
Medha Yadav
@Medhareports • 28,942 subscribers
नागरिक ज़िम्मेदार हूँ। Tweets ठोस निजी हैं। काम जारी है @jist_news के साथ
Shorts
Videos

बिहार में 4 हज़ार वेकेंसीज़ के लिए 14 लाख लोग परीक्षा देने पहुंचे। स्टेशन पर जो लोग मौजूद थे, जो बच्चे ट्रेन में चढ़ने की कोशिश कर रहे थे वो सब आम थे, उनमें कोई सरकारी अफ़सर या मिनिस्टर का बच्चा नहीं था। जो सिस्टम परीक्षा आयोजित करवाता है क्या उसके पास ये डेटा नहीं होता कि कितने बच्चों ने फॉर्म भरा है और उनको क्या-क्या व्यवस्था करनी होगी? ये तो पेपर लीक जैसी लापरवाही से बहुत पहले की बातें हैं।
Medha Yadav135,599 görüntüleme • 10 gün önce

धनबाद की एक और जगह, कोयले की ख़ानों के आस-पास बसी बस्तियाँ इसी तरह रहती हैं। डंपर वाले को थोड़े बहुत पैसे देकर कोयला गिराते हैं, फिर उसे फुटकर में बेचते हैं। ग़रीबी की वजह से मूलभूत सुविधाओं से ये लोग इतने दूर हैं कि रोज़ाना कुछ कमा पाना ही इनका दीर्घकालिक लक्ष्य बन जाता है।
Medha Yadav342,492 görüntüleme • 1 yıl önce

When did the last time you laugh without listening to a joke? 🙊
Medha Yadav74,776 görüntüleme • 4 ay önce

शिक्षा कैसे पुल बनती है ये इसका उदाहरण रहा। झारखंड के जामताड़ा का एक गाँव, भाषा समझने में थोड़ी मुश्किल हो रही थी। तब वहाँ ये बच्ची मिली, अर्पिता नाम था। फिर उतनी देर के लिए अर्पिता मेरी अनुवादक रही, उसकी वजह से मैं वहाँ के लोगों की बात आप तक पहुँचा पायी। जब बेसिक शिक्षा इतनी दूरी पाट सकती है तो सोचती हूँ यहाँ भरपूर मौक़े पहुंचना कितना कुछ बदल देंगे।
Medha Yadav186,648 görüntüleme • 11 ay önce

हम में से किसी ने भी अपनी जाति मर्ज़ी से नहीं चुनी। लेकिन फिर भी हम में से कुछ लोग अपनी जाति पर गर्व करते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जिन्हें जीवनभर जाति की वजह से अपमान झेलना पड़ता है। ये रिपोर्ट देखकर शायद आप समझ पाएंगे कि देश में ऊँची और नीची जाति के बीच की खाई को जीना क्या होता है।
Medha Yadav130,537 görüntüleme • 8 ay önce

गैंगरेप को लेकर एक महिला मुख्यमंत्री का फूहड़ और बेतुका बयान सुनने के बाद फिर से ये शेयर कर रही हूँ। जगह भी कोलकाता ही थी, और रात के करीब 1:30 बज रहे थे, जब ये बात मैं RG कर मेडिकल कॉलेज से थोड़ी दूर खड़े होकर बोल रही थी। माहौल ऐसा था कि कैब ड्राइवर भी डर की वजह से छोड़कर जा चुके थे। लेकिन मैंने वहाँ खड़े रहना चुना, रोते चीखते लोगों को सुनना चुना। उस वक्त वही मेरा दायित्व था। बाहर तो उसको नहीं निकलने देना चाहिए जो समाज के लिए लोगों के लिए खतरा है। ग़ज़ब हाल है मानसिकता का!
Medha Yadav129,694 görüntüleme • 8 ay önce

ये हो गया स्वागत बिहार में। बिहार चुनाव का पहला वीडियो पटना के गांधी मैदान से।
Medha Yadav85,069 görüntüleme • 8 ay önce

क्या पत्रकारिता का पैमाना सरनेम तय करेगा? ऐसा पहली बार नहीं हुआ मेरे साथ कि मेरी मेहनत मेरी रिपोर्टिंग को एक झटके में मेरे सरनेम तक समेट दिया गया हो, यही उस गहरी बीमारी का सबूत है जिसे Ingrained discrimination कहते हैं। मैं पहलगाम अटैक के दौरान भीड़ से घिरी थी, ऑपरेशन सिंदूर में बॉर्डर पर थी, अलग अलग चुनाव में जातिविशेष के गढ़ में थी और इन सब जगह मैं एक रिपोर्टर ही थी, जो अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रही थी।
Medha Yadav48,086 görüntüleme • 4 ay önce

हमने देखा कि बाँटना और बँटना दोनों आसान हैं। इस संवेदनशील मुद्दे पर बहुत सी चुप्पियाँ देखीं, और देखे मुखर वक्तव्य भी। ख़ासकर छात्र दो हिस्सों में बँट गए हैं। एक वो जिन्होंने UGC के नए रेगुलेशंस आने पर विरोध किया और दूसरे वो जो उसके समर्थन में सड़कों पर उतर आए।
Medha Yadav46,867 görüntüleme • 4 ay önce

कोई शायर जब अपने शेर, अपनी ग़ज़ल भूलने लगे, जब याद दिलाने पर भी याद ना आए कुछ तो कैसा लगता होगा। शायद बेचैनी होती होगी, मगर जब कुछ याद नहीं रहता तो क्या याद रहता है? क्या उन्हें ये मालूम होता होगा कि उनके शेर दुनिया को याद रहने लगे, लोग खुदको उनमें ढूँढने लगे। जब कोई उलझा हुआ व्यक्ति किसी से ये कहता हो कि “परेशाँ हो तुम भी परेशाँ हूँ मैं भी चलो मय-कदे में वहीं बात होगी” तो कितनी गिरहें सुलझती होंगी। पता नहीं कोई शायर किसी ग़ज़ल का इतना बड़ा हो जाना, किसी नज़्म का आसमान हो जाना महसूस कर भी पाता होगा या नहीं, लेकिन हम दूर से देखने सुनने और इस लिखे हुए को पढ़ने वाले लोग कितना मुस्कुराते हैं, कितना महसूस करते हैं, कितना जीते हैं इन अल्फ़ाज़ के बूते पर। क्या खूब ज़िंदगी रही हमारे सामने, क्या खूब बीती होगी वो शायर जाने। जहाँ रहें सुकूँ में रहें, बशीर बद्र साहब! 💫🙏🌸
Medha Yadav12,590 görüntüleme • 28 gün önce

इस बार भी दिवाली घर से दूर वाली है। जब हम घर से दूर होते हैं तो आस-पास की दुनिया और चीज़ों में अपना घर ढूँढते हैं। बिहार में राघोपुर विधानसभा में थी, बाज़ार लगा था तो शगुन के खील-बतासे और दीये ख़रीद लिए। ये भाई पटना बाज़ार समिति में पढ़ते हैं और त्योहार पर अपने घर, पिता जी का हाथ बँटवाने आए हैं। (साथ ही अगली बार से कपड़े का थैला रखा करूँगी शूट पर।) सभी को दिवाली की शुभकामनाएं। 🪔
Medha Yadav59,962 görüntüleme • 8 ay önce