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हम ही हमको काट रहे हैं, हम ही हमको बाँट रहे हैं। हम ही हैं जो पाटें खाई, हम ही हैं जो करें खुदाई।💐🙏
10 Kommentare

जबर्दस्त! बेहतरीन! अविश्वसनीय! आश्चर्य कतई नहीं हो रहा है कि आपने इतनी उम्दा कृति समर्पित की है क्योंकि यह अब तो आपकी लेखनी की अपेक्षा बन चुकी है। फिर भी मुझे यह रचना बहुत अच्छी लगी। आपको बहुत बहुत बधाई और साहित्य साधना की इस अमर यात्रा के लिए अभिनन्दन! @ranaashutosh10

सराहना सद्भावना हेतु हार्दिक धन्यवाद प्रणाम 🙏💐

अद्भुत राणा साहब... आपका दर्शन पर ज्ञान अतुल्य है... देश की धरोहर हैं आप... युवापीढ़ी आपसे बहुत प्रेरित होती है... निःशुल्क मार्गदर्शक पाठशाला चले तो पूरी दुनिया आपके सत्ज्ञान से लाभान्वित होगी... यह सुझाव मात्र है। सादर

सादर प्रणाम 🙏

बहुत सुंदर रचना सर और उतना ही प्रभावशाली पाठ। अंतिम पंक्ति में एक सशक्त संदेश देते हुए आप जिस तरह से ‘हम ही हैं जो जोड़ रहे हैं’ पंक्ति पढ़ते हैं, वह मन में एक उत्साह और कर्तव्यबोध का संचार करती है मानो दुनिया का सब टूटा एक दिन ज़रूर जुड़ जाएगा या हम सब मिलकर उसे जोड़ देंगे 🙏🙏

बहुत ज़रूरत है देश को इस वक्त आप जैसे ख्यालात वाली शख्सियतों की । छोड़िए घर आंगन , आइए मैदान में कीजिए दो दो हाथ उनसे जो बांट रहे समाज ।

एक-एक बात सच्चाई की गहराई लिये हुए...बहुत ही सुंदर👌👏आप जब अभिनय करते हो तो पात्र को जीवंत कर देते हो...और जब साहित्य रचते हो तो अपने शब्द से आध्यात्म को जीवंत कर देते हो🙏💖कम शब्दों में अपनी प्रभावशाली आवाज में कितना कुछ कह जाते हो..हमको हमसे ही मिलवा जाते हो🙏💐 जयसीताराम🙏✨

आपकी सहृदयता का आदर करता हूँ प्रणाम 🙏

हे सरस्वती मैया के लाल .गाडरवारा की आन बान शान हम सबके अभिमान ..भाई दा जबाब नही👌🙏🌹🙏

प्रिय भाई मिनेंद्र हार्दिक प्रणाम 💐🙏




