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Ana Sayfaya Dön

वो दोस्त की माँ थी मगर दिल ने सिर्फ मोहब्बत देखी 😅

42,186 görüntüleme • 2 ay önce •via X (Twitter)

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“जब मैं इस दुनिया में न रहूं, तब मेरी अंतिम यात्रा में रोना मत, बल्कि ढोल-नगाड़ों के साथ नाचते-गाते, मुस्कुराते हुए मुझे विदा करना। मेरे अर्थी के आगे तुम झूमना, जैसे मैं कोई जश्न में जा रहा हूं। मेरे जाने को मातम नहीं, एक उत्सव की तरह मनाना।” ये शब्द थे मंदसौर ज़िले के जावासिया गांव के सोहनलाल जैन के – एक ऐसे इंसान, जो दो वर्षों से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे, लेकिन जीवन के अंत समय तक भी उनके चेहरे पर मुस्कान थी और दिल में एक अलग ही सोच। जब तबीयत ने साथ छोड़ना शुरू किया, तब उन्होंने अपने बेहद करीबी मित्र अंबालाल प्रजापत को एक पत्र लिखा। उस पत्र में कोई शिकवा नहीं था, कोई डर नहीं था, सिर्फ़ एक आखिरी इच्छा थी “मुझे विदा करना हो तो रोना मत, नाचना… मेरी आत्मा तभी शांति पाएगी।” और जब वो दिन आया… अंबालाल ने दोस्त की आखिरी ख्वाहिश को दिल से निभाया – वो नाचा, झूमा, हँसा… और आँसू छुपाकर, दिल भारी करके, उस दोस्त को पंचतत्व में विलीन होते देखा। “खाली हो गया वो… लेकिन दोस्ती नाचती रही, यारी झूमती रही, वो मिट्टी बना – मगर रिश्ता अमर हो गया।” यह सिर्फ़ एक अंतिम यात्रा नहीं थी, यह एक दोस्त की जिंदगी से मौत तक की जिंदादिली की मिसाल थी – जहाँ विदाई में आंसुओं की नहीं, जज़्बातों की बारिश हुई।

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