
Medha Yadav
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नागरिक ज़िम्मेदार हूँ। Tweets ठोस निजी हैं। काम जारी है @jist_news के साथ
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बिहार में 4 हज़ार वेकेंसीज़ के लिए 14 लाख लोग परीक्षा देने पहुंचे। स्टेशन पर जो लोग मौजूद थे, जो बच्चे ट्रेन में चढ़ने की कोशिश कर रहे थे वो सब आम थे, उनमें कोई सरकारी अफ़सर या मिनिस्टर का बच्चा नहीं था। जो सिस्टम परीक्षा आयोजित करवाता है क्या उसके पास ये डेटा नहीं होता कि कितने बच्चों ने फॉर्म भरा है और उनको क्या-क्या व्यवस्था करनी होगी? ये तो पेपर लीक जैसी लापरवाही से बहुत पहले की बातें हैं।
Medha Yadav135,599 次观看 • 10 天前

धनबाद की एक और जगह, कोयले की ख़ानों के आस-पास बसी बस्तियाँ इसी तरह रहती हैं। डंपर वाले को थोड़े बहुत पैसे देकर कोयला गिराते हैं, फिर उसे फुटकर में बेचते हैं। ग़रीबी की वजह से मूलभूत सुविधाओं से ये लोग इतने दूर हैं कि रोज़ाना कुछ कमा पाना ही इनका दीर्घकालिक लक्ष्य बन जाता है।
Medha Yadav342,492 次观看 • 1 年前

शिक्षा कैसे पुल बनती है ये इसका उदाहरण रहा। झारखंड के जामताड़ा का एक गाँव, भाषा समझने में थोड़ी मुश्किल हो रही थी। तब वहाँ ये बच्ची मिली, अर्पिता नाम था। फिर उतनी देर के लिए अर्पिता मेरी अनुवादक रही, उसकी वजह से मैं वहाँ के लोगों की बात आप तक पहुँचा पायी। जब बेसिक शिक्षा इतनी दूरी पाट सकती है तो सोचती हूँ यहाँ भरपूर मौक़े पहुंचना कितना कुछ बदल देंगे।
Medha Yadav186,648 次观看 • 11 个月前

हम में से किसी ने भी अपनी जाति मर्ज़ी से नहीं चुनी। लेकिन फिर भी हम में से कुछ लोग अपनी जाति पर गर्व करते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जिन्हें जीवनभर जाति की वजह से अपमान झेलना पड़ता है। ये रिपोर्ट देखकर शायद आप समझ पाएंगे कि देश में ऊँची और नीची जाति के बीच की खाई को जीना क्या होता है।
Medha Yadav130,537 次观看 • 8 个月前

गैंगरेप को लेकर एक महिला मुख्यमंत्री का फूहड़ और बेतुका बयान सुनने के बाद फिर से ये शेयर कर रही हूँ। जगह भी कोलकाता ही थी, और रात के करीब 1:30 बज रहे थे, जब ये बात मैं RG कर मेडिकल कॉलेज से थोड़ी दूर खड़े होकर बोल रही थी। माहौल ऐसा था कि कैब ड्राइवर भी डर की वजह से छोड़कर जा चुके थे। लेकिन मैंने वहाँ खड़े रहना चुना, रोते चीखते लोगों को सुनना चुना। उस वक्त वही मेरा दायित्व था। बाहर तो उसको नहीं निकलने देना चाहिए जो समाज के लिए लोगों के लिए खतरा है। ग़ज़ब हाल है मानसिकता का!
Medha Yadav129,694 次观看 • 8 个月前

क्या पत्रकारिता का पैमाना सरनेम तय करेगा? ऐसा पहली बार नहीं हुआ मेरे साथ कि मेरी मेहनत मेरी रिपोर्टिंग को एक झटके में मेरे सरनेम तक समेट दिया गया हो, यही उस गहरी बीमारी का सबूत है जिसे Ingrained discrimination कहते हैं। मैं पहलगाम अटैक के दौरान भीड़ से घिरी थी, ऑपरेशन सिंदूर में बॉर्डर पर थी, अलग अलग चुनाव में जातिविशेष के गढ़ में थी और इन सब जगह मैं एक रिपोर्टर ही थी, जो अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रही थी।
Medha Yadav48,086 次观看 • 4 个月前

कोई शायर जब अपने शेर, अपनी ग़ज़ल भूलने लगे, जब याद दिलाने पर भी याद ना आए कुछ तो कैसा लगता होगा। शायद बेचैनी होती होगी, मगर जब कुछ याद नहीं रहता तो क्या याद रहता है? क्या उन्हें ये मालूम होता होगा कि उनके शेर दुनिया को याद रहने लगे, लोग खुदको उनमें ढूँढने लगे। जब कोई उलझा हुआ व्यक्ति किसी से ये कहता हो कि “परेशाँ हो तुम भी परेशाँ हूँ मैं भी चलो मय-कदे में वहीं बात होगी” तो कितनी गिरहें सुलझती होंगी। पता नहीं कोई शायर किसी ग़ज़ल का इतना बड़ा हो जाना, किसी नज़्म का आसमान हो जाना महसूस कर भी पाता होगा या नहीं, लेकिन हम दूर से देखने सुनने और इस लिखे हुए को पढ़ने वाले लोग कितना मुस्कुराते हैं, कितना महसूस करते हैं, कितना जीते हैं इन अल्फ़ाज़ के बूते पर। क्या खूब ज़िंदगी रही हमारे सामने, क्या खूब बीती होगी वो शायर जाने। जहाँ रहें सुकूँ में रहें, बशीर बद्र साहब! 💫🙏🌸
Medha Yadav12,590 次观看 • 28 天前

इस बार भी दिवाली घर से दूर वाली है। जब हम घर से दूर होते हैं तो आस-पास की दुनिया और चीज़ों में अपना घर ढूँढते हैं। बिहार में राघोपुर विधानसभा में थी, बाज़ार लगा था तो शगुन के खील-बतासे और दीये ख़रीद लिए। ये भाई पटना बाज़ार समिति में पढ़ते हैं और त्योहार पर अपने घर, पिता जी का हाथ बँटवाने आए हैं। (साथ ही अगली बार से कपड़े का थैला रखा करूँगी शूट पर।) सभी को दिवाली की शुभकामनाएं। 🪔
Medha Yadav59,962 次观看 • 8 个月前