
Gurdeep Singh Sappal
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Permanent Invitee, Congress Working Com; Coordinator O/o Cong President, Incharge (Admin) @INCIndia; Ex-CEO/Editor RSTV; Ex-OSD to Vice Pres of India; @sbfindia
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सुधांशु त्रिवेदी कहते हैं कि पहले प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में सीटें बिकती थी, MBBS की सीट 20-45 लाख रुपये तक जाती थी। प्रधानमंत्री मोदी ने NEET से जो व्यवस्था बनाई उसमें गरीब बच्चा भी प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में जा सकता है। लेकिन त्रिवेदी जी बताना भूल गए कि प्राइवेट मेडिकल कॉलेज की फीस एक करोड़ से तीन करोड़ रुपये तक हो गई है। कितने गरीब बच्चे ये फीस दे कर डॉक्टर बन सकते हैं?
Gurdeep Singh Sappal179,153 просмотров • 15 дней назад

श्री सुधांशु त्रिवेदी ने चार मुद्दे उठाये: हर आंदोलन में एक से नारे क्यों लगते हैं आंदोलनकारी ग़ैर-राजनीति का मुखौटा पहन कर राजनीति करते हैं तीसरा कांग्रेस की चार राज्य सरकारें गुजरात मॉडल जैसा मॉडल क्यों नहीं पेश कर रही हैं राजस्थान में भी पेपर लीक हुआ था। मेरा जवाब:
Gurdeep Singh Sappal73,442 просмотров • 15 дней назад

NTA के चेयरमैन हैं प्रदीप कुमार जोशी। मध्यप्रदेश में ये राज्य के पब्लिक सर्विस कमीशन (MPPSC) के अध्यक्ष बनाये गए थे। RTI में जानकारी मिली कि RSS प्रचारक विनोद ने बीजेपी के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को चिट्ठी लिखी थी कि प्रदीप जोशी RSS और ABVP से जुड़े हैं, इसलिए उन्हें अध्यक्ष बयाना जाये। और वो अध्यक्ष बन भी गए। प्रदीप जोशी के कार्यकाल में MPPSC में भर्ती घोटाला हुआ। BJP की सरकार ने तीन सदस्यीय जांच बैठाई। जाँच में पाया गया कि 350 नियुक्तियों में से 57 में घोटाला था। जाँच समिति ने SIT या EOW या CBI की आगे जांच की संस्तुति भी की। फिर क्या हुआ? फिर, प्रदीप जोशी पर कोई कार्यवाही नहीं हुई, न ही आगे कोई जाँच हुई। उल्टे, उनकी तरक्की हो गई। वो पहले UPSC के चेयरमैन बना दिए गए, फिर NTA के अध्यक्ष। जिन 57 लोगों की भर्ती ग़लत पायी गई, उनमें से कई अच्छे अच्छे पदों पर नियुक्त किए गए। डॉ राकेश मेहरा MPPSC के चेयरमैन बने, राजेश वर्मा दुर्गावती विश्वविद्यालय के VC बने इत्यादि। सवाल है, कि दागदार व्यक्ति को NTA का चेयरमैन क्यों बनाया गया, क्यों उसके भर्ती घोटाले की आगे जांच नहीं हुई, क्यों उसे अब बचाया जा रहा है। सिर्फ इसीलिए न की वह RSS से जुड़ा है। यह हकीकत है मोदी सरकार की नीयत की। यही नहीं, NTA की एक गवर्निंग बॉडी है, जिसमें IIT, IIM, IISER, JNU, IGNOU के डायरेक्टर और VC सदस्य हैं। 2024 से देश में NTA के काम को ले कर इतना हंगामा मचा है। लेकिन इस मैनेजमेंट बॉडी की पिछले ढाई साल में सिर्फ दो मीटिंग ही हुई हैं! ये है मोदी सरकार और उसकी संस्थाओं की गंभीरता! सिर्फ़ कड़े क़ानून पास करने से पेपर लीक नहीं रुकेंगे। व्यवस्था ही गड़बड़ है।
Gurdeep Singh Sappal23,562 просмотров • 5 дней назад

अमित शाह को बचाना है, तो पैलेट गन और AK 47 चलाने के सच को ही नकार रहे हैं। बाक़ी रही पेपर लीक बिल की हक़ीक़त, तो आज ही फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट की पहली सुनवाई थी, आज ही CBI का वकील नहीं पहुँचा। अभी जब मामला इतना गर्म है, तब ये हाल है, तो बाद में क्या हश्र होगा?
Gurdeep Singh Sappal33,918 просмотров • 8 дней назад

Authentication के नाम पर संसद में विपक्ष की आवाज़ चुप कराई जा रही है। पहले भी authentication यानि सत्यापन की बात होती थी। लेकिन संसद में अपनी बात कहने के बाद। भाषण के दो दिन के भीतर स्पीकर या राज्यसभा अध्यक्ष को सबूत दिखाने होते थे। एडवांस में सूचना या authentication की शर्त केवल तब होती थी जब किसी सांसद या मंत्री या उच्च पदों पर आसीन लोगों के ख़िलाफ़ प्रस्ताव पेश करना होता था, उस पर आरोप का अलग से विशेष प्रस्ताव, जिसे substantive motion कहते हैं। अगर पहले से सबूत लाने की शर्त हमेशा से होती तो ख़ुद बीजेपी पाच-छह दशक तक विपक्ष में रह कर संसद के मुद्दे न उठा पाती। एक आम सांसद या विपक्ष के पास कोई पुलिस या जाँच एजेंसी नहीं होती है। वो हमेशा पब्लिक जानकारी, अख़बार, मीडिया, किसी एक्सपर्ट ग्रुप या फिर निजी जानकारी के आधार पर मुद्दा उठाते है, जिसकी सत्यता की जाँच की ज़िम्मेदारीपूर्ण सरकार की होती है। पहले सबूत लाओ, फिर मुद्दा उठाओ, ये मोदी सरकार का ट्रेंड है। बाकी बीजेपी के सांसद तो जब चाहे, जो चाहे आरोप लगा हो सकते हैं, बदनाम कर ही सकते हैं, उन पर कोई रोक नहीं है!
Gurdeep Singh Sappal27,476 просмотров • 7 дней назад

गौरव भाटिया कहने लगे कि UPA के वक्त LPG सिलिंडर ₹1241 का था। लेकिन वो बताना भूल गए कि तब उस पर 600 रुपये की सब्सिडी भी मिलती थी। उस वक्त कच्चे तेल का रेट $ 145 होने पर भी आम लोगों को पेट्रोल 72 रुपये लीटर मिलता रहा। वो इसलिए कि डॉ मनमोहन सिंह जी की सरकार को दस साल में पेट्रोल- डीजल से 10 लाख करोड़ का टैक्स मिला और उस में से 9 लाख करोड़ उन्होंने सब्सिडी के रूप में वापिस कर दिए, ताकि अंतरराष्ट्रीय क़ीमतों का भार आम लोगों पर न पड़े। दूसरी तरफ़ मोदी सरकार ने 11 साल में 42 लाख करोड़ का टैक्स पेट्रोल डीजल से कमाया और सब्सिडी दो सिर्फ 1.70 लाख करोड़! इसीलिए कच्चे तेल के भाव $ 30-60 के बीच रहने पर भी लोग 90-100 रुपए प्रति लीटर पर पेट्रोल खरीदते रहे।
Gurdeep Singh Sappal164,501 просмотров • 4 месяцев назад

पब्लिक प्लेटफार्म पर गालियों की शुरुआत बीजेपी के IT cell ने की थी। मोदी के ख़िलाफ़ हर विचार, हर व्यक्ति को गालियाँ दे दे कर ट्रोल किया गया। और ऐसे ट्रोल करने वाले बहुत से लोगों को ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया पर फॉलो कर गाली-गलौच की भाषा को वैधता दी थी। Gen Z उन्हीं गालियों को पब्लिक प्लेटफार्म पर सुन सुन कर, पढ़ पढ़ कर बड़े हुए हैं। उनके लिए ये वो हथियार था, जिसे मोदी की मान्यता प्राप्त थी। इसीलिए न सिर्फ़ वो इसके साथ सहज हैं, बल्कि उन्होंने मोदी की masculanity वाली इमेज को ध्वस्त करने के लिए इसका खुल कर इस्तेमाल भी किया है। जो मोदी अपने भाषणों में उन्हें मिली गालियाँ गिनाते थे, बिहार में मिली एक गाली पर देश के सामने आ कर प्रलाप किए थे, अब वो जरा जंतर मंतर पर मिली गालियों का ज़िक्र कर के तो दिखायें! Gen Z ने केवल धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा ही नहीं लिया है, मोदी के aura को भी नष्ट कर दिया है। मोदी ने जिस अस्त्र को राहुल गांधी के ख़िलाफ़ चलाया था, उसने बूमरैंग की तरह लौट कर मोदी को ही अब टारगेट कर लिया है। ब्रह्मास्त्र की तरह, जिसे वापिस बुलाने की क्षमता अब मोदी में नहीं है। लेकिन मोदी के प्रवक्ता अभी भी इस सच्चाई को समझ नहीं सके हैं। वो अभी भी राहुल गांधी के लिए वही पप्पू वाली भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं। वो नहीं जानते कि Rahul Gandhi तो फ़ीनिक्स है, राख से फिर उठ खड़े हुए हैं। लेकिन मोदी इस भाषा की लपटों में भस्म हो जाएँगे। हिरणयकश्यप की तरह, जिसे अमरत्व का वरदान भी न बचा सका था।
Gurdeep Singh Sappal12,145 просмотров • 8 дней назад

राहुल गांधी सिर्फ़ कांग्रेस के नेता नहीं हैं, वो नेता विपक्ष भी हैं। इस देश में अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज आदि भी नेता विपक्ष रहे हैं। क्या कभी ये कल्पना की जा सकती है कि उन्हें पुलिस यूँ गिरा कर, चोटिल कर, बदतमीज़ी से उठाये? मोदी-शाह ने लोकतंत्र को तार तार कर कर दिया है। इस देश में जब नेता विपक्ष के साथ पुलिस ऐसा कर सकती है, तो सोचिए कि कल छात्रों, युवाओं के साथ कितना दुर्व्यवहार और उन पर कितना पुलिस अत्याचार किया होगा।
Gurdeep Singh Sappal17,638 просмотров • 14 дней назад

युद्ध है तो दिक्कत आएगी ही, सप्लाई चेन रुकेगी ही। लेकिन ये भी सच है कि आयल मार्केटिंग कंपनियां 2014 के मुक़ाबले 500 से 800% ज़्यादा मुनाफे के पहाड़ पर बैठी हैं। यही नहीं, मोदी सरकार ने 2014 से अब तक 44 लाख करोड़ रुपए पेट्रोलियम पर टैक्स से वसूल चुकी है। ये मुनाफा अब आम लोगों में बाँटने का वक्त है।
Gurdeep Singh Sappal77,995 просмотров • 4 месяцев назад

NEET और CBSE के मुद्दे पर Rahul Gandhi शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा माँग रहे है, क्योंकि ये गड़बड़ियाँ किसी की गलती से नहीं हुई है, बल्कि उस सिस्टम का नतीजा हैं, जो मोदी सरकार ने बनाया था। IIT के डायरेक्टर्स की कमेटी, जिसके अध्यक्ष प्रो आचार्य थे, उसने NTA को संसद के कानून से एक वैधानिक या statutory संस्था बनाने की बात कही थी, जिसपर ऑडिट की कड़ी निगरानी रहे। लेकिन मोदी सरकार ने 2018 में जब इसे बनाया, तो statutory संस्था नहीं, एक साधारण सोसाइटी बना दिया। इसके दो नतीजे हुए। एक कि NTA पर कोई पब्लिक ऑडिट या निगरानी नहीं है। ये संस्था जो भी काम करती है, उस पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है, ना ही जवाबदेही है। दूसरा, इसके पास परमानेंट कर्मचारी बहुत कम हैं। दुनिया भर में प्रैक्टिस है कि अगर कोई संस्था बेहद sensitive काम करती है, तो वो काम in-house किए जाते हैं। लेकिन NTA सभी काम ठेके पर करवाती है। पेपर डिज़ाइन, पेपर डिलीवरी, data protection, center management, result processing system सभी out-sourced हैं। मोदी सरकार के लिए NTA उसके ठेकेदारों के लिए दुधारू गाय है। इसीलिए 2024 सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी सुधार नहीं हुआ, न किसी को सजा हुई। यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर जो राधाकृष्णन कमेटी बनी और उसके सुझावों पर अमल करने के लिए एक मॉनिटरिंग कमेटी बनी, उसके काम का कोई रिकॉर्ड पब्लिक में नहीं है। मोदी सरकार को बच्चों के भविष्य की कोई फ़िक्र नहीं है। बस मुनाफ़े की नज़र है। इसीलिए CBSE में OSM का काम एक ब्लैकलिस्टेड कंपनी को देने में किसी का हाथ नहीं काँपा था। फ़ायदा इनके लोगों का, भुगत देश का GEN Z रहा है।
Gurdeep Singh Sappal23,173 просмотров • 2 месяцев назад

राज्य सभा मीनाक्षी नटराजन जी के नामांकन फॉर्म रद्द करने का कांग्रेस विरोध क्यों कर रही है? इसलिए कि उनके ख़िलाफ़ कोई केस ही नहीं है। सिर्फ़ कोर्ट का एक नोटिस है। नोटिस में वो accused नहीं , respondent है। मामला क्या है- एक व्यक्ति पर रेप केस के मुक़द्दमे चल रहे हैं। उसे पार्टी से सस्पेंड दिया गया है। निकाले जाने बाद वो किसी के एक लोकल प्रोग्राम में मंच पर था। पीड़ित महिला ने कोर्ट से शिकायत की है कि वो व्यक्ति मंच पर कैसे था। उसने कलेक्टर को लिखा था कि मीनाक्षी नटराजन तेलंगाना कांग्रेस की प्रभारी है, तो उन्होंने मंच पर उसे आने क्यों दिया। उस मंच पर, जहाँ मीनाक्षी स्वयं मौजूद नहीं थी! कलेक्टर से ये भी माँग की गई कि कांग्रेस आंतरिक जाँच करे कि वो व्यक्ति मंच पर कैसे था। पीड़ित महिला ने 10 करोड़ रुपये मुआवज़ा भी मांगा है। बस यही मामला है, जिसकी ज़िम्मेदारी मीनाक्षी नटराजन पर डाल कर उनका नामांकन पत्र रद्द कर दिया है!! जबकि इस ऐसे नोटिस की जानकारी देने का कॉलम ही फॉर्म में नहीं होता है। Congress
Gurdeep Singh Sappal18,986 просмотров • 1 месяц назад

BJP की प्रवक्ता अनिला सिंह ने कहा कि कांग्रेस में तो महिला नेत्रियों के लिए पद आरक्षित हैं, बाक़ी महिलाओं का क्या! उन्हें बताया कि एनी बेसेंट तो 110 साल पहले ही कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गई थीं। सौ साल पहले सरोजिनी नायडू और 1933 में नेली सेनगुप्ता भी राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गई थी। इंदिरा गांधी तो 1965 में ही विश्व की दूसरी महिला प्रधानमंत्री बन गई थीं। यही नहीं, जब दुनिया में महिलाओं को वोट के अधिकार तक नहीं थे, तब 1931 में ही कांग्रेस ने महिलाओं को बराबरी के अधिकार और वोट के अधिकार का फैसला कर लिया था और आज़ादी तो तुरंत बाद संविधान में ये अधिकार महिलाओं को दे भी दिए। लेकिन अनिला जी के संगठन, RSS, जिसका गठन 1925 में हो गया था, उसने तो संविधान बनने तक महिलाओं के राजनैतिक अधिकारों और वोट की बात तक कभी नहीं कही, उनके समर्थन में एक लाइन कहीं नहीं लिखी। महिलाओं के आज के सामर्थ्य में कांग्रेस का ही प्रमुख हाथ है। Congress Mallikarjun Kharge Rahul Gandhi
Gurdeep Singh Sappal31,074 просмотров • 3 месяцев назад

प्रधानमंत्री मोदी ने मंत्रियों के हवाले आज की मीटिंग को कर दिया। एक बार फिर वो राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे पर कन्नी काट गए। और मंत्रियों की हालत ये है कि पिछले दिनों एक नया नियम बना कर उनकी सामूहिक पॉवर को ही कमजोर कर दिया। अब प्रधानमंत्री किसी देश के साथ समझौता करेंगे तो उन्हें मंत्रिमंडल से पास करवाना ज़रूरी नहीं है। बस विदेश मंत्रालय को 6 महीने में लिस्ट देनी होगी। अब ऐसे कैबिनेट के हाल हैं तो जवाब तो प्रधानमंत्री को ही देने होंगे न!
Gurdeep Singh Sappal36,055 просмотров • 4 месяцев назад

AI summit में मोदी सरकार बड़े बड़े दावे कर रही है। लेकिन हक़ीक़त क्या है? * दुनिया में कुल AI पेटेंट में भारत का हिस्सा केवल 0.39% है। चीन का 70% है! * अगले साल चीन AI पर 100 billion डॉलर खर्च करेगा, अमरीकी कंपनियां 650 billion डॉलर खर्चेंगी, और भारत सरकार ने अपने बजट में मात्र 1000 करोड़ रुपये (करीब 12 million डॉलर) का प्रावधान किया है! * दुनिया के कुल डेटा का 20% अकेले भारत पैदा करता है, लेकिन डेटा स्टोरेज सुविधाओं में केवल 3 % हिस्सा है। * AI क्रांति के लिए ज़रूरी डेटा स्टोरेज के लिए हर साल 7 GW से 30 GW अतिरिक्त बिजली चाहिए। लेकिन आज तक मोदी सरकार ने AI की ऊर्जा जरूरतों के लिए कोई स्ट्रेटेजी पेपर तक नहीं बनाया है। * भारत की किसी यूनिवर्सिटी, किसी IIT, किसी कंपनी ने कोई काम का LLM यानि इंजन नहीं बनाया है। हम विदेशी LLM पर निर्भर हैं। * Semi-conductor/ GPU में हम विदेशों पर निर्भर हैं। इन सवालों के जवाब प्रधानमंत्री मोदी के पास नहीं हैं। बड़ी बड़ी बातें तो मोदी पहले भी कहते रहे हैं। लेकिन बिना इन्वेस्टमेंट के स्वच्छ भारत, स्मार्ट सिटी जैसी बातों का हश्र देश चुका है। बस एक इवेंट मैनेजमेंट में महारत थी, लेकिन AI समिट की अफ़रातफ़री ही बताती है कि अब वहाँ भी फेल हो गए हैं!
Gurdeep Singh Sappal42,562 просмотров • 5 месяцев назад

आजतक का सवाल था कि क्या नरेंद्र मोदी अमरीका -इसराइल -ईरान के बीच बैलेंस बनने में सफल हुए हैं। जवाब है नहीं। दरअसल मोदी शायद ट्रम्प- नेतन्याहू के झाँसे में आ गए थे कि ईरान तो दो-चार दिन हार ही जाएगा। सो वो ईरान को छोड़ अमरीका के पाले में चले गए। लेकिन ईरान तो अब तक नहीं हारा। और नुक़सान भारत का होने लगा। अब ईरान के राष्ट्रपति को मोदी ईरानी भाषा में ट्वीट कर रहे हैं, लेकिन वहाँ से कोई जवाब तक नहीं मिल रहा। पहले ट्रम्प द्वारा हर बार ज़लील करने के बावजूद ट्रम्प को ही ख़ुश करने में लगे थे। अब बदली परिस्थिति में ईरान को ख़ुश करना शुरू किया है। लेकिन न ट्रम्प ख़ुश हुए, न ही ईरान। ऐन इसे संतुलन बनाना कहते हो, तो कहते रहिए।
Gurdeep Singh Sappal35,056 просмотров • 4 месяцев назад

बीजेपी के लोग कह रहे हैं कि ईरान भारत के ख़िलाफ़ था तो उसके साथ क्यों रहें। सच क्या है? 2001 में ईरान ने तालिबान के ख़िलाफ़ भारत के साथ मिलकर Northern Alliance को सपोर्ट किया था, ताकि कश्मीर में तालिबान की एंट्री न हो। इसीलिए तब प्रधानमंत्री वाजपेयी ने ईरान के साथ Tehran Declaration साइन किया था और भारत - ईरान स्ट्रेटेजिक पार्टनर बने थे। जब चीन और पाकिस्तान मिलकर इकोनॉमिक कॉरिडोर CPEC बनाने लगे, जिससे चीन का सीधा रास्ता मध्य एशिया और यूरोप के बाज़ार तक खुल जाता है, तब ईरान ने ही भारत का साथ दिया और International North South Trade Corridor INSTC बनने की सहमति दी। ईरान के कारण ही भारत चीन-पाकिस्तान के मुक़ाबले मध्य एशिया और यूरोप के बाज़ार अपना तक रास्ता खोलने की तैयारी कर रहा था। इसीलिए मोदी सरकार ईरान में चाबहार पोर्ट को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताती रही है। अभी 2025 में भारत ने चाबहार में शाहिद बहिश्ती टर्मिनल शुरू करने एग्रीमेंट ईरान से किया था। यू-टर्न तो पिछले कुछ एक महीने में आया है, कि प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान के साथ भारत के स्ट्रेटेजिक और ऐतिहासिक संबंधों को लात मार दी और अमरीका -इसराइल की शरण में जा खड़े हुए। इसका कारण केवल एक है, जैसा Rahul Gandhi कहते हैं, कि मोदी गरदन पर अमरीका का चोक है, गर्दन जकड़ रखी है। वरना ईरान जैसे मित्र को कोई यूँ ही नहीं ठुकरा देगा, इतना कि उसके सुप्रीम लीडर की हत्या पर शोक तक न व्यक्त कर सके!
Gurdeep Singh Sappal32,092 просмотров • 5 месяцев назад