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हे पार्थ... रथ यही रोक दो... मैं दूध पीने जा रहा हुं...🙈🥵

175,963 Aufrufe • vor 1 Jahr •via X (Twitter)

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जहाँ एक तरफ़ गरीब आदमी दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहा है… वहीं दूसरी तरफ़ गोदामों में इंसानियत को शर्मसार करने वाला खेल चल रहा है। 👉 बोरियों में भरे गेहूं पर पानी डालकर वजन बढ़ाया जा रहा है… 👉 अनाज को जानबूझकर खराब किया जा रहा है… 👉 और ये सब उस अनाज के साथ, जो किसी गरीब के घर की रोटी बन सकता था! ये सिर्फ चोरी नहीं है… ये गरीब के पेट पर सीधा वार है! 💔 सोचिए, जिस अनाज से किसी का चूल्हा जलना था, उसी के साथ ऐसा धोखा… क्या यही सिस्टम है? क्या यही जिम्मेदारी है? अब वक्त है सवाल पूछने का… अब वक्त है आवाज़ उठाने का… रोटी के साथ खिलवाड़ बंद करो! गरीब का हक़ लौटाओ!

सिंह साहिबा

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सावन माह का आरंभ हो गया। पूरे सावन शिवलिंग पर दूध चढ़ाया जाएगा। शिवालयों से लेकर बूढ़े बरगद, युवा पीपल के नीचे बैठे भोले बाबा तृप्त मिलेंगे। मुस्कराते हुए। दस साल पहले सोशल मीडिया, कारोबारी टीवी की बहस में दलील दी जाती थी, शिवलिंग पर दूध चढ़ाने का क्या लाभ? लाखों-करोड़ों गरीब बच्चे हैं, उन्हें दीजिए! पुण्य होगा! वामपन्थी था तो मुझे भी लगता, बात तो सही है, गरीबों को दिया जाए! प्रतीकात्मक रूप से दो-चार बूंद शिवलिंग को अर्पित कर दें। सन 2018 में जब चंबल के गुर्जर गौपालकों के बीच रहने पहुंचा तो दूध चढ़ाने के #विज्ञान का रहस्य समझ आया। सावन का दूध मनुध्य क्या, गौ अपनी संतान को भी बहुत थोड़ा पिलाती है। वैसे तो गौपालक ही रोक देते हैं। प्रकृति के नियम अनुशासन से होली के आसपास गौ के बच्चे होते हैं, जो सावन तक चार-पांच माह के हो चुके होते हैं, मां के दूध की उतनी आवश्यकता भी नहीं रहती। पर्याप्त हरा चारा, कोमल दूब उपलब्ध रहती है। सावन के दूध को मानव शरीर नहीं पचा सकता। कारण है प्रकृति। हरे चारे में गांठ नहीं बन पाती। गौ मां की पाचन शक्ति भी दुर्बल हो जाती है। गोबर पतला, पानी की तरह हो जाएगा। मनुष्य पी ले तो दस्त लग जाएंगे। दूध क्या, मट्ठा भी पी कर पचाना असंभव है। स्वयं पर प्रयोग करके देखा है। मात्र घी बन सकता है। आपका सवाल है, शहर में हमें क्यों नहीं ऐसा अनुभव होता है? उत्तर है, एक शहरी को #प्राकृतिक_दूध कहां मिलता है? सावन-भादो में जब दूध बहुतायत होगा, तो फैक्ट्रियों में #मिल्क_पावडर बना कर स्टोर होगा। फिर साल भर उसी पाउडर को मिलाकर दूध बनेगा। वही एक शहरी को #पैक्ड होकर मिलता है। कभी स्वयं से एक सवाल कीजिए..क्या प्रकृति में सभव है दूध में फैट यानी वसा का अनुपात साल के बारह महीने एक समान रहे? प्रकृति में असंभव है। फैक्ट्री में संभव है। एक हिन्दू की आस्था में दूध, खासकर गौ के दूध का सम्मान है। फेंक नहीं सकता। अन्य को पीने के लिए भी दे नहीं सकता। अहित होगा। सो एक ही रास्ता, #प्रभु को अर्पित कर दो। लेकिन किस प्रभु को? उन्हीं को जो #गरल पीने की क्षमता रखते हैं...#महादेव को। आखिरी बात..फिर शिवलिंग को अर्पित दूध को पीता कौन है? #कुत्ते पीते हैं। जो मंदिर के बाहर शिवलिंग पर चढ़ाए जा रहे दूध को पीते मिलेंगे। संभवतः एकमात्र कुत्ता ही है जो सावन के दूध को पी कर पचाने की क्षमता रखता है..तभी भोलेनाथ का #गण है कुत्ता भी। #प्रकृति की गूढ़ता को जाने बिना #हिन्दू_आस्था और #उपासना_पद्धतियों पर सवाल उठाना विशुद्ध मूर्खता है। और इस मूर्खता का सार्वजनिक प्रदर्शन #आधुनिक_शिक्षित बार-बार करता है। हर!हर! महादेव!

सुमन्त

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आज मैं अपने किसी काम से मथुरा जा रहा था, अलीगढ़ पहुंचने पर गाड़ी में CNG भरवाने के लिए मैंने एक पेट्रोल पंप पर गाड़ी रोक ली... मुझसे आगे करीब 10 गाड़ी लाइन में लगी हुई थी, इसलिए मैं गाड़ी में बैठा हुआ अपने नंबर का इंतजार कर रहा था... तभी मेरे पीछे एक गाड़ी आके रुकी, जिसमें से कुछ लड़कियों ने गाड़ी से उतरते ही डांस करना शुरू कर दिया... उनका डांस इतना शानदार था कि देखते ही देखते पेट्रोल पंप पर लोगों की भीड़ लगनी शुरू हो गई... कुछ लोगों ने तो उन पर जमकर पैसे लुटाए... जब मेरी गाड़ी में CNG भर गई तो एक पेट्रोल कर्मचारी ने बताया हमारे अलीगढ़ की किन्नर कि खूबसूरती देखकर कोई भी ये नही कह सकता है कि ये लड़कियां नहीं है... मुझे उसकी बात सुनकर ताज्जुब हुआ, क्योंकि अब तक तो मैं भी उनको लड़कियां ही समझ रहा था...

Amit Tomar

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