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सारा भारत डोल रहा हैं, पुरानी पेंशन पेंशन बोल रहा हैं ! मंजिलों की फितरत है कि वह चल कर नहीं आती। वीर तुम बढ़े चलो ,धीर तुम बढ़े चलो!! #पेंशनशंखनादमहारैली #WeWantOPS #पुरानी_पेंशन_बहाल_करो #RestoreOldPension NMOPS - National Movement For Old Pension Scheme Vijay Kumar Bandhu Pankaj Maurya Pratapsingh Suryawansh

10 Kommentare

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Mahendra Kumarvor 2 Jahren

@NmopsInd @vijaykbandhu @Mauryapankaj79 @SuryawaSingh पुरानी पेंशन बहाल करो

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rahul sharmavor 2 Jahren

@NmopsInd @vijaykbandhu @Mauryapankaj79 @SuryawaSingh सारा भारत डोल रहा हैं, पुरानी पेंशन पेंशन बोल रहा हैं ! मंजिलों की फितरत है कि वह चल कर नहीं आती। वीर तुम बढ़े चलो ,धीर तुम बढ़े चलो!!

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A Srivastavavor 2 Jahren

@NmopsInd @vijaykbandhu @Mauryapankaj79 @SuryawaSingh #OPS #NPS_QUIT_INDIA #NPSनिजीकरणभारतछोड़ो #पुरानी_पेंशन_बहाल_करो #पुरानी_पेंशन_हक_हमारा #RestoreOldPension #WeWantOPS #VoteforOPS #MissionOPS @vijaykbandhu @BBCHindi @Aamitabh2 @PMOIndia @narendramodi @un @ANI @ABPNews @aajtak @ArvindKejriwal @RahulGandhi @DainikBhaskar

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Pankaj Kumarvor 2 Jahren

@NmopsInd @vijaykbandhu @Mauryapankaj79 @SuryawaSingh Only ops

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आदित्य शुक्ला (मास्साब)vor 2 Jahren

@NmopsInd @vijaykbandhu @Mauryapankaj79 @SuryawaSingh जो पेंशन की बात करेगा, वही देश पर राज करेगा

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Dr.Dharmendra Kumar Mishravor 2 Jahren

@NmopsInd @vijaykbandhu @Mauryapankaj79 @SuryawaSingh Ops जिंदाबाद

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Kumar Babloovor 2 Jahren

@NmopsInd @vijaykbandhu @Mauryapankaj79 @SuryawaSingh #रामलीला_मैदान #OPS

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Manoj Kumar Guptavor 2 Jahren

@NmopsInd @vijaykbandhu @Mauryapankaj79 @SuryawaSingh #OPS

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Rammyvor 2 Jahren

@NmopsInd @vijaykbandhu @Mauryapankaj79 @SuryawaSingh Support

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ROHIT SINGHvor 2 Jahren

@NmopsInd @vijaykbandhu @Mauryapankaj79 @SuryawaSingh #ओल्ड_पेंशन_योजना_रद्द_रहना_चाहिए

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भारत के पत्रकारों से हजार गुना अच्छा मैं पाकिस्तान के पत्रकारों को समझता हूं जो सीधा और तीखा सवाल पूछते हैं पाकिस्तान के इस पत्रकार ने आतंकी सैयद सलाहुद्दीन से पूछा कि आप हर भाषण में जिहाद जिहाद कहते हैं युवाओं को भड़कते हैं कश्मीर के लिए जिहाद करो आपके पांच बेटे हैं तीन डॉक्टर हैं दो इंजीनियर एक इस्लामाबाद में प्रैक्टिस कर रहा है कोई दुबई में है कोई लंदन में है आपके खुद के बेटे कश्मीर के लिए जिहाद में क्यों नहीं गए? अपने अपने बेटों को जिहाद में क्यों नहीं भेजा? 5 मिनट तक आतंकी सैयद सलाउद्दीन की बोलती बंद हो गई वह बोल नहीं सका क्या अपने भारत में किसी पत्रकार द्वारा महमूबा मुफ्ती से यह सवाल पूछा कि तुम रहती हो हमें कश्मीर में शरिया चाहिए तुम्हे इस्लामी शासन चाहिए तुम्हारी दोनों बेटियां मुंबई में बॉलीवुड में है कभी हिजाब नहीं पहनती हुर्रियत के तमाम नेता जिनके बेटे अमेरिका ब्रिटेन दुबई में वेल सेटल है उनसे किसी पत्रकार ने क्यों नहीं पूछा कि तुम यहां कश्मीरी युवकों की जिंदगी नरक करके अपने बेटों को विदेश में सेटल कर दिए हो

🇮🇳Jitendra pratap singh🇮🇳

161,368 Aufrufe • vor 2 Jahren

सौभाग्यशाली हैं वे जिनको प्रेम की पीड़ा पकड़ती है..!❣️ क्योंकि वे धीरे—धीरे भीतर से अमीर हो जाते हैं। प्रेम खूब काटता है; जैसे मूर्तिकार पत्थर को काटता है, छैनी लेकर, हथौड़ा लेकर लगा रहता है पत्थर पर। निश्चित ही पत्थर रोता होगा और पत्थर सोचता होगा: जो पत्थर नहीं मूर्ति बनाए जा रहे हैं, बड़े धन्यभागी हैं। मगर यह ऊपर की बात है। जिस दिन मूर्ति बन जाएगी, उस दिन पता चलेगा कि जो पत्थर मूर्ति बन गया उसमें कुछ घटा। ऐसा हुआ कि पश्चिम का एक बड़ा मूर्तिकार माइकलएंजलो एक दिन संगमरमर, पत्थर बेचने वाले की दुकान पर गया। कोई पत्थर खरीदना चाहता था—कोई मूर्ति गढ़ने के लिए। कोई पत्थर उसे जंचा नहीं। एक पत्थर सड़क के उस तरफ, दुकान की दूसरी तरफ पड़ा था किनारे पर रास्ते के; वह कई दिन से पड़ा था। माइकलएंजलो ने कहा: यह पत्थर किसका है? उस दुकानदार ने कहा: यह मेरा ही है; लेकिन यह इतना अनगढ़ है कि इसे कोई लेता भी नहीं। वर्षों हम इसको रखे रहे, जगह ही घेरे था; हमने इसे फेंक दिया। इसमें तुम्हारी उत्सुकता है, इसे तुम मुफ्त में ले जा सकते हो। हम चाहते हैं जगह खाली हो। माइकलएंजलो वह पत्थर ले गया। उसने उस पर तीन साल मेहनत की। उसमें उसने मरियम और जीसस को उभारा। कुछ दिन पहले तुमने अखबारों में खबर पढ़ी होगी कि एक पागल आदमी ने वैटिकन के चर्च में जाकर जीसस की एक मूर्ति तोड़ दी थी। वह वही मूर्ति थी। वह दुनिया की सर्वाधिक सुंदर मूर्ति थी। मरियम—जीसस की मां—बैठी है; उसकी आंख से आंसू टपक रहे हैं, क्योंकि बेटे को सूली लग गई है। और जीसस सूली से उतारे गए हैं। वह लाश लिए बैठी है। वह अपूर्व मूर्ति थी। जब तीन साल बाद उस संगमरमर के दुकानदार ने वह मूर्ति देखी तो उसे विश्वास भी नहीं आया कि यह, उस पत्थर से यह मूर्ति निकल ही नहीं सकती, तुम मुझे धोखा दे रहे हो! उस पत्थर में यह मूर्ति हो ही नहीं सकती। और तुम्हें कैसे दिखाई पड़ा? वह अनगढ़ बेकार सा पत्थर जिसे कोई खरीदने को राजी नहीं था, न मालूम कितने मूर्तिकार इनकार कर चुके थे, तुम्हें उसमें कैसे कुछ दिखाई पड़ा? माइकलएंजलो ने कहा: इसमें मेरा कुछ भी हाथ नहीं। जब मैं वहां से निकलता था तो मरियम ने मुझे, जीसस ने मुझे पुकारा, कि देखो हम यहां छिपे पड़े हैं, हमें मुक्त करो। यह बात बड़ी प्यारी है कि माइकलएंजलो कहता है कि मूर्ति मैंने बनाई नहीं; वह तो मूर्ति में जो छिपा था, उसने मुझे पुकारा कि मुझे मुक्त करो! तो मैंने कुछ किया नहीं है; व्यर्थ जो पत्थर इसके चारों तरफ जुड़े थे, उन्हें छांट कर अलग कर दिया है, बस। मूर्ति तो थी ही; प्रकट हो गई है। प्रेम ऐसे ही निखारता है, जैसे मूर्तिकार छैनी लेकर पत्थर को काटता है। पीड़ा बहुत होती है। लेकिन पीड़ा धन्यभाग है। क्योंकि धीरे—धीरे तुम्हारी मूर्ति निर्मित होती है। भक्त भगवान की पीड़ा में जितना जलता है उतना ही भगवान के करीब होने लगता है। एक दिन वह घड़ी आती है कि भक्त तो विलीन हो जाता है, भगवान ही शेष रह जाता है। भक्त तो अनगढ़ पत्थर था; जब मूर्ति उघड़ आती है तो भगवान ही रह जाता है। तुम सभी ऐसे पत्थर हो जिनके पीछे भगवान छिपा है। माइकलएंजलो उस पत्थर को उठा कर ले गया था। तुम्हारे भीतर जो छिपा है वह मुझे पुकारता है—उसी की आशा से कि शायद कुछ संभावना है। चोट करनी होगी निश्चित। खार फैला के बागे हस्ती में गुंचाओ गुल खिलाए जाते हैं बिजलियां गिर रही हैं हम पे इधर वो उधर मुस्कुराए जाते हैं। और पीड़ा बहुत होती है भक्त को कि हम यहां मुश्किल में पड़े हैं, और तुम वहां खड़े मुस्कुरा रहे हो—आकाशों में, बादलों पर सवार, चांदत्तारों में बैठे! तुम वहां मुस्कुरा रहे हो; यहां हम पीड़ा से जले जा रहे हैं! लेकिन परमात्मा मुस्कुराता है, जब कोई प्रेम से जलता है।; तुम्हें भविष्य पता नहीं है। जब कोई बीज टूटता है तो बीज को कैसे पता हो कि वृक्ष पैदा होगा और हजारों फूल लगेंगे और पक्षी इस पर बसेरा करेंगे और घोंसले बनाएंगे और यात्री मेरी छाया में विश्राम करेंगे। बीज जब टूटता है तो बीज को कैसे पता हो! यह तो माली जो बैठा है किनारे और मुस्कुरा रहा है उसको पता है कि टूटो, जल्दी टूटो! यह तो गुरु को पता होता है कि शिष्य जब टूट रहा है, नष्ट हो रहा है तो अपूर्व घट रहा है। शिष्य तो तड़फता है, परेशान होता है। वह तो सोचता है यह किस झंझट में पड़ गए। पहले ही भले—चंगे थे। सब ठीक तो था, जैसा था ठीक था। न कोई बड़ी आकांक्षा थी, न कोई बड़ी पीड़ा थी। बड़ी आकांक्षा के साथ बड़ी पीड़ा आती है। और परमात्मा सबसे बड़ी आकांक्षा है। इसलिए प्रेम के साथ सबसे बड़ी पीड़ा आती है। जो उस पीड़ा को झेलने को तैयार हैं वे ही केवल चल पाते हैं। #womeninmaledominatedfields

VARUN CHAUDHARY

138,029 Aufrufe • vor 1 Jahr

निश्चित ही सभी चीजें बदलती हैं। बदलनी ही चाहिए। बदलना ही जीवन का क्रम है। और बदलना शुभ भी है। बदलती हैं, इसलिए तो जीवन नया रहता है, ताजा रहता है, प्रफुल्लित रहता है। इस देश में नहीं बदलतीं, यही हमारी अड़चन है। इस देश में सब सड़ गया है, सब गंदा हो गया है। इस देश में आज तो है ही नहीं, बस कल ही कल है। रामराज्य हो चुका, स्वर्णऱ्युग हो चुका, सतयुग हो चुका सब हो चुका! अब हम यहां क्या रह रहे हैं? कोई यह पूछता ही नहीं कि तुम क्या कर रहे हो? जब सब हो ही चुका तो अब तुम भी हो चुको! अब तुम क्यों नाहक कष्ट उठा रहे हो! अब कुछ होने को तो बचा नहीं। अब तो कलियुग ही कलियुग है, दुर्दिन ही दुर्दिन हैं, अब तो दुख ही दुख है। अब सार क्या है जीने में? दो हिप्पी केलिफोर्निया के रास्ते से गुजर रहे थे। महा हिप्पी! मील भर तक चलते रहे चुपचाप। अपनी-अपनी धुन में मस्त। आखिर एक ने दूसरे से कहा कि अब बरदाश्त के बाहर है। क्या तूने अपने पतलून में पाखाना किया है? इतनी भयंकर बदबू आ रही है! और मील भर से मैं देख रहा हूं, कि अगर यह बदबू कहीं और से आ रही होती तो छूट गई होती पीछे, मगर यह साथ ही चल रही है। दूसरे ने कहा कि नहीं-नहीं, बिलकुल नहीं। मगर पहला भी ऐसा मानने वाला न था। उसने कहा कि उतार पतलून। सो उसके मित्र ने पतलून उतारी। पतलून उतारते ही वह दूसरा चिल्लाया कि देख मैं क्या कहता था और तू कहता है कि नहीं-नहीं। तूने पाखाना किया है! यह क्या रहा? दूसरे ने कहा, मैंने समझा भाई तुम पूछ रहे हो, आज की। आज नहीं किया। ऐसी इस देश की दशा है। यहां आज तो कुछ है ही नहीं--कुछ भी नहीं! सब कल हो चुका। बस उसको ढोते रहे मुर्दा लाशों को। सड़ गई हैं, बास उठ रही है। मगर बड़ी प्यारी हैं। अपनों की है। और सदियों से पूजी गई हैं। सम्मान-सत्कार होता रहा है। सो सजाए रहो, संवारे रहो। बाप-दादे भी यही करते रहे, तुम भी यही करते रहो। हम कुछ भी बदलना नहीं चाहते। महावीर ने कहा था अपने मुनियों को कि नंगे पैर चलना। कहने का कारण था, क्योंकि उस समय जूते बनते थे वे सिर्फ चमड़े के बनते थे। और चमड़ा तो हिंसा होगी, पशु मारे जाएंगे। तो ठीक था अपने जूतों के लिए पशुओं को क्या मारना! फिर दूसरे कोई कोलतार के और सीमेंट के रास्ते तो थे नहीं। खुली मिट्टी थी, मिट्टी के ही रास्ते थे। मिट्टी पर चलने में कोई अस्वास्थ्य नहीं है। मिट्टी पर चलने में तो स्वास्थ्य है। हम भी तो मिट्टी के बने हैं। मिट्टी मिट्टी से मिलती है तो जीवन पाती है। तो अगर तुम कभी नंगे पैर थोड़ी देर मिट्टी पर रोज चलो तो लाभपूर्ण है, स्वास्थ्यप्रद है। हर्जा नहीं है जरा भी। मगर अभी जैन मुनि अभी भी चले जा रहे हैं कोलतार की सड़क पर, सीमेंट रोड पर! सोचता ही नहीं कि महावीर को क्या बेचारों को पता कि सड़कें ऐसी भी होंगी। कोलतार की जलती हुई सड़क, गर्मी के दिन, पैर में फफोले पड़े जा रहे हैं, मगर वह चला जा रहा है। और अब तो जूते कपड़े के भी बनते हैं, कैनवास के भी बनते हैं, रबर के भी बनते हैं, अब कोई चमड़े पर ही रुके हैं हम? अब तो जूते में कोई हिंसा नहीं है। अगर महावीर वापस लौट आएं तो मैं तुमसे पक्का कहता हूं, और कुछ पहनें कि न पहनें, जूते जरूर पहनेंगे। मैं तुम से पक्का कहता हूं, महावीर अगर दोबारा हों तो जूते जरूर पहनेंगे। टाई और हैट की तो मैं नहीं कह सकता। वैसे अच्छा रहेगा चटाई का हैट, धूप-धाप में बचाव भी करेगा और चटाई में कोई हिंसा भी नहीं है। जापानी ढंग का चटाई का हैट सुंदर रहेगा। समय बदलेगा तो सभी मूल्य बदलेंगे। और वही जाति जीवित होती है जो समय के साथ बदल जाती है। वही व्यक्ति जीवित होते हैं जो समय के साथ बदल जाते हैं। यह देश मुर्दा है, कब्रिस्तान है। एक मरघट है बड़ा मरघट, जिस पर महात्मा धूनी रमाए बैठे हैं। बस धूनी रमाने का काम और कुछ काम बचा नहीं है। सब काम पहले हो चुका। अब तो निष्काम भाव से मरघट पर बैठो, धूनी रमाओ, राम-राम जपो। कुछ बचा नहीं जैसे हमारे हाथ में करने को। सारी पृथ्वी कितने महत कार्यों में संलग्न है! शायद इतने महत कार्य कभी नहीं हुए थे जितने महत कार्य आज हो रहे हैं; क्योंकि इतना विज्ञान न था, इतनी टेक्नॉलॉजी न थी, इतने हमारे हाथ में साधन न थे, इतनी समझ न थी। आज सब साधन हैं, सब समझ है। आज हम इस पृथ्वी को स्वर्ग बना सकते हैं। मगर ये पुराने मूल्य और पुरानी धारणाएं हमें नरक से बांधे हुए हैं। 22 मार्च 1980, श्री रजनीश आश्रम पूना "प्रितम छवि नैनन बसी-प्रवचन-12"

जीवन यात्रा

14,067 Aufrufe • vor 7 Monaten

‘मोरे करम लिखा वैराग्य माई रे…’ हमारे मित्र अनुज सिंह ने यह वीडियो क्लिप भेजी है. अनुज के पैतृक गाँव (अमेठी) का मामला है. उनकी रिश्तेदारी का एक बच्चा, 20-22 वर्ष पहले, अचानक कहीं चला गया था. परिजनों ने यथाशक्ति खोजबीन की. थाने में गुमशुदगी की रपट भी दर्ज कराई. वह बच्चा मिला नहीं. उसका पता नहीं चला. घरवालों को आशंका हुई, शायद वह अब जिंदा नहीं है. या फिर किसी दुर्घटना का शिकार हो गया होगा. अब वही बच्चा 22 साल बाद वापस अपने घर लौटा है. जोगी बनकर. पर, उसकी यह यात्रा घर-परिवार से मिलने के लिए नहीं है. बल्कि संन्यासी जीवन के एक अहम विधान पूरा करने की है. दरअसल, जोगियों की एक परंपरा है. मान्यता है. संन्यास धारण करने के बाद, मां से भिक्षा पाना अनिवार्य है. कोई जोगी तभी बनता है, जब उसे अपने माँ के हाथ से भिक्षा मिलती है. आदेश भी कि वह जोगी बन जाए. लिहाजा युवा जोगी अपने घर लौटा है. अभी उसका संन्यास पूरा नहीं हुआ है. पर, मां की आंखें उसे पहचान लेती हैं. वर्षों बाद अपने जिगर के टुकड़े को दरवाजे पर देख, मां का हृदय द्रवित हो उठा है. नैन सजल हो उठे हैं. झर रहे हैं. बुआ भी बेज़ार रो रही हैं. माँ और बुआ के करुण क्रंदन को देख जोगी का मन भी बिलख रहा है. सारंगी भी रो रही है. कंठ से करूण रसधार फूट रही है. वह गा रहा है. मां से भिक्षा की मांग कर रहा है- ‘सुनऽ माताजी, सुनऽ बुआजी मोरे करम लिखा वैराग्य माई रे कोई न मेटनवाला…’ माई, अपने हाथ से मुझे भिक्षा दे दो ताकि मेरा जोग सफल हो जाए. माँ बरज रही है. बुआ भी. तुम जोगी का भेष छोड़ दो. पूरा गांव उमड़ा है. आस-पड़ोस से लेकर घर-कुटुंब के लोग जोगी को मना रहे हैं. मनुहार कर रहे हैं. पर, जोगी अडिग है. कहता है, अगर मुझे भिक्षा नहीं मिलेगी, तो मैं दरवाजे की माटी लेकर चला जाऊंगा. पर, अपने जोग साधना को खंडित नहीं होने दूंगा. गेरुआ वस्त्र (गुदरी, कंथा) धारण किया है. सारंगी बजा रहा है. गोपीचंद और राजा भरथरी की लोकगाथा सुना रहा है. गुरु गोरखनाथ की महिमा बता रहा है. भरथरी, एक ऐतिहासिक लोकगाथा है. समूचे उत्तर भारत में अलग-अलग तरीके से गाया जाता है. यह लोकगाथा दो भागों में विभाजित है. राजा भरथरी, वैरागी होते हैं. योग-भोग का अन्तर्द्वन्द व करुणा का परिपाक है, इस गाथा में. राजा भरथरी के मन में वैराग्य जागता है. वे गुरु गोरखनाथ से दीक्षा की प्रार्थना करते हैं. गोरखनाथ उनकी राजसिक वृत्ति को देखकर दीक्षा देने से मना कर देते हैं. कहते हैं कि पहले अपनी रानी को माँ कहकर भिक्षा माँग कर आओ. राजा जोगी वेष धारण करके, हाथ में सारंगी लेकर महल के द्वार पर अलख जगाते हैं. लम्बी कथा है. रानी और भरथरी का संवाद होता है. आख़िर में भरथरी को भिक्षा मिलती है. वह गुरु गोरखनाथ के वापस जाते हैं. वहाँ उन्हें दीक्षा मिलती है. बहरहाल इन्हीं नाथ-जोगियों की परंपरा पर, हमने शोध किया है. गोरखपुर से लेकर पश्चिम बंगाल के नाथ पीठों-मंदिरों को जा कर देखा है. जोगियों से मिला हूँ. महाराष्ट्र और उड़ीसा के भी जोगियों से इस संबंध में बातचीत की है. कुंभ मेले जोगियों के शिविर में रहा हूँ. शोध के सिलसिले में. एक सवाल था कि आख़िर वह कौन-सी वजह है, जो किसी को घर-परिवार छोड़ जोगी का तानाबाना धारण करने के लिए प्रेरित करती है? जवाब मिला, आत्म तत्व की तलाश या फिर विरक्ति का भाव. आखिर कोई राजा, संन्यासी क्यों बन जाता है. अष्टावक्र और जनक का संवाद है. जनक राजा से राजर्षि बन जाते हैं. आधुनिक समय में इसकी सैद्धांतिक परिणति मैस्लो के अभिप्रेरणा सिद्धांत में मिलती है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी, साइंस ग्रेजुएट हैं. पर, युवा दिनों में संन्यास की राह पर चल पड़े. नाथपंथी योगियों की दीक्षा-प्रक्रिया अत्यंत कठिन होती है. एकांतिक साधना से लेकर हठ योग तक करना होता है. इस पूरी प्रक्रिया के बारे में ब्रिक्स ने अपनी किताब ‘द कनफटा योगी’ में बताया है. ब्रिग्स की यह किताब नाथ संप्रदाय के योगियों पर सबसे प्रामाणिक किताब मानी जाती है. 1938 में पहली बार छपी थी. गुरु गोरखनाथ के जीवन, परंपरा व योगियों से जुड़ी हर छोटी-बड़ी बात की पड़ताल करती है. ब्रिक्स ने काफ़ी मेहनत से बारीक से बारीक तथ्यों को जुटाया है. कान छेदवाने की प्रक्रिया से लेकर योगियों के दफनाये जाने (वे जलाये नहीं जाते) तक की तमाम बातें/परंपराएँ इसमें दर्ज है. फ़िराक़ ने भी एक नाथपंथी जोगी का ज़िक्र किया है. ‘ज़िक्र-ए-फ़िराक़’ में. कैसे उन्हें एक नाथपंथी जोगी मिलता है. वह सारंगी पर गीत गाता है. मगन हो कर नाचता है. कहता है कि वह अब नहीं लौटेगा… डॉ देवेंन्द्र नाथ तिवारी

🇮🇳Jitendra pratap singh🇮🇳

132,013 Aufrufe • vor 2 Jahren

आज जोधपुर सर्किट हाउस में मीडिया से बातचीत की : हालात बड़े गंभीर हैं और सरकार की तरफ से पूरी तरह से जोधपुर जिले की और संभाग की उपेक्षा हो रही है। कोई ध्यान देने वाला नहीं है। यह बहुत दुर्भाग्य है। सरकार बदलती है, पर हमने कभी भी सरकार आने के बाद में ये नहीं सोचा कि पूर्व मुख्यमंत्री का जिला हो या उनका क्षेत्र हो या संभाग हो, उसकी उपेक्षा की जाए। कभी नहीं सोचा। सोचा ही नहीं हम लोगों ने। और ये लोग पता नहीं इनके सोच में क्या ऐसा है, इसलिए हम बार बार कहते हैं कि इनका लोकतंत्र में यकीन नहीं है। यह बार बार दबाव देकर के सरकार चलाते हैं, तंग करते हैं, कांग्रेस की जो विचारधारा के लोग हैं उनको, ट्रांसफर पोस्टिंग करते हैं अनावश्यक, उनके क्षेत्र में काम नहीं करते हैं और तो और जो प्रोग्राम होते हैं तो लोकल MLA, MP को बुलाते नहीं हैं। यह इनका अलग ही सोच है। उससे कोई अच्छी परंपरा नहीं रहती। राजस्थान में परंपराएं कई मायने में अच्छी रही है। पूरे देश के तुलना में राजस्थान में कई परंपराएं अच्छी रही। हमारे जो पुराने नेता थे चाहे कांग्रेस के थे या बीजेपी के थे, उन्होंने उस वक्त में निभाया इस बात को, आना जाना भी था आपस के अंदर, सरकार बनने के बाद में भी, पर अब तो बिल्कुल ही शक की दृष्टि से देखते हैं। कोई पास बैठ जाए, वरिष्ठ नेता भी, उसके मन में चिंता रहती है कि पता नहीं कोई मुझे देख लेगा तो क्या होगा। ऐसी घटना हुई जयपुर के अंदर भी मैं देख रहा था, तो स्थिति बड़ी अजीब है कि वह कोशिश करता है चला जाऊं कि पता नहीं मेरा नंबर नहीं कट जाए। यह तो स्थिति राजस्थान के अंदर है। सरकार नाम की कोई चीज नहीं है। पूरा त्राहि त्राहि कर रहे हैं राजस्थान वाले। पेमेंट हो नहीं रहे किसी डिपार्टमेंट के, पेंशन तक नहीं हो रही हैं। मरने वालों को 5 लाख मिलते हैं, वो ढाई हजार रुके पड़े हैं। मुझे विश्वास ही नहीं होता है। स्थिति क्यों नहीं स्पष्ट करती है सरकार ? मुख्यमंत्री जी खुद क्यों नहीं स्पष्ट करते कि नहीं आपका जो फिगर आपके पास आए वो गलत आंकड़े हैं। यह क्यों नहीं कहते? एक हज़ार पांच सौ लोग हैं जिनके तो वापस भेज दिए कि आप उनको वापस जांच करके भेज दीजिए और डिले हो जाता है। तो इस स्थिति में सरकार चल रही है। कल मैं सिलिकोसिस के मरीजों से मिलने गया। मैंने सोशल मीडिया में डाला भी उसको। अब सरकार को चाहिए कि सोशल मीडिया में हम क्या डालते हैं विपक्ष वाले उनको देखें, डीआईपीआर में टीम बनाएं, वो उनको ब्रीफ करें कि भाई यह आजकल विपक्ष वाले बोल रहे हैं। उसमें हमें पब्लिक इंटरेस्ट में क्या फैसला करना है, कोई परवाह नहीं इनको। यह क्या इनके दिमाग में मानवता के बारे में। वो कोई बीजेपी, कांग्रेस के लोग नहीं है जो बीमार है। सिलिकोसिस होने के बाद तो पता नहीं वह कब तक जिंदा रहेगा। ऑक्सीजन सिलेंडर नहीं मिल रहे उन लोगों को, कहां जाएं, कैसे कोशिश करें, कब एक्स रे होगा। सारे ब्लॉक कर दिए पहले वाले, नए खोल नहीं रहे। कोई करप्शन हो गया। मैंने सुना कोई दौसा की दो तीन डॉक्टर पकड़े गए होंगे गलत सर्टिफिकेट देने में। तो यह तो होता रहता है। यह किस स्कीम में नहीं होता है? करप्शन किस डिपार्टमेंट में नहीं होता? सब जगह कोई एक घटना दो घटना हो जाए, इसका मतलब यह नहीं कि पूरे उसको रोक दो। वो बेचारे तड़प रहे हैं, वो लोग तड़प रहे हैं। जिसकी सांस नहीं आती है, घरों में भी दमा वालों को, उन पर क्या बीतती है ? उनके तो परमानेंट दमा हो गया। बिना ऑक्सीजन के जिंदा रह नहीं सकते, उन हालातों में वो लोग हैं। मैं सिकंदरा गया हूं, भरतपुर गया, मुख्यमंत्री का जिला है वो और यहां मैं कल जा के आया हूं सूरसागर। अब मैं करौली जाऊंगा एक बार, वहां भी बहुत भयंकर स्थिति है। अब जब मैं जाने लगा हूं तो और जिले से रिपोर्ट आने लगी है। बालेसर वाले आ गए रात को कि हमारे यहां बहुत स्थिति खराब है। उमेश सिंह जी और अन्य सब लोग आए थे। कहने का मतलब यह कि स्थिति नाजुक है और आज जो हेडलाइन बनी थी, आपके जमीनों के कब्जा करने की, पता नहीं जैसे कोई देखता है, कभी जिंदगी में कभी सरकार वापस आएगी नहीं हमारी। अभी जो विधायकों का जो है यहां पर, वह तो मुझे लगता है कि ऐसा व्यवहार कर रहे हैं बीजेपी विधायक भी, पहले पकड़े गए थे जब भास्कर ने स्टिंग ऑपरेशन किया था। यही महाशय जी पकड़े गए थे, खींवसर वाले ही पकड़े गए थे। कोई जवाब नहीं आज तक इनका और विधायक पकड़े गए। जमीनों पर कब्जा और कर लिया आज जो खबर आई थी और तो और जो आपके केंद्रीय मंत्री जी है अजमेर वाले 90 लाख उठा लिए सब्सिडी के। वहां पर जमा करने से कोई थोड़ी क्राइम खत्म होता है। जमा करवा दिए तो कराने ही थे, पार्लियामेंट में इश्यू बन गया तो कराने ही थे। तो कितनी जगह की घटनाएं सामने आ रही है।

Ashok Gehlot

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दोबारा होने जा रहे नीट (NEET) एग्जाम तथा टेलीग्राम ऐप पर प्रतिबंध को लेकर मीडिया के प्रश्न का जवाब: "देखिए, सरकार ने सिर्फ टेलीग्राम को ही क्यों रोका? इंटरनेट और सोशल मीडिया पर ऐसे और भी कई प्लेटफॉर्म्स और चैनल्स हैं। अगर सरकार को कोई प्रतिबंधात्मक कार्रवाई करनी ही थी, तो वह किसी एक ऐप को टारगेट करने की बजाय सभी के लिए समान रूप से (कॉमन) लागू होनी चाहिए थी। पर असल मुद्दा कुछ और है। अभी हाल ही में आपके ही मीडिया जगत के एक साथी मुझसे मिलने आए थे; जब हमारे बीच चर्चा हो रही थी, तब मैंने इस बात को बकायदा रेखांकित किया था कि देश में पेपर लीक का जो सिलसिला चल रहा है, वह किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है। पेपर लीक राजस्थान में भी हुए, गुजरात में हुए, उत्तर प्रदेश में हुए और देश के अनेकों राज्यों में हुए हैं। मैंने तो खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी और भारत सरकार को समय रहते चेताया था कि पूरे देश के भीतर एक बहुत बड़ी अपराधी गैंग (Inter-State Gang) सक्रिय हो चुकी है, जो हर जगह युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करते हुए पेपर आउट करवा रही है। लेकिन केंद्र सरकार ने अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए, जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं वहाँ की बात करने की बजाय, जानबूझकर पूरा ध्यान केवल और केवल राजस्थान पर केंद्रित कर दिया। ये लोग ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि धरातल पर तो ये कोई काम कर नहीं रहे हैं। ऊपर से लेकर नीचे तक भयंकर भ्रष्टाचार व्याप्त है। सुशासन (गवर्नेंस) नाम की कोई चीज़ बची नहीं है, चाहे पानी हो, बिजली हो, शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो या सड़कें, हर क्षेत्र बदहाल है। आज स्थिति यह है कि सरकार के किसी भी विभाग में पेमेंट नहीं हो पा रहे हैं; सारे सरकारी महकमे और ठेकेदार रो रहे हैं। बुजुर्गों और जरूरतमंदों को छह-छह महीने तक पेंशन नहीं मिल रही है, छात्रों को स्कॉलरशिप नहीं मिल पा रही है। आज राजस्थान ऐसे बदतर दौर से गुजर रहा है। ऐसे में जनता का ध्यान भटकाने के लिए इन लोगों ने केवल एक ही मुद्दा पकड़ रखा है। मैं तो कहता हूँ कि आपको किसने रोका है? जिसने भी गलती की है, जिसने भी अपराध किया है, आप उसे ढूंढिए और सख्त से सख्त सजा दीजिए। लेकिन आपके पास दूरदर्शिता नहीं है, इसलिए आप केवल पाँच साल तक इसी राजनीतिक द्वेष और आरोप-प्रत्यारोप में अपना समय बर्बाद कर देंगे। इसके साथ ही, आदरणीय प्रधानमंत्री जी ने राजस्थान की जनता के साथ एक बड़ी वादाखिलाफी की है। जब प्रदेश में चुनाव चल रहे थे, तब मैंने सार्वजनिक रूप से शंका जताई थी कि यदि राज्य में भाजपा की सरकार बनी, तो हमारी तमाम शानदार जनकल्याणकारी योजनाएं बंद कर दी जाएंगी। मेरी इस बात पर खुद प्रधानमंत्री जी ने मंच से प्रदेशवासियों को भरोसा दिलाते हुए वादा किया था कि 'अशोक गहलोत जो कह रहे हैं, मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि हमारी सरकार आने पर आपकी कोई भी जनहित की स्कीम बंद नहीं होगी।' लेकिन सरकार में आते ही इन्होंने हमारी तमाम कल्याणकारी योजनाएं बंद कर दीं। आज जब हम प्रधानमंत्री जी को उनका वह वादा याद दिलाते हैं, जब हम उनसे कन्हैयालाल हत्याकांड के वास्तविक न्याय को लेकर सवाल करते हैं, या जब हम ईस्टर्न राजस्थान कैनाल प्रोजेक्ट (ERCP) की कड़वी सच्चाई और हमारी बंद की गई योजनाओं को लेकर जवाब मांगते हैं, तो न तो माननीय मोदी जी के पास इसका कोई जवाब होता है और न ही गृह मंत्री अमित शाह जी कुछ बोलते हैं। अब ऐसे में क्या किया जाए? सच तो यह है कि ये लोग देश और प्रदेश की सत्ता को जनता की सेवा के लिए नहीं, बल्कि पूरी तरह से अपने अहंकार और घमंड के बल पर चला रहे हैं। यही आज की सबसे बड़ी हकीकत है।"

Ashok Gehlot

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भाजपा नेताओं द्वारा मानेसर प्रकरण पर की जा रहीं टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया: ये लोग बार-बार मानेसर को लेकर के ये तंज कसते हैं हमारे पर, ये हमारे घर का मामला है, वो हम निपटते जाएँगे आपस के अंदर, चाहे पायलट साहब हों, चाहे वो डोटासरा जी हों, चाहे वो जूली साहब हों, चाहे वो सीपी जोशी साहब हों, चाहे वो भंवर जितेंद्र सिंह जी हों, जो भी नेता हमारे हैं, नेता कई हैं हमारे तो, पूर्व पीसीसी अध्यक्ष हमारे चंद्रभान जी भी हैं, डॉक्टर बीडी कल्ला जी भी हैं, जितने ही नेता हम हैं, आपस में हम बात कर लेंगे और कोई गलतफहमी दूर कर लेंगे। सच्चाई, सच्चाई का विकल्प होता नहीं है, सच्चाई मैंने अपनी रख दी है सामने और आगे भी रख देंगे साथ में और बार-बार कहते हैं कि 25 सितंबर को क्या हुआ? हाईकमांड के खिलाफ में रिवोल्ट कभी नहीं कर सकते, राजस्थान की कांग्रेस जो है इतिहास गवाह है, इंदिरा गांधी की कांग्रेस बनी थी 1 जनवरी 1978 को, तभी जो है इंदिरा जी सबसे पहले 1 जनवरी 78 को बनीं और 15 दिन बाद में सबसे पहले जयपुर आई थीं, हम लोग मौजूद थे, जेल गए हुए थे हम लोग। जेल आते-जाते थे हम लोग, इंदिरा जी के यहाँ जेल गए थे, इतना विश्वास इंदिरा जी ने राजस्थान पे किया, सोनिया गांधी ने विश्वास किया, राहुल गांधी विश्वास कर रहे हैं, अभी देखा आपने पुष्कर में क्या-क्या हुआ। सब विश्वास राजस्थान की कांग्रेस पर हाईकमांड का पहले था, आज भी है। 25 सितंबर की घटना जो हुई है वो उस व्यक्ति के खिलाफ ही हुई थी जिसका नाम चल गया था कि ये मुख्यमंत्री की शपथ ले सकते हैं, पायलट साहब। इनके खुद के लोगों ने चला दिया, ऐसा माहौल बन गया कि 100 लोग इकट्ठे हो गए, कहा भई अगर नया मुख्यमंत्री बने, अशोक गहलोत जा रहा है अध्यक्ष बनने के लिए, नया मुख्यमंत्री बने, बने वो हमने जो लॉयल्टी दिखाई हाईकमांड के साथ में, हम होटलों में बंद रहे हैं, लॉयल्टी दिखाई हाईकमांड साथ रहे हम लोग, सरकार बचाई, हम में से किसी को भी, हम में 100 लोग में से किसी को मुख्यमंत्री पद दे दीजिए, बना दीजिए, हमें मंजूर है पर पायलट साहब मंजूर नहीं होंगे क्योंकि वो तो ले जाने वालों में थे मानेसर, ये उनकी मांग थी, उसको तोड़-मरोड़ कर के कह रहे हैं कि हाईकमांड के खिलाफ में रिवोल्ट हो गया, अरे हाईकमांड खिलाफ रिवोल्ट होता तो मैं मुख्यमंत्री रह पाता क्या बाद में? अगर रिवोल्ट हम करते, तो हाईकमांड मुझे क्यों रखती मुख्यमंत्री? ये तो आरोप लगाने वाले को समझना चाहिए। और लास्ट बात ये है, हिंदुस्तान के इतिहास के अंदर जब कभी भी हाईकमांड ने तय किया कि मुख्यमंत्री बदलना चाहिए, बदलने का फैसला कर लेते हैं, 90% एमएलए जो होता है जो मुख्यमंत्री साथ होते हैं, वो छोड़ के जाते हैं नए मुख्यमंत्री बनने वाले के पास। नए मुख्यमंत्री पास जाते हैं कि भई ये कल बनने वाला है, शपथ लेगा 5 दिन बाद में, 2 दिन बाद में और इन्हीं को जो है हमें मंत्री बनना है इनके साथ, हमारे काम तो नए मुख्यमंत्री से पड़ेंगे, तो पुराने मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह जी, कैप्टन साहब हों चाहे वो एक्स वाई जेड कोई हो, जो-जो मुख्यमंत्री हटाने का फैसला हाईकमांड ने किया है, 90% विधायक छोड़ के जाते हैं उनके पास से, ये तो मैंने देखा है। कोई नहीं रुकता है। क्या कारण था उस दिन कि नए मुख्यमंत्री का नाम चल पड़ा, चला दिया खुद ने चला दिया, उनके दोस्तों ने चला दिया, उसके बाद में उनके पास नहीं गए, उनके पास नहीं गए, क्यों नहीं गए भाई? वो तो शपथ लेने वाले थे मान लो, जाते उनके पास में, ये बात सचिन पायलट को भी समझनी चाहिए, अब वो भी उनको भी करीब 15-20 साल हो गए राजनीति करते हुए, एमपी बने हुए, वो भी मतलब अनुभव प्राप्त हो चुके हैं, हम सब कोई उनके दुश्मन नहीं हैं कोई, हम तो स्नेह रखते हैं बचपन से ही, हम तो बचपन से ही इनके परिवार में आते-जाते थे, जब हम MP बनकर गए, तो वैभव हो चाहे ये हो, 2-3 साल के बच्चे की तरह थे, हम तो बच्चे की तरह मानते हैं आज भी उनको। अब उसके बाद में अगर वो राजनीति में पता नहीं कौन गाइड कर रहा है। एक तो जो मीडिया जो है, वो सच्चाई पे उनका सपोर्ट करे मुझे ख़ुशी होगी, मुझे भी सपोर्ट किया। बचपन से मीडिया ने मुझे सपोर्ट किया, मैं मीडिया फ्रेंडली कहलाता हूँ, मीडिया ने भी हमारे साथ चाय पी होगी तो पेमेंट खुद ने दिया होगा मीडिया वालों ने, ऐसे सम्बन्ध हम लोगों ने रखे हैं पर हमने कभी नहीं कहा कि तुम अंट-शंट अनर्गल ऐसी बातें करो जिससे मेरी खुद की इमेज पे लोग हँसें। कभी उसको बना देते हैं, प्राइम मिनिस्टर बना देते हैं उसको, पायलट साहब को, कि ये प्राइम मिनिस्टर के उम्मीदवार हैं, कभी कहते हैं कांग्रेस प्रेजिडेंट के उम्मीदवार हैं, कभी कहते हैं ये कांग्रेस वर्किंग प्रेजिडेंट बनने जा रहा है, कभी कहते हैं ये जी एस ओ बनने जा रहा है और कभी कहते हैं पीसीसी अध्यक्ष बनने जा रहा है, तो क्यों पायलट साहब के पीछे पड़े हुए हो तुम लोग? जितने भी मीडिया वाले हो, तुम लोग पीछे पड़े हुए हो, तुम लोग जो है दिल्ली में चाहे मेनस्ट्रीम मीडिया हो और चाहे वो आपका सोशल मीडिया हो। सोशल मीडिया को मैं सलाम करता हूँ उनको, इस संकट की घड़ी में जो भूमिका सोशल मीडिया निभा रहा है, उनको मैं सलाम करता हूँ। डेमोक्रेसी खतरे में है, उसकी रक्षा करने के काम की बड़ी भूमिका किसी की है, मेनस्ट्रीम मीडिया की नहीं है, सोशल मीडिया की है और उनके अंदर जो बैठे हुए लोग हैं, जमीनी हकीकत उनको नहीं मालूम है, वो नई-नई स्टोरी चलाते रहते हैं, कोई फायदा नहीं, सबसे बड़ा नुकसान जो कर रहा है पायलट साहब का, वो वो मीडिया कर रहा है जो आउट ऑफ़ वे झूठी ख़बरें चला करके, झूठे पोस्ट देकर के ये इसके लायक हैं। एक पत्रकार ने लिख दिया कि सोनिया गांधी राहुल गांधी को क्यों बेटा मानती है? सचिन पायलट को बेटा क्यों नहीं मान लेती है? ये पत्रकारिता है क्या इनकी? पत्रकारिता है इनकी, आप कल्पना कीजिए कि कहाँ ले जा रहे हैं देश को, मीडिया वाले भी। इसलिए मैं कहना चाहूँगा पायलट साहब को ही, उनको सच्चाई स्वीकार करनी चाहिए, गलती इंसान से ही तो होती है, गलती इंसान से होती है, मैं भी कर सकता हूँ। उन्होंने गलती कर दी तो स्वीकार कर लेना चाहिए, मैंने बाहर निकलते ही जैसलमेर के होटल से, जब तय हो गया ये लोग भी आ रहे हैं, आते ही मैंने बात कि आप लोग स्टेटमेंट दिया, 'फॉरगेट एंड फॉरगिव'। अगर मेरी भावना सचिन पायलट समझ जाते उस दिन, वो भी फॉरगेट एंड फॉरगिव करते, मैंने उसके ये नहीं कहा कि मेरी गलती नहीं थी, उसकी गलती थी, मैंने कहा 'फॉरगेट एंड फॉरगिव' मतलब जिसने गलतियाँ हमने करी आपस के अंदर, सब भूलो और माफ़ करो, अब वो बात भी अगर समझ में नहीं आई उनको, उसमें मेरा क्या कसूर है? हम आज भी मिलते हैं, हँसी-मजाक भी करते हैं, बातचीत भी करते हैं। हमारी कोई आपस में दिक्कत नहीं है, सच्चाई को स्वीकार उन्होंने करना सीखा नहीं, उसके कारण ये इशू अभी तक बना हुआ है। मैंने बीकानेर में कहा 6 महीने पहले, भूलो इसको अब आप, मानेसर को भूलो। क्या मेरे मानेसर भूलने की बात कहने के बाद में क्या कोई स्टेटमेंट आया ऐसा? इशारों में ही आया क्या? भई चलो ये इशू खत्म हो गया क्योंकि उनके एडवाइजर वैसे ही होंगे, उनके एडवाइजर ऐसे ही दिखते हैं, इस कारण से ये इशू बना हुआ रहता है, हम नहीं चाहते इशू बना रहे, जो हो गया सो हो गया। गलती इंसान से ही तो होती है, पर जब तक कोई गलती को स्वीकार नहीं करे, तो भई आप जानते हो इशू तो बना ही रहता है, मैं नहीं चाहता इशू बना रहे। हम चाहते हैं कि आज कांग्रेस पार्टी संकट में है देश के अंदर, देश खुद संकट में है और देश को अगर कोई बचा सकता है तो वो सिर्फ कांग्रेस बचा सकती है। ये गांधी जी के सानिध्य वाली पार्टी है, पंडित नेहरू हों, मौलाना आजाद हों, सरदार पटेल हों, उस वक्त के नेता थे हमारे। उन्होंने कैसे पार्टी को, देश को आजाद करवाया, हम भूल सकते हैं क्या? जेलों में बंद रहे थे 10-10 साल तक, इन्होंने उंगली नहीं कटाई हमारी आरएसएस-बीजेपी वालों ने, आज राज कर रहे हैं वो लोग। ये देश को तोड़ देंगे लोग, ये ऐसे खतरनाक लोग हैं, हिंदू-मुस्लिम करते-करते पता नहीं देश को कहाँ ले जाएँगे। लड़ाई हमें सब को मिलके लड़नी चाहिए, पायलट साहब हों, चाहे मैं हूँ, चाहे कोई नेता है। अगर हमें ईमानदारी है कांग्रेस में रहने की, और हम चाहते हैं कांग्रेस के लिए जान लगा दें क्योंकि कांग्रेस ने हम सबको सब कुछ दिया है, इनको केंद्रीय मंत्री बनाया, मैंने उनको केंद्रीय मंत्री बनाने में मदद करी। उन्होंने अपनी जुबान से यें कभी नहीं कहा, इस बात की मुझे शिकायत भी है। उनको मालूम है कि मैंने उनकी मदद करी है, उनका फ़ोन आया तो मैंने कहा मैंने आपके लिए बात कर ली है, आप मंत्री बन जाओगे। उन्होंने ये बात जुबान से नहीं कही, ये दुःख तो होता है हम लोगों को भी। भाई, अगर वो अपने दोस्तों में भी कहते हैं हाँ भाई अशोक गहलोत ने मेरी मदद भी करी थी, तो मेरा दिल भर जाता। क्यों नहीं कही उन्होंने, क्यों नहीं ये बात कही? जब मुझसे वो फ़ोन कर रहे हैं, रिक्वेस्ट कर रहे हैं कि मेरे को मंत्री बनाने में मदद करो, तो मैं मदद करके आ गया, तो क्या उनका धर्म नहीं था क्या कहने का? भई देखो मतलब अशोक गहलोत ने मेरी मदद भी की थी, ठीक है आज हमारी गलतफहमी हो गई आपस में, कुछ तो कहते वो, ये बातें नहीं कही उसके कारण आज सब कुछ बातें आगे बढ़ रही हैं। दुनिया में सच्चाई का कोई विकल्प नहीं है, सुन लो। गांधी जी ने कहा था, 'द ट्रुथ इज गॉड, गॉड इज ट्रुथ', सत्य ही भगवान है, ईश्वर है, ईश्वर ही सत्य है, हम तो इस पे चलते हैं और पायलट साहब हों, चाहे कोई नेता हो, पीसीसी अध्यक्ष हों, चाहे नेता प्रतिपक्ष हो, डोटासरा जी हो और नेता हो, सबको हम तो यही कहेंगे भई सब लोग मिलके चलो, राजस्थानी कांग्रेस का मान-सम्मान हाईकमांड राहुल जी के दिमाग में ऐसा है जो कोई विश्वास नहीं कर सकता। बार-बार वो कह भी चुके हैं, अभी पीसीसी प्रेसिडेंट की और जूली साहब की तारीफ करके गए कि ये जुगल जोड़ी बनी रहे आपकी, अच्छा काम आप लोग कर रहे हो, इससे बड़ा कॉम्प्लीमेंट क्या होगा? अगर वो कह दें, इससे बड़ा कॉम्प्लीमेंट क्या होगा?

Ashok Gehlot

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"मेरी दोस्त (मृतका) को ‘राजनीतिक टूल’ बना दिया" अपने ही प्रोफेसर (HOD) द्वारा यौन शोषण की शिकार लड़की ने खुद को जला लिया. लेकिन सबकुछ कितना भयानक था, मृत लड़की की दोस्त से सुनिए. ओडिशा के बालासोर की आत्मदाह पीड़िता की एक कॉलेज दोस्त कोशिश दास ने बताया कि यह सब पिछले छह महीने से चल रहा था। 30 जून को छात्रा ने बताया था कि उसके HOD ने धमकी दी थी— "तुम्हें फेल कर दूंगा, छह साल तक यहीं बैठाए रखूंगा। जब तक मैं हूं, तुम इस कॉलेज से बाहर नहीं जा सकती।" जानबूझकर उसकी बैकलॉग क्लियर नहीं की जा रही थी। वह गहरे डिप्रेशन में थी। उसने कहा था कि उसे प्रिंसिपल से बात करनी है और सपोर्ट चाहिए। 12 जुलाई को वह प्रिंसिपल से मिलने पहुंची लेकिन एडमिशन की भीड़ के चलते दो घंटे तक बाहर इंतज़ार करती रही। हम दोस्तों ने कहा— “चलो पहले खाना खा लेते हैं, फिर मिलते हैं।” लेकिन जब तक हम लौटे, खबर आई कि उसने खुद को आग लगा ली है। कॉलेज को सील कर दिया गया था। हम उसकी हालत भी नहीं देख पाए। पीड़िता को मानसिक रूप से तोड़ा गया। HOD ने कई छात्रों को उसके खिलाफ शिकायत लिखवाने के लिए उकसाया। ये वही छात्र थे जो ABVP से जुड़ी छात्रा के खिलाफ राजनीतिक कारणों से थे। इन लोगों ने उसकी कैरेक्टर असैसिनेशन की, फेक आरोप लगाए और प्रिंसिपल को चिट्ठी दे दी। वही क्लासमेट्स और जूनियर्स जो कभी दोस्त थे, अब उसके मज़ाक उड़ाते, अफवाहें फैलाते और ऑनलाइन ट्रोल करते थे। वह पूरी तरह से टूट चुकी थी। कोशिश दास ने कहा— “अगर सबने राजनीति से ऊपर उठकर एक लड़की के इंसाफ के लिए खड़ा होते, तो आज वह ज़िंदा होती... मेरी भी गलती है कि मैंने उसे उस वक़्त अकेला छोड़ा।” #Balasore #SelfImmolation #CollegeHarassment #JusticeForVictim

4PM News Network

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प्रिय बेटा बड़कू नवरात्रि का अवसर है । घर घर में आरती हो रही है “पूत कपूत सुने हैं पर न माता सुनी कुमाता “ । मुझे यह भरोसा नहीं हो रहा है कि वाकई में मेरा कोई बेटा “कपूत” भी हो सकता है। मुझे मजबूरी में वह वीडियो जारी करना पड़ रहा है जिसमें मुझे पीटने का सच तुम्हारे नाना और मेरे पिता जी बयान कर रहे हैं। मेरी वही बहन जिसके साथ तुम्हारे पिता जी और मेरे पति रघुराज सिंह ने अवैध संबंध बनाये और उसका जीवन बर्बाद किया और मेरा भी जीवन बर्बाद किया। वही बहन मुझे जब पीट रही थी तो मैंने उसका प्रतिकार किया। खैर सभी को पता चल जाएगा यह सच भी । अभी कई और वीडियो हैं जिसमे तुम्हारे पिता श्री के बारे में तुम्हारे बाबा बड़े महाराज और दादी जी बहुत कुछ कह रही हैं। उन्होंने इनके कृत्यों से ही आजिज आकर यहाँ तक कहा कि वे उनकी मृत्यु के बाद उनका अंतिम संस्कार भी नहीं करें। यह सब कुछ मैं पब्लिक डोमेन में एक के बाद एक जरूर डालूँगी । मुझे पता है बेटा तुम्हारी मजबूरी। तुम्हें सारा सच पता है। तुम भी मेरे साथ सड़क पर जाने को मजबूर किए गए थे। रात में मुझे तुम सभी बच्चों के साथ घर से बाहर सोना पड़ा था। मुझे उम्मीद है तुम्हें सद्बुद्धि भी आएगी और सोचोगे कि तुम्हारी माँ के साथ क्या किया गया था और माँ ने कितनी प्रताड़ना एक व्यक्ति की अय्याशी और आपराधिक प्रवृत्ति की वजह से झेली है। किस मजबूरी में माँ ने मुँह खोला। फिर भी तुम बेटा अपने करियर के लिए और सुख सुविधाओं के लिए जो भी कर रहे हो उससे मुझे एतराज नहीं। मैं चाहती हूँ दुनिया की सारी ख़ुशी तुम्हें मिले। बस तुम्हें दुनिया मेरा नालायक बेटा न कहे। सारे साक्ष्य एक के बाद एक मिलेंगे। फ़िलहाल वह सच जो तुमने किसी दबाव में आधा बताया , आधा छिपाया और जितना बताया वह भी झूठ । एक बार देखो और फिर हो सके तो एक बार और लिखना । बेटा मैं मजबूर हूँ ! जवाब तो देना ही पड़ेगा। और हाँ अंत में फिर दोहरा रही हूँ मेरे चरित्र हनन से कुछ नहीं होगा यह जाँच एजेंसियों को बताना ही होगा कि इतने अवैध हथियारों का जखीरा कहाँ से आया और क्या कोई इसके पीछे आपराधिक गठजोड़ है। क्या कोई बड़ा अंतर्राज्यीय या अंतरराष्ट्रीय गिरोह से इसका संबंध है। मार पिटाई के मैनिपुलेटेड वीडियो तुम्हारे पापा की मदद नहीं कर पायेंगे। क्योंकि उनका अपराध बहुत बड़ा है और लोगों की सुरक्षा के लिए उनका कृत्य बहुत खतरनाक भी है। तुम्हारी माँ

Bhanvi Kumari Singh Bhadri

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नई नई संभोग।। ज़्यादातर पुरुषों के बीच एक बहुत ही आम और पुरानी गलतफहमी है कि बेड में अच्छा होने का सीधा मतलब घंटों तक टिके रहना या हर रोज़ नए और अजीबोगरीब करतब दिखाना है। लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। विज्ञान, रिसर्च और खुद महिलाओं के अनुभव बताते हैं कि वे शारीरिक प्रदर्शन से कहीं ज़्यादा एक गहरा कनेक्शन, आपके हुनर और यह महसूस करना चाहती हैं कि आप उन्हें सच में चाहते हैं। जब बात चरम सुख की आती है, तो हेटेरोसेक्सुअल (पुरुष के साथ संबंध बनाने वाली) महिलाओं की संतुष्टि का प्रतिशत केवल 65% है, जबकि पुरुषों का 95%। यह बहुत बड़ा अंतर किसी शारीरिक कमी की वजह से नहीं है, बल्कि तकनीक, फोकस और परवाह की कमी का नतीजा है। आइए विस्तार से जानते कुछ वह बातें जो हर महिला वास्तव में चाहती है। 1️⃣भावनात्मक जुड़ाव किसी भी बेहतरीन शारीरिक अनुभव की शुरुआत दिमाग और दिल से होती है। एक महिला के लिए सिर्फ शरीर का मिलना काफी नहीं है; उसे सुरक्षित और भावनात्मक रूप से वांछित महसूस करने की ज़रूरत होती है। आर्काइव्स ऑफ सेक्सुअल बिहेवियर (Archives of Sexual Behavior) की स्टडीज़ बताती हैं कि चरम सुख की गिनती से कहीं ज़्यादा, भावनात्मक जुड़ाव महिलाओं की सेक्शुअल संतुष्टि को तय करता है। जो महिलाएँ एक मज़बूत और भरोसेमंद रिश्ते में होती हैं, वे कैज़ुअल हुकअप्स के मुकाबले कहीं अधिक संतुष्टि का अनुभव करती हैं। 2024 के डेटा भी यही साबित करते हैं कि अगर वह आपके साथ भावनात्मक रूप से सुरक्षित महसूस नहीं करती, तो आपकी बेहतरीन तकनीक भी उसे खोखली लगेगी। इसलिए, सबसे पहले दिल से दिल का कनेक्शन बनाएँ, शरीर खुद-ब-खुद जुड़ जाएगा। 2️⃣ फोरप्ले में जल्दबाज़ी न करें! जल्दी शुरू और जल्दी खत्म वाला रवैया महिलाओं के लिए बहुत निराशाजनक होता है। महिलाओं के शरीर को उत्तेजित होने और वार्म-अप होने के लिए पुरुषों की तुलना में अधिक समय चाहिए होता है। किन्से इंस्टीट्यूट और हालिया सर्वे के अनुसार, फोरप्ले को प्राथमिकता देने से महिलाओं के चरम सुख तक पहुँचने की संभावना बहुत बढ़ जाती है। कई महिलाओं को पूरी तरह से उत्तेजित होने के लिए कम से कम 15 से 20 मिनट या उससे ज़्यादा के फोरप्ले की ज़रूरत होती है। जब आप जल्दबाज़ी करते हैं, तो वह हताश महसूस करती है, जिससे ऑर्गेज़्म गैप और बढ़ जाता है। इसके विपरीत, जब आप धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं, तो उसे लगता है कि आप उसकी परवाह करते हैं और केवल अपने मतलब के लिए जल्दी में नहीं हैं। 3️⃣ क्लिटोरल स्टिम्यूलेशन पर पूरा ध्यान! यह एक ऐसा वैज्ञानिक सच है जिसे अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। ज़्यादातर महिलाएँ सिर्फ पेनिट्रेशन से संतुष्ट नहीं होती हैं। जर्नल ऑफ सेक्स एंड मैरिटल थेरेपी की एक स्टडी के अनुसार, 36% से अधिक महिलाओं को चरम सुख तक पहुँचने के लिए सीधे क्लिटोरल टच की ज़रूरत होती है। केवल 18% महिलाएँ ही ऐसी हैं जो सिर्फ वैजाइनल पेनिट्रेशन से संतुष्ट हो पाती हैं। वहीं लगभग 75% का मानना है कि क्लिटोरल स्टिम्यूलेशन से उनका अनुभव कहीं ज़्यादा बेहतर हो जाता है। 50,000 से अधिक लोगों पर किए गए सर्वे में यह सामने आया कि लेस्बियन महिलाएँ (86%) इसलिए ज़्यादा ऑर्गेज़्म का अनुभव करती हैं क्योंकि उनका फोकस क्लिटोरिस पर अधिक होता है। सीधे शब्दों में कहें तो, क्लिटोरिस को अनदेखा करना उसकी खुशी को अनदेखा करने के बराबर है। 4️⃣ ओरल सेक्स का सही तरीका और उत्साह! ओरल सेक्स महिलाओं की सबसे बड़ी चाहतों में से एक है, बशर्ते इसे सही तरीके से और पूरे उत्साह के साथ किया जाए। एक बड़े सर्वे में 90.9% महिलाओं ने स्वीकार किया कि उन्हें ओरल सेक्स का आनंद लेना बहुत पसंद है, और 78% ने कभी न कभी इसके ज़रिए ऑर्गेज़्म महसूस किया है। यहाँ सबसे ज़रूरी बात आपका उत्साह है। उसे यह महसूस होना चाहिए कि आप इसे एक काम की तरह नहीं कर रहे हैं, बल्कि आप सच में इसे एन्जॉय कर रहे हैं। औसतन 20 मिनट की अवधि इसके लिए आदर्श मानी जाती है। उंगलियों और जीभ का सही तालमेल 92% महिलाओं को पसंद आता है। 5️⃣खुलकर बातचीत_करना बिस्तर पर खामोशी अक्सर केमिस्ट्री को खत्म कर देती है। आप क्या कर रहे हैं और वह कैसा महसूस कर रही है, इस पर खुलकर बात करना एक औसत अनुभव को शानदार बना सकता है। किन्से-समर्थित स्टडीज़ दिखाती हैं कि सेक्सुअलिटी पर खुलकर बात करना और अपनी पसंद-नापसंद साझा करना ज़्यादा ऑर्गेज़्म रेट से जुड़ा है। यह सोचना कि मैं सब जानता हूँ या उसकी इच्छाओं का सिर्फ अंदाज़ा लगाना अक्सर गलत साबित होता है। इसके बजाय, प्यार से पूछें, तुम्हें यह कैसा लग रहा है? या क्या तुम कुछ और चाहती हो? जब आप उसकी बात ध्यान से सुनते हैं, तो उसे महसूस होता है कि उसकी राय मायने रखती है, जिससे वह ज़्यादा रिलैक्स होकर आपके करीब आती है।
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नई नई संभोग।। ज़्यादातर पुरुषों के बीच एक बहुत ही आम और पुरानी गलतफहमी है कि बेड में अच्छा होने का सीधा मतलब घंटों तक टिके रहना या हर रोज़ नए और अजीबोगरीब करतब दिखाना है। लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। विज्ञान, रिसर्च और खुद महिलाओं के अनुभव बताते हैं कि वे शारीरिक प्रदर्शन से कहीं ज़्यादा एक गहरा कनेक्शन, आपके हुनर और यह महसूस करना चाहती हैं कि आप उन्हें सच में चाहते हैं। जब बात चरम सुख की आती है, तो हेटेरोसेक्सुअल (पुरुष के साथ संबंध बनाने वाली) महिलाओं की संतुष्टि का प्रतिशत केवल 65% है, जबकि पुरुषों का 95%। यह बहुत बड़ा अंतर किसी शारीरिक कमी की वजह से नहीं है, बल्कि तकनीक, फोकस और परवाह की कमी का नतीजा है। आइए विस्तार से जानते कुछ वह बातें जो हर महिला वास्तव में चाहती है। 1️⃣भावनात्मक जुड़ाव किसी भी बेहतरीन शारीरिक अनुभव की शुरुआत दिमाग और दिल से होती है। एक महिला के लिए सिर्फ शरीर का मिलना काफी नहीं है; उसे सुरक्षित और भावनात्मक रूप से वांछित महसूस करने की ज़रूरत होती है। आर्काइव्स ऑफ सेक्सुअल बिहेवियर (Archives of Sexual Behavior) की स्टडीज़ बताती हैं कि चरम सुख की गिनती से कहीं ज़्यादा, भावनात्मक जुड़ाव महिलाओं की सेक्शुअल संतुष्टि को तय करता है। जो महिलाएँ एक मज़बूत और भरोसेमंद रिश्ते में होती हैं, वे कैज़ुअल हुकअप्स के मुकाबले कहीं अधिक संतुष्टि का अनुभव करती हैं। 2024 के डेटा भी यही साबित करते हैं कि अगर वह आपके साथ भावनात्मक रूप से सुरक्षित महसूस नहीं करती, तो आपकी बेहतरीन तकनीक भी उसे खोखली लगेगी। इसलिए, सबसे पहले दिल से दिल का कनेक्शन बनाएँ, शरीर खुद-ब-खुद जुड़ जाएगा। 2️⃣ फोरप्ले में जल्दबाज़ी न करें! जल्दी शुरू और जल्दी खत्म वाला रवैया महिलाओं के लिए बहुत निराशाजनक होता है। महिलाओं के शरीर को उत्तेजित होने और वार्म-अप होने के लिए पुरुषों की तुलना में अधिक समय चाहिए होता है। किन्से इंस्टीट्यूट और हालिया सर्वे के अनुसार, फोरप्ले को प्राथमिकता देने से महिलाओं के चरम सुख तक पहुँचने की संभावना बहुत बढ़ जाती है। कई महिलाओं को पूरी तरह से उत्तेजित होने के लिए कम से कम 15 से 20 मिनट या उससे ज़्यादा के फोरप्ले की ज़रूरत होती है। जब आप जल्दबाज़ी करते हैं, तो वह हताश महसूस करती है, जिससे ऑर्गेज़्म गैप और बढ़ जाता है। इसके विपरीत, जब आप धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं, तो उसे लगता है कि आप उसकी परवाह करते हैं और केवल अपने मतलब के लिए जल्दी में नहीं हैं। 3️⃣ क्लिटोरल स्टिम्यूलेशन पर पूरा ध्यान! यह एक ऐसा वैज्ञानिक सच है जिसे अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। ज़्यादातर महिलाएँ सिर्फ पेनिट्रेशन से संतुष्ट नहीं होती हैं। जर्नल ऑफ सेक्स एंड मैरिटल थेरेपी की एक स्टडी के अनुसार, 36% से अधिक महिलाओं को चरम सुख तक पहुँचने के लिए सीधे क्लिटोरल टच की ज़रूरत होती है। केवल 18% महिलाएँ ही ऐसी हैं जो सिर्फ वैजाइनल पेनिट्रेशन से संतुष्ट हो पाती हैं। वहीं लगभग 75% का मानना है कि क्लिटोरल स्टिम्यूलेशन से उनका अनुभव कहीं ज़्यादा बेहतर हो जाता है। 50,000 से अधिक लोगों पर किए गए सर्वे में यह सामने आया कि लेस्बियन महिलाएँ (86%) इसलिए ज़्यादा ऑर्गेज़्म का अनुभव करती हैं क्योंकि उनका फोकस क्लिटोरिस पर अधिक होता है। सीधे शब्दों में कहें तो, क्लिटोरिस को अनदेखा करना उसकी खुशी को अनदेखा करने के बराबर है। 4️⃣ ओरल सेक्स का सही तरीका और उत्साह! ओरल सेक्स महिलाओं की सबसे बड़ी चाहतों में से एक है, बशर्ते इसे सही तरीके से और पूरे उत्साह के साथ किया जाए। एक बड़े सर्वे में 90.9% महिलाओं ने स्वीकार किया कि उन्हें ओरल सेक्स का आनंद लेना बहुत पसंद है, और 78% ने कभी न कभी इसके ज़रिए ऑर्गेज़्म महसूस किया है। यहाँ सबसे ज़रूरी बात आपका उत्साह है। उसे यह महसूस होना चाहिए कि आप इसे एक काम की तरह नहीं कर रहे हैं, बल्कि आप सच में इसे एन्जॉय कर रहे हैं। औसतन 20 मिनट की अवधि इसके लिए आदर्श मानी जाती है। उंगलियों और जीभ का सही तालमेल 92% महिलाओं को पसंद आता है। 5️⃣खुलकर बातचीत_करना बिस्तर पर खामोशी अक्सर केमिस्ट्री को खत्म कर देती है। आप क्या कर रहे हैं और वह कैसा महसूस कर रही है, इस पर खुलकर बात करना एक औसत अनुभव को शानदार बना सकता है। किन्से-समर्थित स्टडीज़ दिखाती हैं कि सेक्सुअलिटी पर खुलकर बात करना और अपनी पसंद-नापसंद साझा करना ज़्यादा ऑर्गेज़्म रेट से जुड़ा है। यह सोचना कि मैं सब जानता हूँ या उसकी इच्छाओं का सिर्फ अंदाज़ा लगाना अक्सर गलत साबित होता है। इसके बजाय, प्यार से पूछें, तुम्हें यह कैसा लग रहा है? या क्या तुम कुछ और चाहती हो? जब आप उसकी बात ध्यान से सुनते हैं, तो उसे महसूस होता है कि उसकी राय मायने रखती है, जिससे वह ज़्यादा रिलैक्स होकर आपके करीब आती है।

तृप्त ...🖤

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प्रियंका गांधी मेरे लिये एक वो शख़्स, जिनसे मुझे बेहद प्यार है - मतलब बहुत सारा वाला मैंने उन्हें जितना जाना है, जितना देखा है, उनके अंदर एक ग़ज़ब की कूवत है किसी को अपना बना लेने की वो एक बेहद संवेदनशील इंसान हैं, लेकिन उतनी ही साहसी भी हैं बेहिसाब मेहनती हैं और बेपनाह ज़िंदादिल भी उनके साथ काम करने में खूब मज़ा आता है - काम कभी बोझिल नहीं लगता- बहुत सारी हंसी-ख़ुशी के साथ काम होता है अपने परिवार के लिए वह शेरनी की तरह खड़ी रहती हैं और जनता की बुलंद आवाज़ बनकर दुनिया के सामने आती हैं मुझे याद है - 2022 के विधानसभा चुनाव में लाख विरोध के बावजूद उन्होंने महिलाओं को 40% टिकट देकर एक बहुत बड़ी पहल की मैंने उनकी निर्भीकता लखीमपुर में देखी है, हाथरस में देखी है, सोनभद्र में देखी है. पुलिस प्रशासन और सरकार के अन्याय के ख़िलाफ़ जब वो अड़ जाती हैं तो पीछे नहीं हटतीं वो बहुत ज़िद्दी हैं, एक बार कुछ ठान लिया तो कर के ही मानेंगी. ईश्वर में अटूट आस्था है, तमाम व्रत करती हैं और हर त्यौहार को पूरी रौनक़ से मनाती हैं लोगों का आदर और स्नेह वो अपने तक समेट कर नहीं रखतीं. खूब ज़ोर से गले लगाती हैं और ममता का सागर उड़ेल देती हैं वो महिला सशक्तिकरण की ध्वजवाहक हैं - और उतनी ही शिद्दत से एक माँ, पत्नी, बेटी और बहन होने का किरदार निभाती हैं मुझे याद है किसी ने उनसे एक बार यूपी में पूछा था कि आप 10 साल पहले राजनीति में क्यों नहीं आयीं? और उन्होंने बेझिझक होकर मुस्कुराते हुए कहा- क्योंकि तब मेरी बेटी 8 साल की थी! नवरात्रि के दौरान एक मंदिर से निकलीं और पत्रकार ने पूछ लिया आपने क्या माँगा? तो बोलीं बताया थोड़े ही जाता है - फिर मुस्कुरा कर बता ही दिया कि अपने बेटे के लिए प्रार्थना की लखनऊ में एक शाम पुलिस से जद्दोजहद के बाद उन्होंने पहला फ़ोन घर किया और बेटे से पूछा मामा की तबियत अब कैसी है? - राहुल जी को उस दिन बुख़ार था अपने पिता की लाडली प्रियंका जी की माँ से बेहद घनिष्ठता है. उन्हें अपनी माँ को हर परिस्थिति में इस देश के लिए काम करते देखा है. जिस दिन सोनिया जी ने अपना पदभार खरगे जी को सौंपा — उस दिन उनकी एक फोटो जिसमें उन्होंने राजीव जी की तस्वीर हाथ में ली हुई थी — उसके नीचे लिखा —So proud of you Ma, I know you did it all for love एक दिन उन्होंने हँस कर यह बताया था कि वह 19 साल की उम्र से करवा चौथ का व्रत रख रही हैं प्रियंका गांधी अन्याय तो रत्ती भर नहीं सहतीं और बेलगाम सत्ताधीशों की नकेल कसना उनके खून में है सालों से उन्होंने संगठन को मज़बूत करने का काम किया है, समस्याओं को पर्दे के पीछे रह कर सुलझाया है, पूरी बेबाक़ी से चुनाव प्रचार किया है, तमाम चुनाव लड़वाए और जितवाए हैं और अब उनकी बारी है. भारत की संसद को उनका इंतज़ार है— एक ऐसी शख़्सियत का जो ग़लत को पूरी ताक़त से ग़लत कहने की हिम्मत रखती हैं और सच और न्याय के लिए किसी लड़ाई से कभी पीछे नहीं हटतीं आप आधी आबादी के मिसाल बनेंगी जिनके लिए राजनीति कठिन मानी जाती है. आप हमारी आवाज़ बन कर संसद में गूंजेंगी. उम्मीदों का एक लंबा कारवाँ और देश भर का हौसला और मोहब्बत का सैलाब आपके साथ है और कह रहा है प्रियंका जी - विजयी भव! Priyanka Gandhi Vadra

Supriya Shrinate

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आज उदयपुर में उदयपुर संभाग में विभिन्न स्थानों से पधारे कांग्रेस कार्यकर्ताओं को नगरीय निकाय चुनावों को लेकर संबोधित किया : भाई, यह तो मीटिंग का रूप ले लिया। यह आपका जो उत्साह है, उसका प्रतीक है। उसके लिए आप बधाई के पात्र हैं। अभी पूरे प्रदेश में उत्साह है। ए भाई, बैठ जाओ आप लोग। पूरे प्रदेश में उत्साह है कार्यकर्ताओं में और मुख्य कारण उसका यही है कि सरकार तुम्हारी नहीं बनी, पर जो हमारे वक्त में स्कीमें थीं, योजनाएं थीं, वो इतनी शानदार थीं, सोशल सिक्योरिटी की भी थीं, विकास भी काफी हो गए। विधायकगण जो, जिन्होंने मांग करी विकास की, मैंने कहा तुम मांगते-मांगते थक जाओगे, मैं देते-देते नहीं थकूंगा। वही करके दिखाया और उसके कारण से गांव-गांव में वो स्कीमों का जो लाभ मिल रहा था, नई सरकार आते ही वो या तो रुक गया, या रोक दिया गया या बंद कर दिया गया। तो लोगों में बहुत भयंकर आक्रोश है, बहुत भयंकर आक्रोश। ऐसा मैंने आज तक कभी नहीं देखा, इतना गुस्सा गांव में और शहरों में, कस्बों में है। नगर निकाय के चुनाव होने वाले हैं। हमने उनके लिए भी नरेगा की तरह, कोई कानून नहीं था शहरों के लिए, तब भी हमने शहरी रोजगार योजना शुरू करी। नगर पालिकाओं को इतना फायदा हुआ कि वहां गरीब लोग रहते हैं शहरों में, उनको काम मिलने लग गया। बंद कर दी उसको। हमारे वक्त में 12 लाख पट्टे मिले हैं, ₹5 में या ₹500 में। अब ये ढाई साल हो गए इनको, बार-बार कैंप लगाते हैं, कैंप फेल होते हैं। कोई पट्टे बांट नहीं पा रहे, मामूली पट्टे बांटे होंगे। यह स्थिति सरकार की है। सड़कें खुदी पड़ी हैं, सीवरेज, पानी बह रहा है। बिल्डिंगें बन चुकीं अपने वक्त की, उद्घाटन तक नहीं कर रहे ये लोग। यह मुझे आश्चर्य होता है कि बिल्डिंग बन गई, करोड़ों रुपए खर्च हो गए। हमने इंतज़ार शास्त्र निकाला था, देखा आपने 20 दिन तक लगातार एक-एक स्कीम के बारे में लिखा। उस वक़्त सरकार घबरा गई पूरी तरह से, दो-तीन काम शुरू किए, वो आधे-अधूरे हैं वो भी। पर काम सब पड़े हैं ठप। तो समझ के परे है कि सरकार को क्या हो गया। काम क्यों नहीं कर पा रहे? ऐसा कुशासन कभी नहीं देखा गया। सरकार कम करती है, काम ज्यादा करती है पर इस बार तो भ्रष्टाचार की सीमा टूट गई है। ये जो बीजेपी, आरएसएस वाले लोग कहते थे चाल, चरित्र, चेहरा हमारा, वो जनता के सामने एक्सपोज हो गया पूरी तरह से, पूरी तरह एक्सपोज हो गए। जनता के रोज काम पड़ते हैं, बिना पैसे दिए काम होता ही नहीं किसी का। काम ही नहीं होता है। विकास ठप हो गया, स्कूलें बंद हो रही हैं, दवाएं मिलनी बंद हो गई हैं या कमजोर हो गई हैं। आरजीएचएस स्कीम को ठप कर दिया। अस्पताल वाले पैसा मांगने लग गए लोगों से इलाज का, जबकि ऑपरेशन फ्री थे। हार्ट का ऑपरेशन, घुटनों का ऑपरेशन, दवाएं फ्री, ऑपरेशन फ्री, जांचें फ्री, डायलिसिस फ्री, एमआरआई फ्री, सीटी स्कैन फ्री, 25 लाख तक का अपन ने इलाज फ्री किया और आज भी घर-घर में उसकी चर्चा है, क्योंकि बीमार कोई न कोई पड़ ही जाता है घर के अंदर। घर में बीमार पड़ता है ₹500, ₹5000, ₹50,000, ₹5 लाख खर्च हो जाते हैं। वो पैसे बचत हो गई। अब एक तरफ तो प्याज भी महंगा, शक्कर मिल नहीं रही है मार्केट से, गायब हो गई। ₹70 से पार कर गई उसकी, भाव उसका भी, शुगर का भी और ऊपर से जो स्कीमें थीं, वो स्कीमें उन्होंने कमजोर कर दीं हमारी। वो थैला दिया हम लोगों ने, गांव-गांव में थैला ले के फिर रहे हैं लोग ,अन्नपूर्णा योजना। अभी मेरे घर पे कोई एक थैला ले के आ गया, "साहब, इसको आप कहो सरकार को, वापस शुरू करे।" और वो कह रहा है, "साहब, आपकी फोटो हटा दे, खुद की लगा दे, स्कीम बंद क्यों कर रहा है?" यह भावना है। खाली थैला बांट दिया बाद में, खाली थैला। उसकी मजाक खूब उड़ी खाली थैले की भी। मैंने भी कहा, मुख्यमंत्री जी, आप थैला की स्कीम बंद क्यों कर रहे हो? अपनी फोटो लगा दो, मेरी फोटो हटा दो और कायदे की बात है बुरा मानने वाली बात नहीं, मुख्यमंत्री बदल गए हैं, तो फोटो उनकी लग जाएगी। इतनी शानदार स्कीम को बंद कर दिया। बुजुर्गों का, विधवाओं का, पांच-पांच, छह-छह महीने हो गए, पेंशन नहीं आती उनकी और तो और लोग मर जाते हैं बेचारे एक्सीडेंट में, मैंने ₹5 लाख की योजना बनाई कोई मर गया तो ₹5 लाख मिलेंगे, घर में दो मर गए ₹10 लाख मिलेंगे। 2,500, ढाई हजार लोगों का पैसा पेंडिंग है। सैंक्शन हो गया सरकार से, ट्रेजरी में रुक गया। 1/2.

Ashok Gehlot

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बिहार चुनाव के लिए महागठबंधन के मैनिफेस्टो तथा श्री राहुल गाँधी जी द्वारा जातिगत जनगणना के लिए किए प्रयासों पर मीडिया से बातचीत : तेजस्वी जी, दोनों मिल के कर रहे हैं, कल भी शायद जाएंगे वो कल भी है, इस प्रकार से अभियान शुरू हो चुका है, वैसे जब हम ने तेजस्वी का नाम घोषित किया था, तमाम राजनीतिक पार्टियों ने मिलकर के जो महागठबंधन में हैं और तब से ही एक प्रकार से अभियान शुरू हो गया था उस दिन से, और तेजस्वी जी भी बराबर दौरे कर रहे हैं, हमारी पार्टी के जो नेता लोग हैं तमाम लगे हुए हैं, ऑब्जर्वर भी अच्छा काम कर रहे हैं और दूसरा जो है राहुल गांधी जी की जो यात्रा शुरू हुई थी 16 दिन की उसके बाद में जो टेंपो बना, एक नैरेटिव क्रिएट हो गया कि भई इस प्रकार का 20 साल हो गए उनको सरकार में बीस साल हो गए और नीतीश कुमार जी ने कई पार्टियां बदलते गए, एलायंस करते गए, बनते बिगड़ते गए, उससे उनकी छवि भी अच्छी नहीं रही खराब, कहां तो वो प्रधानमंत्री के उम्मीदवार थे और कहां आज उनको बीजेपी वाले भी नहीं पूछ रहे हैं पूरी तरह से, बीजेपी चाहे वो अमित शाह जी हो चाहे कोई नेता हो कई तरह की बातें करते हैं कि हम तो चुनाव के बाद में देखेंगे कौन मुख्यमंत्री बनेगा,तो कहां तो पीएम बन रहे थे और कहां मुख्यमंत्री बनेंगे कि नहीं बनेंगे ये स्थिति बन गई, ठीक है न, उन स्थितियों में चुनाव हो रहा है, एक बात है कि इस बार धनबल का बहुत बड़ा खजाना इक्कठा हो गया है, लूट लिया है इन लोगों ने, इलेक्टोरल बांड के माध्यम से भी, वैसे भी, कोई कमी नहीं है पैसे की, वो प्रयोग देखा हम ने इनका महाराष्ट्र के अंदर, कोई कल्पना नहीं कर सकता जो पैसा बंटा वहां पर और चुनाव कैसे जीत गए एकतरफा ये पूरे देश को आश्चर्य हुआ, हार जीत की अलग बात है, पार्लियामेंट में हम लोग जीते थे और तीन चार महीने बाद में जो वहां पर सफाया हुआ सब पार्टियों का ये तो पूरे देश के लोगों को विश्वास नहीं हुआ, पूरे देश के लोगों को, हरियाणा के अंदर माइक्रो मैनेजमेंट कर लिया हम लोगों ने , चलो भई मान लेते हैं कुछ किया होगा,बराबरी पर आ गए लगभग प्वाइंटों में फर्क था पर महाराष्ट्र की तो हार जीत एक अजीबा है, मतलब एक प्रकार से रहस्य बना हुआ है तो ये जो राहुल जी का अभियान शुरू पहले ही हो गया टाइमली और मैं समझता हूं कि बिहार लोग पॉलिटिकली बहुत समझदार होते हैं, शुरू से ही मान्यता पूरे देश के लोगों की है कि बिहार में पॉलिटिकल सोच होती है अलग उनकी, उम्मीद करते हैं कि वहां बैकवर्ड भी हैं EBC वाले भी हैं, EBC का घोषणा पत्र एक प्रकार से राहुल जी ने वहां पर जारी करवाया है और जो कुछ जातिगत जनगणना की बात पहले बिहार ने करी थी, राहुल गांधी जी ने दबाव दिया सरकार पर पूरे देश के अंदर लागू होनी चाहिए, मना करते गए बीजेपी वाले पर आखिर में उनको मानना पड़ा, कैबिनेट का निर्णय हुआ दिल्ली के अंदर हम जातिगत जनगणना कराएंगे,ये राहुल जी की बहुत बड़ी विजय है। ये भी बिहारवासियों को मालूम है कि राहुल गांधी के कारण से पूरे मुल्क में जातिगत जनगणना अब प्रॉपर होगी, क्योंकि उनकी जातिगत जनगणना हुई थी बिहार की,उसको तो चैलेंज कर दिया सुप्रीम कोर्ट के अंदर, निर्णय हाईकोर्ट के सुप्रीम कोर्ट के आते गए वो लागू नहीं कर पा रहे थे और सरकार डबल इंजन की है तब भी ये सब चलता रहा, अब तो राहुल जी के दबाव से जो मोदी जी की गवर्नमेंट ने जो फैसला किया कि हम करवाएंगे बहुत बड़ी विजय उनकी है, सब जातियां उम्मीद कर रही थीं कि एक बार 1931 में हुई थी ये, 31 के बाद में कभी नहीं हुई, अब कम से कम एक आ गया मामला, मालूम पड़ेगा भई कौन जाति के कितने लोग हैं, तो जो स्कीमें बनेगी भारत सरकार की विभागों की या राज्यों की, तो एक साइंटिफिक वे से बन पाएगी तो एक अच्छा फैसला हो गया। ये तमाम बातें आपको मैं इसलिए बोल रहा हूं कि बिहार के चुनाव में एजेंडा के अंदर नैरेटिव के लिए ये काम आ रही हैं, लोगों में ये डिस्कशन होता है गांव गांव में और कस्बों के अंदर शहरों के अंदर। मैनिफेस्टो आया परसों, 28 को,कल ही , मैनिफेस्टो भी जो है पच्चीस लाख का बीमा उन्होंने कर दिया जो अपने यहां पर था, सबसे पॉपुलर स्कीम राजस्थान की ये रही है कि हर घर में इलाज फ्री हो गया, दवाइयां फ्री टेस्ट फ्री और ऑपरेशन फ्री ये बहुत बड़ा निर्णय किया बिहार के मैनिफेस्टो में महागठबंधन ने किया है, तो मैं समझता हूं कि एक मैसेज गया है, फिर जो और भी जो बिजली को लेकर पानी को लेके नौकरी को लेके, जो वादे किए गए मैनिफेस्टो में एक 35 साल का नौजवान जो है जिस प्रकार राहुल गांधी जी के साथ में दौरे किए वहां पर और अब जो है राहुल जी के दौरे के बाद में उसने जिस प्रकार से मैनिफेस्टो में अपनी भागीदारी निभाई भी है, राहुल गांधी की जो भावना थी पब्लिक क्या सोचती है उसके अकॉर्डिंग टू आप ये मैनिफेस्टो बनाओ, पब्लिक को पूछ के बनाओ, वो स्थिति बन चुकी है उसी में ये मैनिफेस्टो वहां पर बना है और उसका बड़ा इंपैक्ट रहेगा, तमाम स्कीमों का और तेजस्वी जी का मैंने कल सुना मैनिफेस्टो के बारे में भी डिस्कशन में देखा मैंने कि उनको पूरी, दो बार डिप्टी सीएम रहे हैं ,पूरी नॉलेज है उनको स्टेट की तमाम आंकड़े उनके सामने हैं साथ में हैं और वो मैं समझता हूं कि मजबूती के साथ में ये चुनाव जो है दंगल क्योंकि किसी ने ठीक कहा है कि ये तो चुनाव होता है लोकतंत्र के अंदर और ये युद्ध होता है तो चुनाव में लोकतंत्र में नॉन वॉयलेंस होता है, डेमोक्रेसी है कोई जीतो कोई हारो, और जो दंगल होता है संघर्ष होता है वहां क्या होता है वॉयलेंस होती है। युद्ध किधर लड़ रहे हैं, क्योंकि इनका विश्वास है ही नहीं डेमोक्रेसी के अंदर। युद्ध की तरह येन केन प्रकारेण साम दाम दंड भेद उसके माध्यम से चुनाव कहीं जीते हैं, ये उनकी थ्योरी है पूरे देश के अंदर, धर्म के नाम पर और कर दिया, हिंदू धर्म हिंदू धर्म, क्या बाकी लोग हिंदू धर्म के लोग नहीं हैं क्या ? आंकड़े बताते हैं कि कोई एक, ये जो इनकी पर्सेंटेज आ रही है वोटों की, चालीस से नीचे आ रही है, सौ वोट पड़ते हैं पोलिंग,उसका एक बार इकतीस परसेंट आ गया, एक बार छत्तीस परसेंट आ गया एक बार सैंतीस परसेंट आ गया, ऐसे ही तो आ रहे हैं, इसका मतलब सत्तर परसेंट लगभग तो लोग खिलाफ वोट दे रहे हैं इनके, पर किस बात का घमंड कर रहे हैं ये लोग ? ये चाहिए डेमोक्रेसी, संविधान की जो मूल भावना है उसके अनुसार चलें और जो हालात बन गए हैं देश में अहम् घमंड के कारण से, लोग बहुत चिंतित हैं, लोग जेलों में जा रहे हैं बिचारे , आलोचना करना तो देशद्रोही हो गया है यहां पर देश के अंदर, जबकि डेमोक्रेसी का तो मुख्य भाग है नॉन वॉयलेंस और सबको साथ में लेकर चलने वाली बात है, आलोचना को सुनने का माद्दा होना चाहिए, वो इनमें नहीं है। ये तमाम बातें जो हैं ये बिहार चुनाव में नैरेटिव बनेगा हमारा ये मैं कह सकता हूं। महागठबंधन को लेकर पूछे गए प्रश्न के उत्तर में : मैंने कहा न आपको कि इस बार चुनाव जीतना हमारे लिए बहुत जरूरी नहीं है, देश के लिए जरूरी है और ये चुनाव खाली बिहार का नहीं हो रहा है एक प्रकार से देश में मैसेज देने का चुनाव है कि हरियाणा के अंदर क्या हुआ, दिल्ली के क्या हुआ और महाराष्ट्र में क्या हुआ और इनको घमंड आ गया तो घमंड अगर रहता है, अहम् घमंड रहता है तो डेमोक्रेसी के अंदर वो उचित नहीं है, मैं मानता हूं अब इनको बीस साल के बाद में बदलाव चाहिए बिहार को, बदलाव होना चाहिए और पूरी ताकत लगाएगी महागठबंधन, तमाम हमारे महागठबंधन के पार्टनर हैं सब एकजुट हैं, लगे हुए हैं और हम लोग कामयाब हो जाएंगे। फसल खराबे का मुआवजा न मिलने के मुद्दे पर प्रश्न का उत्तर : क्या करें इनका, मुख्यमंत्री को पत्र लिख दिए, बार बार याद दिला रहे हैं इन लोगों को हम लोग, 22- 23 का मुआवजा नहीं मिला है भरतपुर के लोग भी आते हैं, जोधपुर डिविजन के लोग आते हैं कि वहां भी 23 का मुआवजा नहीं मिल रहा है किसानों को,आज 25 चल रहा है तो आप कल्पना कीजिए कि, अब फिर बरसात हो गई है तो नुकसान क्यों हो रहा है इनको, अर्जेंटली गिरदावरी करा के, आउट ऑफ वे बात करके, आउट ऑफ बॉक्स बात करके इनको चाहिए कि मुआवजे का प्रबंधन करें और मुआवजा फसलों का दें, किसान अगली फसल कैसे बोएगा ? उनके पास तो इतने ही साधन होते हैं, क्योंकि जो मोदी जी ने कहा था डबल इनकम कर देंगे वो तो अब नाम ले नहीं रहे हैं, न डबल इनकम हुई है, डबल इनकम हुई नहीं है तो ये बेचारे परेशान हैं लोग, उनको चाहिए कि ये किस प्रकार से टाइमली मुआवजा दें ये मेरी मांग है।

Ashok Gehlot

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प्रेस वक्तव्य: आतंक के सरगना बनने की होड लगी है मदनियों में; सर्वोच्च न्यायालय स्वत: संज्ञान ले: डॉ सुरेन्द्र जैन नई दिल्ली। नवंबर 30, 2025। कल भोपाल में जमीयत प्रमुख मौलाना मदनी द्वारा दिए गए कट्टरपंथी वक्तव्य की विश्व हिंदू परिषद ने कड़े शब्दों में निंदा करते हुए उनके विरुद्ध कठोर कार्यवाही की मांग की है। अपनी प्रतिक्रिया देते हुए विहिप के केंद्रीय संयुक्त महामंत्री डॉ सुरेन्द्र जैन ने आज कहा कि बड़े मदनी हों या छोटे मदनी, दोनों में मुस्लिम समाज को भड़काने की होड़ लगी है। दोनों जुटे हैं कि कौन पहले लादेन या बगदादी बनता है। उन्होंने कहा कि चांदनी चौक में जिस प्रकार का बम विस्फोट किया गया, पूरे देश में आतंकवादी घटनाएं करने की तैयारी पूरे देश में चल रही थी। एक पूरी यूनिवर्सिटी को जिस प्रकार से आतंकवादियों का अड्डा बना दिया गया था, केवल मदरसों में पढ़े हुए नहीं, सरकारी कॉलेज में पढ़े हुए डॉक्टर भी इस आतंकवादी गिरोह के सरगना बनकर खड़े हो गए। क्या इनको किसी भी तरीके से कोई डिफेंड कर सकता है? उनको डिफेंड करने के साथ-साथ ये दोनों मौलाना इस होड़ में लगे हैं कि भारतीय संविधान, न्यायपालिका, प्रशासन, हिंदू समाज और देश की समस्त व्यवस्थाओं के खिलाफ मुस्लिम समाज को कैसे भड़काया जा सके! डॉ जैन ने कहा कि क्या ये मौलाना नहीं जानते कि कहीं रोटियों पर थूक लगाया जा रहा है, कहीं लव जिहाद के नाम पर हिन्दू बहनों से बलात्कार कर उनके टुकड़े किए जा रहे हैं! कल ही एक मामले में कोर्ट ने अपना निर्णय सुनाया है। ऐसे सब मामलों पर पर्दा डालने के लिए ही शायद इन्होंने मुस्लिम समाज को भड़काने का यह मार्ग अपनाया है। उन्होंने चेताया कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय के विरोध में जिस प्रकार का वक्तव्य इन्होंने दिया है वह घोर आपत्तिजनक है। कब तक बाबरी मस्जिद का रोना रोते रहोगे? यह ध्यान कर लेना कि बाबर और बाबरी के नाम पर कोई अवशेष अब भारत की जनता स्वीकार नहीं करेगी! मुस्लिम समाज का बाबर से क्या लेना देना? उस विदेशी दुष्ट के नाम पर आप बार-बार मुस्लिम समाज को भड़काना चाहते हैं? चाहे वक़्फ़ बोर्ड का मामला हो या ट्रिपल तलक का, सब देश हित में उठाए गए संसदीय कदम ही तो हैं! वक्त बोर्ड और हलाल सर्टिफिकेशन के ऊपर जो पूरे देश में वातावरण बन रहा है और उसके नाम पर तुमने जो लूट मचा रखी थी, वह सामने आ गई तो बौखला गए? उस पैसे का उपयोग आतंकवादियों का केस लड़ने, हिंदुओं पर हमला करने वाले लोगों की सुरक्षा और उनको बचाने के लिए कर रहे थे! इसी की परेशानी है आपको? ये भाषण घोर आपत्तिजनक और देश के विरुद्ध खुली बगावत का ऐलान है जिसको कदापि स्वीकार नहीं किया जा सकता। मैं माननीय सर्वोच्च न्यायालय से अपील करूंगा स्वत: संज्ञान लें और इन राष्ट्रविरोधी वक्तव्यो के ऊपर लगाम लगाएं और इन लोगों को इनकी सही जगह बताएं! हम इनके भाषणों का अध्ययन करेंगे, जो कानूनी कार्यवाही करनी है वह भी करेंगे लेकिन ध्यान कर लेना कि तुम मुस्लिम समाज को बर्बादी की ओर ले जा रहे हो! किसी भी प्रकार से इस बगावत को सहन नहीं किया जाएगा। हर स्तर पर इसका मुकाबला किया जाएगा। जारी कर्ता: विनोद बंसल राष्ट्रीय प्रवक्ता विश्व हिंदू परिषद

Vishva Hindu Parishad -VHP

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