वही तो फ़ैसला करता है, पत्थर के मुक़द्दर का!
किसे ठोकर पे रखना है, किसे संग-ए-असवद बनाना है।
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कहाँ सवालों के तुमसे जबाब मांगते हैं। हम अपनी आँखों के हिस्से के ख्वाब मांगते हैं। हमी को दरिया पे जाने से रोकने वाले... हमी से पानी का सारा हिसाब मांगते हैं। ~वसीम साहब