
Manish Singh
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गिरती हुई दीवार का हमदर्द हूं लेकिन चढते हुए सूरज की, परस्तिश नही करता
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विकास तिवारी Bastar Talkies के नाम से एक यू ट्यूब चैनल चलाते हैं। वही बस्तर जो टंगिया, तुम्बा, ढ़ोल, मुर्गा, लंगोट, आग, मचान औऱ घोटूल से ज्यादा- माओवादी आतंकियों के लिए पहचाना जाता रहा है। औऱ जहां रिपोर्टिंग औऱ पत्रकारिता, आत्महत्या की अनिच्छुक कामना से अलग कुछ भी नहीं, वहाँ विकास ने पत्रकारीय कर्म को उस साहस, औऱ उस गरिमा से निभाया है, जो इस देश के बड़े बड़े नामचीन पत्रकारों मे दुर्लभ है। •• दिल्ली के किसी कार्यक्रम मे उनके उदबोधन का एक वीडियो निगाह मे आया। कौतूहल वश देखना शुरू किया, तो अंत तक पूरा सुनने से खुद को रोक नहीं पाया। आप भी सुने। पूरा.. उनके चैनल का लिंक इस वीडियो से लें। औऱ कुछ नहीं, तो एक थम्स अप तो कर ही सकते है। •• विकास भाई, हम एक दूसरे को नहीं जानते। मगर आपके काम को सलामी कबूल करें। इस शानदार उद्बोधन के लिए भी। ❤️🙏
Manish Singh145,033 görüntüleme • 8 gün önce

छि छि। धर्म भ्रष्ट होई गवा मेरा। गोमूत्र की बोतल लाओ ऱये कोई.. 😓
Manish Singh287,452 görüntüleme • 2 yıl önce

नेहरू ने दिलवा दी चीन को वीटो पॉवर.. अबे साले...!!! चीन, सिक्योरिटी काउंसिल का फाउंडर मेम्बर था। उनके पास 1945 से ही वीटो पॉवर थी। नेहरू के PM बनने के ढाई साल पहले से.. ●● लेकिन लोचा ये हुआ,कि जब 1949 में चीन में कम्युनिस्ट तख्तापलट हो गया। माओ के नए रेजीम को UN ने मान्यता नही दी। इसलिए वह वीटो पॉवर का इस्तेमाल नही कर सकता था। ऐसा तब तक रहा जब तक कि चीन की मान्यता, UN मेम्बरशिप और वीटो पॉवर रिस्टोर न हो गयी। वो रिस्टोर हुई - 25 अक्टूबर 1971 को नेहरू के मरने के 7 साल बाद। ●● तो जो चीज, चीन के पास नेहरू के पीएम बनने के पहले से थी, और खो जाने पर, नेहरू के मरने के 7 साल बाद मिली.. उसे नेहरू ने दिलवा दिया, नेहरू ने दिलवा दिया नेहरू ने दिलवा दिया। अबे घोंचू!! स्वर्ग से दिलवा दिया। ●● टाई लगाकर, सूट पहनकर, शानदार रोशनी में, कंडेनसर माइक के सामने, HD हाई कैमरा पे अपनी जहालत की दुकान पसारे, ये बेवकूफ कौन है, मुझे नही पता। लेकिन इस चवन्नी छाप पॉडकास्टर को कोई जानता हो तो बता दे। ये जो कागज पढ़कर सुना रहा है, - इंफॉर्मली सजेशंस हैव... पहला शब्द-इंफॉर्मली अबे साले। इंफॉर्मली!!! इंफॉर्मली!! इंफॉर्मली!! ●● ये यूनाइटेड नेशंस है। किसी जिले की कलक्टरी नही, की मंत्री जी कमीशन लेकर पोस्टिंग दिलवा देंगे। यूएन के चार्टर (सम्विधान) में सिर्फ 5 परमानेंट सीट का प्रावधान है। छठवां जोड़ने के लिए चार्टर में संशोधन आएगा। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्ताव होगा। इसके लिए दुनिया के दो तिहाई देशो का बहुमत लगेगा। बशर्ते कि पांच बड़े में से कोई एक वीटो न कर दे। ●● चीन की जगह भारत को लाने के लिए भी ठीक यही प्रक्रिया होगी। लेकिन ऐसा होगा नही, बस लड़ाई लगाने की बात है। अमेरिका हो रशिया, या कोई और देश। इत्ता बड़ा चोंगा कोई नही है की इंफॉर्मली (अनौपचारिक रूप से) पर्मानेंट मेम्बरशिप जेब में धरा हो। और चूरन की तरह बांटता फिरे। ●● तो इस 1950 या 1951 में यह "इनफॉर्मल ऑफर" मिलने पर, नेहरू ने आइजनहॉवर से एक लाइन में पूछा- यूएन चार्टर में बदलाव की कितनी सम्भावना है। आइजनहॉवर बोले-फिलहाल कोई संभावना नही। नेहरू हंस दिए। समझ गए कि बकवास हो रही है। दरअसल भारत को आज तक अमेरिका से, या रूस, या खुद UN से फॉर्मली, याने औपचारिक तौर पर स्थायी सदस्य बनने का प्रस्ताव, आज कभी नही मिला है। ●● किसी को भी नही मिला है। हां, अमेरिका जरूर इंडिया, जापान, जर्मनी, साउथ अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, वगैरह को समय समय पर, परमानेंट मेम्बरशिप दिलवाने की चूरन चटाता रहता है। खाली अपना कोई तात्कालिक काम निकालने को, ठगने को, उल्लू बनाने को। ●● ठीक वैसे ही जैसे आपको धन दुगना करने और 50 करोड़ की लॉटरी जीतने के ईमेल और फोन आते हैं। बस 20 हजार जमा करो, करोड़पति बन जाओ। बुद्धिमान लोग ये सब बेवकूफियों में नही फंसते। इस जैसे टाई वाले चूतियों की बात निराली है। ●● तो हिस्ट्री जानिए, प्रोसेस समझिए। अपना भी दिमाग, (अगर हो, तो) लगाइये। बस, इन चमन च्युतियो और भांडकास्टरों के चक्कर मे आकर अपना मानसिक दीवाला न पिटवाइये। 🙏
Manish Singh158,772 görüntüleme • 1 yıl önce

मैंने हमेशा कहा है कि मेरी पोस्ट कॉपीराइट फ्री है। जहां मर्ज़ी छाप दें, कॉपी पेस्ट करें, वीडियो बना लेंवे। और धड़ल्ले से , अपने नाम से यूज कर सकते हैं। कुछ लोगो ने किया, वीडियोज भी बनाये। ●● लेकिन इतना बढ़िया नही, जितना की आशु झा Ashu Jha ‘नक़्क़ाश’ ने बनाया है। असल मे लिखते वक़्त जो धाराप्रवाह वाक्य संरचना होती है। और गंभीर बात के बीच हास्य का टोन देकर झट से गम्भीर विषय पर लौट जाना- आशु ठीक वैसा रचते हैं, जो लिखते वक्त मेरे दिमाग मे था। इसका मतलब की अगर मैं अपने पोस्ट पढ़कर वीडियो बनाता, तो बिल्कुल यही बनाता। शायद आशु ने उससे भी बेहतर बनाया है। ●● भाई ने मेरी कुछ और भी पोस्ट पर वीडियो किये हैं। उन्हें उनके हैंडल पर जाकर देखा जाए। उन्हें चटपट फॉलो करना स्ट्रोंगली रिकमण्डित है। ❤️😊👍💕
Manish Singh39,018 görüntüleme • 3 ay önce

पीएम मोदी 70 देश घूम चुके हैं। प्रधानमंत्री नेहरु पर 70 देश डाक टिकट जारी कर चुके है। लेकिन इसमे से अधिकांश देश वे कभी नही गए। ●● कोई कह रहा था कि फूल की खुशबू फजाओं में उड़कर खुद ही सब ओर चली जाती है। परन्तुक गव्योत्सर्जन को जा जाकर बिखराना पड़ता है। #रोचक_तथ्य
Manish Singh77,041 görüntüleme • 1 yıl önce

आपसे चार्ली चैप्लिन मिलना चाहते है बापू.. - कौन चार्ली चैप्लिन.. ?? गांधी फिल्में नही देखते थे। तो किसी ने बताया - जोकर है एक!!! दूसरे ने टोका - नही बापू, एक्टर है, बहुत फेमस है... - ठीक है। मैं अभी नही मिलना चाहता... ●● गोलमेज कॉन्फ्रेंस अटैंड करने को बापू लन्दन में थे। तमाम मुद्दे, राजनीतिक सवाल, दिमाग मे उलझ रहे थे। ऊपर से प्रेस वालो, सेलेब्रिटियों, पॉलिटिशियन्स का तांता लगा हुआ था। कोई "मैडम तुसाड म्यूजियम" वाले बुला रहे थे। अब पता नही कि ये मैडम तुसाद कौन है? कोई एक गौहर जान भी है, कहते है कि मशहूर गायिका है। मिलने को आतुर है- एक मुलाकात के लिए 12000 रुपये दान देने की चिट्ठी लिखी है। बस, वो अपना गाना सुनाना चाहती है गांधी को.. औऱ गांधी चाहते थे कि समय निकालकर लंकाशायर जायें। वहां के मिल मजदूरों से मिलें। चार्ली वाली बात आई गयी हो गई। ●● किंग्सले हॉल में उनके कार्यक्रम के आयोजक विलियम रिन्ड ने पूछा- आप चार्ली चैपलिन को मिलने समय नही दे रहे ? गांधी ने अपनी असमर्थता जताई। "आपको उससे मिलना चाहिए। वो दुनिया का सबसे मशहूर बन्दा है, ऑफकोर्स आपको छोड़कर.. रिन्ड हंसे। और फिर गम्भीरता से कहा- वो आपके उद्देश्य से सहानुभूति रखता है।उसने गरीबी देखी है, बड़े क्रांतिकारी विचार रखता है। उससे मिलना, आपके कॉज में सहायक होगा.. गांधी ने सर हिलाया ठीक है फिर.. ●● चार्ल्स स्पेन्सर चैपलिन, नाइट कमांडर ऑफ द मोस्ट एक्सीलेंट ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश एम्पायर, उर्फ चार्ली चैप्लिन (KBE)... एपोइंटमेंट लेकर, अपने पैरों चलकर उस फकीर से, जिसे 1982 में पिक्चर रिलीज होने के पहले कोई जानता नही था, मिलने आये। अपनी ऑटोबायोग्राफी में वे याद करते हैं, ईस्ट इंडिया डॉक रोड में, स्लम एरिया का वह घर, जहां गांधी ठहरे थे। और गांधी से मिलने के लिए सीढियां चढ़ते समय अपनी नर्वसनेस... वे गांधी से मिलकर क्या कहेंगे?? एक्टर थे, तो मन ही मन अपनी ओपनिंग लाइनें दोहरा रहे थे- "मि गांधी, मैं आपके देश और आपके लोगो की आजादी का समर्थक हूँ" ●● मुलाकात अच्छी हुई। ऑटोबायोग्राफी में चार्ली लिखते है- चरखे को देखकर मैनें पूछ ही लिया, मि. गांधी, मैं आपके सारे विचारों से सहमत हूँ, लेकिन आप मशीनों का विरोध क्यो करते हैं? गांधी बोले- चरखा चलाने का मतलब, सारी तकनीकी का विरोध नही। ये उससे जुड़े आर्थिक और राजनीतिक तंत्र का विरोध है। शोषण की व्यवस्था का विरोध है। गरीबो से समेटकर, चंद जेबें भरने का विरोध है। इंगलैंड ने भारत के सारे उद्योग नष्ट कर, यहां मशीनों से प्रोडक्शन शुरू किया है। ताकि यहां माल बनाकर भारतीयों को बेच सकें। वहां का धन, यहां लाया जा सके। हम मशीन से बने कपड़े का नही, उस शोषण के फ़लसफ़े का विरोध करते हैं। इसलिए चरखे से भारतीय खुद कपड़ा बनाये, खुद का उत्पाद पहने, चरखा चलाकर इसका संकेत देता हूँ। ●● बातचीत के बाद दोनो ने साथ साथ प्रार्थना की। गांधी ने अपने तरीके से, चार्ली ने अपने तरीके से.. गांधी का भजन जरा लम्बा चला, तो चार्ली भी सुनते रहे। फिर दोनो ने भोजन किया। ऑटोबायोग्राफी में चार्ली ने "मोस्ट ब्रिलिएंट मैन ही एवर मेट" और "वन ऑफ मोस्ट गॉड लाइक एज वेल" लिखकर गांधी से मुलाकात के अध्याय को समाप्त किया। ●● प्रेस और मीडिया से, 45- बेक्टन रोड के दोनो फ्लोर पैक थे। हजारों लंदनवासी , सड़क पर इकट्ठे थे। गांधी और चार्ली की मुलाकात का गवाह बनने के लिए.. वो 2 सितंबर 1931 की शाम थी। और 2024 की भी एक शाम है, जब पूड़ीपैक और 500 रुपये देकर, टेक्टरों से भीड़ इकट्ठा करवाने वाला नशेड़ी जोकर, गांधी की गुमनामी पर दया बरसा रहा है। ●● उसके जैसे ही एक सनकी, आत्ममुग्ध, बौने, अवतारी तानाशाह का मजाक उड़ाते हुए, चार्ली ने अपनी सर्वकालिक महान क्लासिक " द ग्रेट डिक्टेटर" बनाई। और उसके अंत में अपना सन्देश दिया। चैप्लिन शांति का, अहिंसा का प्रेम, साहचर्य, की बात करते हैं। जब वे गरिमा औऱ मानवता को लालच, नफरत, अहंकार और मशीनो से ज्यादा जरूरी बताते है.. तो उनकी बात में गांधी से मुलाकात की छाप दिखती है। और चैप्लिन की जुबान से जब गांधी बोलते दिखाई देते हैं, तब आपका, मेरा, और हिंदुस्तान का सीना.. गर्व से दोगुना हो जाता है। ❤️🙏
Manish Singh75,761 görüntüleme • 2 yıl önce

जिन्होंने हमे साक्षात नही देखा, आज हमारा इंटरव्यू देख लें। फिर जरा सोच समझ के ट्रोल करें। 😎
Manish Singh34,575 görüntüleme • 10 ay önce

जंगल मे अशिक्षा थी। जानवरों ने शिक्षा का महत्व समझ लिया, और स्कूल खोल दिया। मिलजुलकर सिलेबस तय हुआ। समानता लायी जाएगी, सबको सब कुछ सिखाया जायेगा। तो सबको सब कुछ सिखाया गया, एग्जाम हुए। रिजल्ट आया। ●● मछली तैरने में फुल मार्क्स, उड़ने दौड़ने में फेल हो गयी। पक्षी उड़ने में पास हुए, मगर तमाम कोचिंग ट्यूशन के बावजूद तैर न सके। कोयल गायन में फर्स्ट क्लास रही, और कुत्ते फेल हो गए। अब कुत्तों में बड़ा असंतोष फैला। वे अगले सत्र में भौकने को सिलेबस में रखने की मांग करने लगे। सबको बताया- भौंकना मौलिक अधिकार है। हमारी स्वतंत्रता है। फंडामेंटल डॉगी राइट है। बिन भौकन सब सून.. क्या अब एक कुत्ता अपने ही जंगल मे भौंक भी नही सकता ?? आंदोलन फैल गया। ●● बड़ा समर्थन मिला। भौकना उत्तम कर्म होता है। न कोई सुर, न ताल, न तुक, न राग, न द्वेष। ना नियम की सीमा हो, न छंद का हो बंधन ... जंगल में दर्जन भर कोयल हैं। उनको जब गाने का स्पेशल राइट मिला, तो क्या यह कोयलों का तुष्टिकरण करण नही था। भला उन्हें भौंकने की जिम्मेदारी क्यो नही दी गई। बताओ, बताओ.. ●● याने ऐसा चौक चौराहों, भजन पूजन के पंडालों में फुसफुसाकर बताया गया। कानाफूसी चहुं ओर फैल गयी। फिर टीआरपी के चक्कर मे टीवी कूदा। मीडिया में बैठे श्वानों की विभिन्न प्रजातियां भी दम खम से अपने स्पीशीज का साथ देने लगे। जो साथ ने थे, उन पर कुत्तों ने हमला करके भगा दिया। अब तो कुत्ता टाइम्स, कुत्ता न्यूज, Doggy Now पर बैठे कुत्तन-कुत्तनियाँ दिन रात भौकने की महिमा का गान करते, और बुलाकर हर जानवर से पूछते की वह आखिर भौकने के खिलाफ क्यूँ है? ●● कई बार, कुत्ते भेड़, बकरी, मछली, मुर्गा, हिरन का भेष बनाकर आते। उन्हें स्वतंत्र विश्लेषक बताकर, खूब भौंकवाया जाता। अथक मेहनत से आखिरकार पूरा जंगल कन्विंस हो गया। कुत्तों की सरकार बन गयी। सभी प्रमुख पदों पर कुत्ते आरूढ़ हुए। मने यूँ समझो कि कुत्ता ही वीसी हुआ, कुत्ता ही प्रिंसिपल, कुत्ता शिक्षक हुआ.. और चौकीदार तो कुत्ता था ही। ●●● इस प्रकार सम्पूर्ण विद्यालय में कुत्तों का वर्चस्व हुआ। अब पहले मौके में सम्विधान संशोधन करके सिलेबस बदल दिया गया। नये सिलेबस में भौकना अनिवार्य तथा एकमात्र विषय था। सभी जानवर अपनी बोली छोड़ भौंक रहे थे। मगर क्या ही खाकर कुत्तों से बेहतर भौकते। ●● अब विद्यालय में भौंकश्री, भौकभूषन, भौकरत्न के पुरस्कार बंटते है। और आश्चर्य की बात की कभी कभी मछली, पक्षी और घोड़े भी इनाम जीत जाते है, या जितवा दिये जाते हैं। इससे कुत्तों की निष्पक्षता पर यकीन बना रहता है। ●● तो सिलेबस बदलने से बड़ा फर्क पड़ता है। हमारे देश मे भी स्कूली दिनों में विज्ञान, गणित, एंटायर पोलिटिकल साइंस की किताब में छुपाकर.. मस्तराम, गुलशन नंदा और वेद प्रकाश शर्मा को पढ़ने वालो ने.. सुना है उन्हें सिलेबस ही बना दिया है। #कुत्तकथा
Manish Singh12,011 görüntüleme • 2 ay önce

कानूनों से खतरनाक खिलवाड़.. अजीत भारती नाम के भक्त को राहुल गांधी के खिलाफ अफवाह फैलाने के लिए कर्नाटक में केस हुआ। यह कांग्रेस सरकार ने किया है। इसके पहले श्याम मीरा सिंह पर असम में केस हुआ था। यह भाजपा सरकार ने किया। अभी लेखक अरुंधति रॉय पर 12-14 साल पहले के किसी बयान पर UAPA लगाने की बात चल रही है। PMLA कानून तो किसी से कुछ भी बयान लेकर, बड़े बड़े लोगो को जेल डालने के कुख्यात हो ही चुका है। पर इन सबका बाप, भारतीय न्याय संहिता, 15 दिन में लागू होने को है। जिसके कण कण में UAPA, TADA, PMLA रचा बसा है। ●● न्याय संहिता में पुलिस को इतने अधिकार है, की जब जिसे चाहे, मिनटों में फ्रेम करके गिरफ्तार कर सकती है। गिरफ्तारी आयरन क्लैड है, और जमानत को, यदि पुलिस न चाहे, तो एकदम अलभ्य कर दिया है। याने कोर्ट भी, पुलिस के सामने अशक्त है। ●● आजाद समाज का बेसिक फलसफा, राइट टू फ्रीडम है। याने पुराने जमाने के राजा की तरह सरकार जिसे मन आये, काल कोठरी में बन्द नही करवा सकती। ऐसा करने का उचित कारण हो, और वह कानून में डिफाइन हो। फिर कानून, अभियुक्त को बचाव का पूरा मौका दे। 100 गुनहगार छूट जाए, एक निर्दोष को सजा नही होनी चाहिए। जमानत नॉर्म होना चाहिए, जेल एक्सेप्शन। अपराध, क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम को साबित करना है, न कि आरोपी को अपनी निर्दोषता साबित करनी है। जब तक अपराध, बियॉन्ड रीजनेबल डाउट, सिद्ध न हो, सजा नही होनी चाहिए। ●● लेकिन मौजूदा दौर में, निचली अदालतों ने बेल देना लगभग बन्द कर दिया है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट "बेल पर" फैसले दे रही हैं। इंतजार में हवालात, या पुलिस कस्टडी में 50-60 दिन गुजारने वाले शख्स को मिली जमानत भी बेकार है।बिना दोषसिद्धि के सजा है। नई न्याय संहिता, इन एबरेशन को नार्म बनाती है। इसमे आतंकवाद की परिभाषा में जोड़े गए प्रावधान- सड़क पर एक मामूली प्रदर्शन, वहां लगाए नारे, किसी धरने को भी आतंकवाद के दायरे में रखने की सुविधा देते हैं। वो पुलिस को यह अधिकार देते हैं कि "उचित न समझे" तो केस की सूचना पर रिपोर्ट दर्ज न करे। याने न्याय के लिए आप थाने की आशा छोड़ दीजिए। हां, पहले भी यह चोरी-छुपे होता था, पर अब अधिकार में है। आगे, पुलिस को गिरफ्तारी के बाद 24 घण्टे में कोर्ट में पेश करने की जरूरत नहीं। डॉक्टरी मुलाहिजे की जरूरत नही। 7 दिन बाद वह एसडीएम से रिमांड बढ़वा सकता है। असल कोर्ट तो 14 दिन में पेश करे। बिना चार्जशीट के 6 माह तक हवालात एक्सटेंन की जा सकती है। ●● दमन का खजाना है यह अन्याय संहिता। देशभक्त खुश होंगे। अब आएगा मजा। चमचों को जमकर पकड़ा जाएगा, उल्टा लटकाकर पीटेंगे। गद्दारों की खाल में भूसा भरा जायेगा। यस, श्योर। लेकिन याद रखें। ये पावर्स पुलिस को है। याने उन जगहों की पुलिस को भी जहां भाजपा की सरकार नही है। और आज की डेट में आधे देश मे नही है। इधर वाले, उधर वालो की जिंदगियां तबाह करेंगे, उधर वाले इधर की। सुरक्षित कोई नही। ●● ये कानून, क़ानून व्यवस्था की बेहतरी के लिए नही बने। राजनीतिक वजहो से बने हैं। विपक्ष की आवाज बन्द करने, और आम नागरिक को टेरराइज करने को बने हैं। बात व्यवस्था की है, तो कानून व्यवस्था और शांति के लिए, अंग्रेजो की बनाई व्यवस्था से बढ़िया कुछ नही। क्योकि वह हमारे बीच, 150 साल पुरानी हो चुकी। वह बार बार माँज कर, चमका कर, कतरब्योंत और सुधार के लंबे कालक्रम से गुजर चुकी है। अंग्रेजो की नही , यह हमारी व्यवस्था हो चुकी है। आजाद हिंदुस्तान की 15 संसदों, सरकारों, और हजारों जजों ने लाखों मामलों के फैसलों से, हर सिचुएशन के लिए एक गाइडलाइन बना दी है। इस कानून को सब लोग समझते हैं, स्वीकार करते हों, फॉलो करते हैं। वकील, पुलिस, अदालतें, समझती हैं। ●● तो IPC हमारे शरीर मे फिट, और शरीर कानून में फिट हो चुका है। टेलर फिट। अब नए चोले को फिर उतना ही समय लगेगा, परफेक्ट, टेलर फिट होने में। यदि इसका आधा ही समय लगा, या चलो, कि चौथाई या दसवां हिस्सा ही लगा परफेक्ट होने, सेट होने में- तो भी.. पहले 20 साल तो आम लोगो, वकीलों, कोर्ट्स को इससे जूझते, रास्ते और राहतें खोजते लग गए न.. ●● और यह बड़ा वीभत्स दौर होने वाला है। राजनीतिक कटुता, और शुचिता के अभाव में कानूनन बेलगाम पुलिस, किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के कन्ट्रोल में नही रहेगी, लिख लीजिए। वह दोनो तरफ को दबाएगी। ताक कर रखेगी, इसकी सरकार में उसको, उसकी सरकार में इसको निपटायेगी। यह पुलिस राज, व्यवस्था में अंसतोष और विद्रोह को जन्म देगा। और सरकारों को इसका नजला भुगतना पड़ेगा। और फाइनली लोकतन्त्र को गहरा डेंट लगेगा। ●● कानूनों से खिलवाड़ बन्द हो। न्याय संहिता का इमिडीएट रिवीजन होना चाहिए।
Manish Singh59,938 görüntüleme • 2 yıl önce

थैंक्स इंडिया!!! एक सौ उनहत्तर दिनों के लिए। ●● RJ अरमान ने मेरी पोस्ट को वीडियो में उकेरा। उनका धन्यवाद। ❤️
Manish Singh17,994 görüntüleme • 7 ay önce

आख़िरकार सब ठीक हो गया। हमारी सरकार एक्शन मॉड में है। उसने वीडियो फॉरवर्ड कर दिया है। 🙏❤️ #SabChangaSi
Manish Singh17,106 görüntüleme • 8 ay önce
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