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𝘾𝙝𝙪𝙙𝙖𝙞.........

201,081 次观看 • 2 年前 •via X (Twitter)

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जब कोई “भीमटी” कहता है तो “भीम” का नाम गूंजता है , जब कोई “नीलचट्टी” कहता है तो नीला रंग याद आता है जो समता और सामाजिक न्याय का प्रतीक है। ये शब्द हमें मज़बूत करते हैं। हम महिलाओं से ना कोई हमारी आवाज़ छीन सकता है, ना समाज और ना ही समाज का समर्थन। चाहे मैं हूँ, “कंचना यादव” हों या “सारिका पासवान” तीनों बहुजन महिलाएं हैं, जिन्होंने बेड़ियों में बंधने से इनकार किया है। बाबा साहब ने हमारी बेड़ियों से हमें मुक्त किया, उन बेड़ियों में हम दुबारा क़ैद नहीं हो सकते। नफ़रत, हिंसा, पितृसत्ता और जातिवाद के ख़िलाफ़ “उलगुलान” था, है और जारी रहेगा। We can be defeated but cannot be destroyed. We’ll rise from own ashes and wipe out the casteist and communal forces. Together we stand , together we rise.

Priyanka Bharti

1,823,816 次观看 • 7 个月前

मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र इस दुनिया को अलविदा कह गए। उनकी साँसें थमीं, तो दुनिया से उनके चले जाने की ख़बर आ गई। किसी शायर/साहित्यकार का कलम ही उसकी साँसें होती हैं। बशीर साहब डेढ़ दशक से भी ज्यादा समय से लिखना बंद कर चुके थे, मुशायरों से उनका रिश्ता बिल्कुल टूट चुका था। उन्हें डिमेंशिया नामक बीमारी हो गई थी, इस बीमारी में याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता लगभग खत्म हो जाती है। क़ुदरत के खेल भी कितने निराले हैं, वह इंसान जिसकी लिखी ग़ज़लें मुझ जैसे जाने कितने लोगों को मुँह ज़बानी याद हैं, उस शख्स को बीमारी भी ऐसी हुई कि वो अपना ही लिखा याद नहीं रख पाया। उनकी ग़ज़लों के ऐसे कितने ही अशआर हैं, जो हर उस शख्स को मुँह ज़बानी याद हैं, जिसे शायरी से ज़रा भी लगाव है। बशीर बद्र लंबे समय से अपने घर की ही चारदिवारी में कैद थे, वो शख्स जिसने कभी लिखा था- बे-वक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा। वही बशीर बद्र डेढ़ दशक तक घर में ही रहे, और घर से ही विदा हो गए। जबकि उन्हीं बशीर बद्र ने क़रीब चार दशक तक मुशायरों पर राज किया था, उन चार दशकों में वो शायद ही ‘वक्त पर घर’ गए हों। तभी उन्होंने लिखा था- कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं कहाँ दिन गुज़ारा कहाँ रात की। उनके कलम से निकले ऐसे कितने ही शेर हैं, जो ज़िंदगी की अक्कासी कराते हैं। उनका अंदाज़, उनकी आवाज़, उनका लहजा ऐसा है जो सीधे इंसान के दिल में उतर जाता है। यह शेर देखें। दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों। सात संदूक़ों में भर कर दफ़्न कर दो नफ़रतें आज इंसाँ को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत। हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा यह ऐसा मश्विरा जिसे हर किसी ने किसी दूसरे को दिया होगा, लेकिन बशीर बद्र ने इसे शायरी बना दिया। बशीर चले गए, जाना तो सभी को ही है। लेकिन बशीर अपनी शायरी का ऐसा जादू छोड़कर गए हैं, जो उन्हें भूलने नहीं देगा। अलविदा बशीर साहब। आपको आपके ही शेर के साथ खिराज़-ए-अक़ीदत! सब लोग ये कहते हैं कि तुम लौट गए हो तुम साथ थे तुम साथ हो तुम साथ रहोगे।

Wasim Akram Tyagi

14,798 次观看 • 25 天前