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ये पंक्तियाँ आप किसे समर्पित करना चाहेंगे?
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वक़्त ख़ुश ख़ुश काटने का मशवरा देते हुए रो पड़ा वो आप मुझ को हौसला देते हुए - रियाज़ मजीद
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अकेलेपन और एकांत में क्या अंतर है?
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सबको गिला है - बहुत कम मिला है...
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निर्धन गिरे पहाड़ से कोई न पूछे हाल धनी को कांटा लगे पूछे लोग हज़ार।
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शोक में सिर्फ़ रहा जा सकता है, उसे कहा नहीं जा सकता। - पंकज चतुर्वेदी
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सबको गिला है - बहुत कम मिला है ज़रा सोचिए - जितना आपको मिला है उतना कितनो को मिला है। - अज्ञात
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पहाड़ और नदी...
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पंक्तियाँ : सोनू जाॅनसन
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सबको गिला है, बहुत कम मिला है। ज़रा सोचिए - जितना आपको मिला है, उतना कितनों को मिला है।
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वो प्रेम है.. 👌❤
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UPSC topper Shakti Dubey.
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माता-पिता ❤❤
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ये सुनिए 👌👌
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अचानक तुम आ जाओ इतनी रेलें चलती हैं भारत में कभी कहीं से भी आ सकती हो मेरे पास कुछ दिन रहना इस घर में जो उतना ही तुम्हारा भी है तुम्हें देखने की प्यास है गहरी तुम्हें सुनने की कुछ दिन रहना जैसे तुम गई नहीं कहीं मेरे पास समय कम होता जा रहा है मेरी प्यारी दोस्त घनी आबादी का देश मेरा कितनी औरतें लौटती हैं शाम होते ही अपने-अपने घर कई बार सचमुच लगता है तुम उनमें ही कहीं आ रही हो वही दुबली देह बारीक़ चारख़ाने की सूती साड़ी कंधे से झूलता झालर वाला झोला और पैरों में चप्पलें मैं कहता जूते पहनो खिलाड़ियों वाले भाग-दौड़ में भरोसे के लायक़ तुम्हें भी अपने काम में ज़्यादा मन लगेगा मुझसे फिर एक बार मिलकर लौटने पर दु:ख-सुख तो आते-जाते रहेंगे सब कुछ पार्थिव है यहाँ लेकिन मुलाक़ातें नहीं हैं पार्थिव इनकी ताज़गी रहेगी यहाँ हवा में! इनसे बनती हैं नई जगहें एक बार और मिलने के बाद भी एक बार और मिलने की इच्छा पृथ्वी पर कभी ख़त्म नहीं होगी पंक्तियाँ : आलोक धन्वा
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एक उम्र के बाद आदमी शान्त होने लगता है, भागता हुआ सा शान्त। भागता हुआ सा शान्त आदमी बहुत खतरनाक होता है। आदमी रूक नहीं सकता, उसे रुकने नहीं दिया जाता। वह रुक जाए तो दुनिया का बोझ मालूम पड़ता है। भागते-भागते वह भीतर से खाली होने लगता है। आस-पास स्नेह ढूंढता है जो दोस्तों से नहीं मिलता, दोस्त उलूल-जुलूल की बातों में फँसा कर खालीपन टाल सकते हैं, खत्म नहीं कर सकते। स्नेह खोजते आदमी से सुंदर कुछ भी नहीं, स्नेह खोजते आदमी से बुरा कुछ भी नहीं। आदमी को, एक समय आने पर अपनी माँ से दूर कर दिया जाता है। उसका कमरा अलग कर दिया जाता है, और उसे आदमियों की श्रेणी में धकेल दिया जाता है जो कठोर मालूम होते हैं। माँ से सिर्फ रसोई तक की बात होने लगती है। माँ के स्नेह की भूख आदमी को सारी उम्र एक खालीपन की और धकलेती है। आदमी उस स्नेह को प्रेमिका में खोजता है और उसके साथ बच्चा होने लगता है। आदमी का बच्चा होना माँ के सिवा किसी को स्वीकार नहीं, प्रेमिका को भी नहीं। प्रेमिका कभी भी माँ नहीं हो सकती, उसकी अपेक्षाएं हैं, माँ की कोई अपेक्षा नहीं होती। आदमी फिर आदमी होने लगता है और ढोने लगता है अपने आदमी होने का बोझ। मैंने किसी आदमी से "कैसे हो?" के उत्तर में "बढ़िया" के अलावा कुछ नहीं सुना। बाकी सब बढ़िया। - संयम शर्मा
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व्यक्ति में इतनी ताकत हमेशा होनी चाहिए कि अपने दुख, अपने संघर्षों से अकेले जूझ सकें। - मन्नू भंडारी
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KL Rahul Reply to Sanjiv Goenka: "मेरी ग़ुर्बत को शराफ़त का अभी नाम न दे वक़्त बदला तो तिरी राय बदल जाएगी।" - निदा फ़ाज़ली
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गुनाहों का देवता : 🥹👌❤️ लिफ़ाफ़ा : 😍👌❤️
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परीक्षा कक्ष में, परीक्षा देने के लिए सिर्फ़ अभ्यर्थी नहीं बैठता। उसके साथ बैठते हैं: अपने-परायों के बेहिसाब दिल चीरते ताने, जीत-हार के बीच का मन में पलता द्वंद, कई सालों का संघर्ष और कठोर मेहनत ! (ये पंक्तियाँ हिना परिहार जी द्वारा लिखी गई हैं।)