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तो तुम जान लेते मैं क्या सोचता हूं...

223,662 次观看 • 3 年前 •via X (Twitter)

9 条评论

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हिन्दी पंक्तियाँ3 年前

फ़िल्म "उड़ान" से 👌❤️

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SecBriefs | Making Cybersecurity Simple1 年前

Quantum computers can break today’s encryption in seconds.🔑 Quantum tech will reshape our digital lives. Governments & hackers are preparing for the quantum era. How about you?🛡️ Don’t get left behind!🧠 Cybersecurity Dictionary for Everyone can help:

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फ़ुज़ूल/fuzuul3 年前

क्या करें...जब मजहब दिलों से निकलकर सर पर चढ़ जाए तो.... #manto

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Deep Dive3 年前

I still remember the first time I watched Udaan. What a movie. Marvellous.

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Prakash3 年前

@ViniGeance

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MS Pawar3 年前

@SankhlaINC RT @Hindi_panktiyan: तो तुम जान लेते मैं क्या सोचता हूं...

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Sonu Jha3 年前

@get_videobot

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Shailendra Singh3 年前

@DownVideoBot

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Pankaj Jat3 年前

@DownVideoBot

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प्रिय प्रेयसी वो ट्रैन का पहला टिकट, रखा हूं अब तक संभालकर जो तुमसे मिलने को निकलबाया था, ना वो मिल सकी ना हम, खैर, बन्द हैं उसके साथ कुछ अरमान, थोड़ा इश्क़ और कहीं मैं। क्या होता अगर बैठ चुका होता उस ट्रैन में, शायद मंजर अलग होता, सोचता हूँ, लेकिन मेरे बस में तो नहीं। शायद तुम मिलती, या नहीं, पर शायद वो मिल जाता जो कम रह गया। सोचता हूं हर घड़ी, तुम्हें देखते ही क्या हाल होता मेरा, क्या तुम मुस्कुराती या दौड़कर चले आती, या खड़े रहती वहीं हलकी सी मुस्कान लिए। कहीं तुम्हारी आँखों पर चश्मा तो नहीं होता, जिससे मैं तुम्हारी आँखें ना देख सकता, या कहीं मेरी ही आँखें ना नम हो जाती तुम्हें देखकर। खैर, ऐसी अनगिनत कहानियां समेटे बन्द है वो टिकट मेरी मोबाइल कभर के अंदर मे है । सोचता हूँ क्या बता पाता जो कुछ लिखा हूं तुम पर, और बस यूं ही लड़ता हूँ ख़ुद से उस टिकट को पकड़े, क्या कहना था, क्या नहीं सोचता रहता हूँ। सोचता हूँ फेंक दूं, जला दूं इस टिकट को, पर हर बार किसी रिश्वतखोर पुलिस वाले की तरह आँख बन्द करके इसे जाने देता हूँ। देना है ये टिकट तुम्हें अगर कभी मुलाक़ात हुई, देना हैं कई शिकवे, शिकायतें, अरमान, और वो सारे अनकही बातें। खुद से अक्सर पूछता हूं, क्या थे हम? कभी पतंग को उड़ते हुए देखी है तुमने, वह पतंग, जो एक डोर पर विश्वास कर खुले आकाश में गोते लेता है, यह एक दूसरे के प्रति विश्वास की सीमा है। वह डोर शुरू होती है अपनी बुनियाद से, और लौटकर आती है अपनी बुनियाद पर। लेकिन पतंग की कोई बुनियाद नहीं होती, वह उड़ता है बदहवास सा, प्रेम में, विश्वास में। तुम वह डोर हो जो लौटकर अपनी छत पर आ गई। और मैं? मैं वह पतंग! तुम्हारे यादों से दौड़ता, भागता, मैं कायर रहूंगा, या तो तुम रहोगी मेरे, या मैं शायर रहूंगा। #तृप्त.. ✍🏻

तृप्त ...🖤

11,699 次观看 • 1 年前