Video wird geladen...

Video konnte nicht geladen werden

Zur Startseite

सीता राम चरन रति मोरें अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें!🙏🪷

16,968 Aufrufe • vor 1 Jahr •via X (Twitter)

10 Kommentare

Profilbild von 🖤⃝𝐒𝐨𝐧𝐮
🖤⃝𝐒𝐨𝐧𝐮vor 1 Jahr

Jay Jay Shri Ram

Profilbild von 🐯
🐯vor 1 Jahr

Discerning analysis, fluently structured and effectively communicated.

Profilbild von BanarasiaQueeN💛
BanarasiaQueeN💛vor 1 Jahr

श्री राम जी की कृपा हम सभी पर बनी रहे जय श्री राम

Profilbild von Pushpa Jakhar 
Pushpa Jakhar vor 1 Jahr

सुबह का नमस्कार दोस्तों 🙏🏼 🌅 सुप्रभात मित्रों 🌄

Profilbild von Vicky Yadav
Vicky Yadavvor 1 Jahr

जय श्रीराम जय हनुमान!♥️🚩🙏

Profilbild von pooja bhukhar
pooja bhukharvor 1 Jahr

Jai shree Ram Jai bajrang bali

Profilbild von विवेक मिश्रा
विवेक मिश्राvor 1 Jahr

सीता राम सीता राम

Profilbild von प्राशी हिंदुत्ववादी🚩🚩
प्राशी हिंदुत्ववादी🚩🚩vor 1 Jahr

Jai jai shree Ram

Profilbild von Arvind Kumar
Arvind Kumarvor 1 Jahr

जय श्री राम जय बजरंगबली की जय हो।

Profilbild von NITISH YADAV
NITISH YADAVvor 1 Jahr

Jai shree Ram ji

Ähnliche Videos

सबमें है सीता राम 🙏....
0:45

Sensitive content

सबमें है सीता राम 🙏....

SANATAN

59,782 Aufrufe • vor 1 Jahr

जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की॥ ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥ अर्थ : जनक की बेटी, जगत् की माता और करुणानिधान की अत्यन्त प्यारी श्रीजानकीजी के दोनों चरण कमलों को मनाता हूँ । ध्यान करता हूँ : जिनकी कृपा से निर्मल मति की प्राप्ति हो । व्याख्या : जनक सुता और जानकी ये दोनों शब्द एक अर्थ के बोधक मालूम पड़ते हैं, पर यह बात नहीं है । गायत्रीसहस्रनाम में पठित जानकी नाम सदा से ही गायत्री माता का है । अत: जानकी कहकर ब्राह्मणों की इष्ट देवता गायत्री देवी कहा । जनक सुता कहकर उनका दिव्य जन्म कहा । जगजननि कहकर उनका सावित्री होना कहा । यथा : "आदिसक्ति जेहि जग उपजाया । सो अवतरिहि मोरि यह माया" । "अतिसय प्रिय करुना निधान की" कहकर उनका जगत्पिता : सविता : से अनादि सम्बन्ध सूचित किया । यथा : "प्रभा जाइ कहँ भानु बिहाई । कहँ चन्द्रिका चन्द तजि जाई" । उस महामाया के दोनों चरणों का ध्यान ग्रन्थकार करते हैं। बोलने में तो केवल चरणकमल कहने से काम चल जाता है, पर ध्यान करने में तो बड़ी सावधानी की आवश्यकता है । अतः "जुग पद कमल मनावों" कहते हैं । ये ही बुद्धि की प्रेरणा करनेवाली देवी हैं । अतः निर्मल मतिप्राप्ति के लिए प्रार्थना करते हैं । अथवा श्रेय और प्रेय दोनों की प्राप्ति के लिए दोनों चरणों का ध्यान करते हैं । उपासना करने से यही देवी बुद्धिरूप में परिणत होकर मृत्युजाल से छुड़ा देती है । जब यह देवी प्रसन्न होती हैं तब सूर्य की भाँति चित्ताकाश में विचाररूपता को प्राप्त होती हैं । सबके हृदय में निवास करनेवाली इस देवी की कृपा हो, यही सबसे अधिक परम साधन है । पुनि मन बचन कर्म रघुनायक। चरन कमल बंदउँ सब लायक॥ राजीवनयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुखदायक॥ अर्थ : फिर मैं मन, वाणी और कर्म से सब लायक रघुनायक के चरणकमलों की वन्दना करता हूँ। जो कमलनयन धनुष बाण धारण किये हुए भक्तों की विपत्ति को दूर करनेवाले तथा सुख के देनेवाले हैं । व्याख्या : रघुनायक पद से रघुकुल में अवतार कहा । सबलायक पद से सर्व- शक्तिमान् कहा तथा चक्रवर्तीजी की अत्यन्त प्रीति कही । यथा : "भये राम सब विधि सब लायक" । "राजिव नयन" से सुन्दरता तथा कृपालुता कही । "धरे धनु सायक" पद से काल का भी नियन्ता ब्रह्म कहा । यथा : "लव निनेष परमान जुग वर्ष कल्प सर चंड । भजसि न मन तेहि राम कहँ काल जासु कोदंड" । "भगत विपति भंजन" पदसे दुष्कृतों का विनाश कहा और "सुखदायक" पद से साधुपरित्राण तथा धर्म- संस्थापन कहा । इसी चौपाई में सातों काण्डों की कथाओं का बीज निहित है । यथा रघुनायक पद से जन्म, नामकरण, मुण्डन, यज्ञोपवीत तक की कथा इङ्गित की । सबलायक पद से मखरखवारी, अहल्योद्धार, पिनाकभङ्ग, सीता-परिणय, पिताजी के यौवराज्य देने तक की कथा द्योतित की। राजिवनयन से बनवास । यथा : "राजिव लोचन राम चले तजि बाप को राज बटाऊ की नाईं "। तथा मुनियों पर कृपा कही । "धरे धनु सायक" पद से "निसिचर हीन करौं महि" ऐसी प्रतिज्ञा करना कहा । "भगत विपति भंजन" पद से सूर्पणखा-नासिकाछेदन से रावणवध तक द्योतित किया । सुख दायक पद से राज्य कहा अर्थात् "राम राज बैठे त्रैलोका । हर्षित भये गये सब सोका "। तक की कथा ध्वनित की । इसी चौपाई में अवतार के सब कारण भी कहे । यथा : असुर मारि : भगत विपति भंजन : थापहि सुरन्ह : सुख दायक : राखहि निज स्रुति सेतु : रघुनायक । जग विस्तारहि विसद जस: सब लायक : राम जन्म कर हेतु । दो. गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न। बंदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न॥ अर्थ : वाणी और अर्थ, जल लहर जैसे अलग-अलग कहे जाते हैं पर अलग- अलग नहीं हैं, वैसे ही सीताराम पद है उनकी मैं वन्दना करता हूँ, जिनको दुःखी अत्यन्त प्यारे हैं । व्याख्या : सीताजी की उपमा गिरा से, रामजी की अर्थ से, फिर सीता जी की उपमा वीचि (तरङ्ग) से और रामजी की जल से है एवं एक वार सीता को पहिले कहा दूसरी बार राम को पहिले कहा । अभेदार्थ दृढ़ करने के लिए । सीता राम हैं और राम ही सीता हैं । गिरा(१) अर्थ से मानसिक अभेद कहा और जल वीचि से तात्त्विक अभेद कहा। सीताराम पद कहकर यह दिखलाया कि वह ब्रह्म पद एक है । उसीका राम नाम से पुंलिङ्ग में व्यवहार होता है और सीता नाम से स्त्रीलिङ्ग में व्यवहार होता है । इसलिए कहने मात्र में भेद है, भेद कुछ भी नहीं । अथवा यह दिखलाया कि चरण में भी भेद नहीं । जो चिह्न रामजी के दक्षिण पद में हैं वे ही चिह्न सीताजी के वाम पद में हैं और जो चिह्न सीताजी के दक्षिण पद में हैं वे ही चिह्न रामजी के वाम पद में हैं । जिन्हहिं परम प्रिय खिन्न कहकर रुचि में भी अभेद दिखलाया । (१) "एकस्यैवात्मनो भेदी शब्दार्थवत्पृथक् स्थितौ । प्रकाशकः प्रकाश्यस्व कार्यकारणरूपता ।" ~ वाक्यपदीये । अर्थ : परमार्थं दृष्टि से शब्द और और आत्मा ही अर्थ है । ब्रह्म प्रकाशक है और ब्रह्म ही प्रकाश्य है। अर्थं अभिन्न हैं । आत्मा ही शब्द । व्यावहारिक दृष्टि से शब्द और अर्थ प्रकाशक प्रकाश्य रूप से कार्यकारणभाव में उपलब्ध होते हैं । इसीलिए कहा हैं कि : "दाम्पत्यं नैव लोकेऽस्मिन् विद्यते नैव लभ्यते । अलौकिकं हि दाम्पत्यं विद्यते रामसीतयोः ।" अर्थ : न ऐसा स्त्री पुरुषभाव न लोक में है और न पाया जाता है, रामसीता का दाम्पत्य अलौकिक है । #रामचरितमानस #बालकाण्ड #ramcharitmanas #hinduism #ramayana #sanatana #SanatanaDharma

रामचरितमानस-काशी

236,770 Aufrufe • vor 3 Jahren

मैं प्रदोष सुरेश चव्हाणके 🙏, अपने पत्रकारिता की शुरुवात श्री राम जी के वन गमन पथ से करने जा रहाँ हूँ। नाम होगा.. #रामराज्य_युवा_यात्रा श्रीलंका से अयोध्या, 15 दिसंबर से 19 जनवरी *यात्रा के मुख्य उद्देश* १- युवाओं में श्रीराम जी के चरित्र का निर्माण व संस्कारों को बढ़ावा देना। २- समाज के अंदर के रावणों का अंत करना। ३- परिवारों में प्रबोधन से एकता व आत्मीयता का निर्माण करना। ४- राष्ट्र-धर्म भक्ति को बढ़ावा देना। ५- वनवास के समय श्री राम जी को सहयोग करने वाले वनवासियों का धन्यवाद करना।(*क्योंकी प्रभु श्रीराम जी रावन से युद्ध जीतने के बाद अयोध्या पुष्पक विमान से गए थे इसलिए वनवासियों को मिल नहीं पाए थे*) इस यात्रा का प्रसारण सुदर्शन न्यूज़ चैनल सहित कई न्यूज़ चैनलों, प्रादेशिक व धार्मिक चैनलों के साथ ही सभी सोशल मीडिया पर भी किया जायेगा। जाने माने यूट्यूबर भी यात्रा में सहभागी हो कर इसे करोड़ों लोगों तक पहुँचायेंगे। यह यात्रा 15 दिसंबर को श्री लंका के अशोक वाटिका से प्रारंभ होगी। 17 दिसंबर को रामेश्वरम से गाड़ियों के साथ आगे बढ़ेगी। श्रीराम जी, सीता माता जी व लक्ष्मण जी वनवास में जिस वर पथ से गये थे उस पथ से 19 जनवरी को अयोध्या में पहुँचेगी, जहां 24 जनवरी तक वन गमन के तीर्थों की भव्य प्रदर्शनी लगाई जायेगी। 44 दिवस व 10 हज़ार किलोमीटर के मार्ग में 8 राज्य, कई नगरों व गाँवों में विभिन्न कार्यक्रम होंगे, जिसमें उस स्थान के वीडियो बना कर दिखाना, पूजा पाठ, भजन, प्रवचन,सत्संग से संदेश दिया जाएगा। *इस युवा यात्रा का नेतृत्व मुझे करने सौभाग्य व अवसर राम ने मुझे दिया है, मेरे साथ में वनवास पथ पर 18 बार पैदल जाने वाले डॉ रामअवतार शर्मा जी व साधु संत और मीडिया के लोगो के साथ कई धार्मिक विभूतियाँ भी रहेंगी*। यह यात्रा कई मायनों में इतिहास बनाऐगी। अब तक इस प्रकार की यात्रा का आयोजन कभी नहीं हुवा हैं। *यह #RamRajyaYuvaYatra येतहासिक होगी। आप भी सुझाव दे। प्रेरणा Narendra Modi ji, मार्गदर्शन Dr. Suresh Chavhanke “Sudarshan News” ji यात्रा का वार रूम WhatsApp 📲8750775777 / ☎️01204999994

Pradosh Chavhanke 'Sudarshan News'

475,047 Aufrufe • vor 2 Jahren

21, 22 और 23 नवंबर को लगातार तीन दिन पहले दिल्ली में आयोजित साहित्य आज तक में सुबह ‘अपने-अपने राम’ के माध्यम से मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का गुणगान करने का सौभाग्य मिला, और फिर शाम को अपनी कर्मभूमि पिलखुवा में राघवेंद्र सरकार के यशोगान का भी सुयोग बना। एक ही दिन में दो-दो बार, लगातार तीन दिन रघुनंदन की इतनी कृपा बरसे, ऐसा बिना ईश्वर की विशेष योजना के संभव नहीं हो सकता था। परिवार, परिचितों, शुभचिंतकों और प्रशंसकों ने स्नेहपूर्वक आग्रह किया कि लगातार तीन दिन, प्रतिदिन दो बार बोलना स्वास्थ्य और सामर्थ्य पर भारी पड़ सकता है। परंतु जब दशरथनंदन का आदेश हो, जब सियावर रामचंद्र स्वयं मार्ग प्रशस्त कर रहे हों, तब किसी अन्य आग्रह पर मन टिके भी कैसे? उन तीनों दिन ऐसा लगता रहा मानो वे अदृश्य रूप से साथ चल रहे हों। मंच पर, यात्रा में और अंतर्मन में हमेशा राघवेंद्र सरकार को महसूस किया। मुझे स्वयं नहीं पता कि ब्रह्ममुहूर्त में जागरण से लेकर रात्रि के अंतिम प्रहर में घर वापसी तक, मेरी कितनी ऊर्जा लगी। मैं स्वयं यह नहीं समझ पाया कि मेरे भीतर ऐसी धैर्य-शक्ति, ऐसा उत्साह और ऐसी स्थिरता कहां से आई। परंतु शायद यही तो रघुवीर की अनुकंपा है, जब वे हाथ थाम लेते हैं, तो थकान भी उनके चरणों में विश्राम खोज लेती है। उन तीन दिनों में मैंने जो अनुभव किया है, उसे शब्दों के माध्यम से व्यक्त करना संभव नहीं है। बस इतना ही लिख सकता हूं कि इस अनुग्रह के लिए मेरे राघव का कोटि-कोटि आभार🙏🚩 जय श्रीराम।

Dr Kumar Vishvas

11,665 Aufrufe • vor 8 Monaten