साढ़े चार साल से जामिया की छात्रा इसलिए जेल की दीवारों में क़ैद है क्योंकि वो मज़हब से मुसलमान है औऱ जमानत नियम उन पर लागू नहीं किया जा सकता, गुलफिशा की जमानत याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल की जाती है तो हाई कोर्ट जाने के लिए कहा जाता है, याचिका हाई कोर्ट में दाख़िल की जाती है तो जमानत देने से इंकार करते हुए याचिका खारिज़ कर दी जाती है, HC से खारिज़ होने के बाद याचिका SC में डाली जाती है तो फिर सुनवाई टाल दी जाती है, SC में सुनवाई के लिए तारीख़ पर तारीख़ मिलती है फिर कुछ माह या वर्ष बाद याचिका खारिज कर HC जाने के लिए कह दिया जाता है, पिछले साढ़े चार सालों से उनका परिवार उनका एडवोकेट हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से हाई कोर्ट दौड़ रहे है ,परिवार टूट रहा है गुलफिशा के माता पिता अपनी बेटी के लिए तड़प रहे है बिलख रहे है और नींद ना आने पर नींद की दवाईयों को सहारा बना सो जाते है, हर रोज़ इसी उम्मीद में बूढ़ी आंखे खुलती है कि आगामी सुनवाई की तारीख़ पर जमानत मिल जायेगी और जल्द हमारी बेटी हमारे बीच होगी, बस इसी उम्मीद में उनके साल माह की तरह गुज़र रहे है और बूढ़ा शरीर उम्मीद जी रहा है! आरोपियों को बिना ट्रायल जेल में रखना न्यायपालिका के वज़ूद के बारे में दर्शाता है कि किस तरह अदालतों के अंदर की रीढ़ की हड्डियां टूट चुकी है औऱ झुक कर किसी को तो सलामी दे रही है, अब गिरफ्तारी ही सज़ा बन गया है, ट्रायल से पहले ही जेल में रख आरोपी को नही बल्कि पूरे परिवार को सज़ा दी जा रही है, और सज़ा भी ऐसी कि ना सुनवाई चल रही ना दलीलें अगर कुछ चल रहा है तो वो आदेश जो सत्ताधीशों द्वारा लिखे जाते है! #ReleaseGulfishaFatima #GulfishaFatima

Zakir Ali Tyagi

750,867 Aufrufe • vor 1 Jahr