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Hridayesh Joshi

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Founder - Eco N Energy Talk https://t.co/xZ1wzhfkSd Books: 'Rage of the River' @PenguinIndia, 'Laal Lakeer' @HarperCollinsIN

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मैं जंतर मंतर से रात 11 बजे निकला ... बरसात होने लगी है लेकिन यहां लोगों का आना जारी है.. अधिक जानकारी के लिए Eco N Energy Talk ( You Tube) subscribe करें

मैं जंतर मंतर से रात 11 बजे निकला ... बरसात होने लगी है लेकिन यहां लोगों का आना जारी है.. अधिक जानकारी के लिए Eco N Energy Talk ( You Tube) subscribe करें

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अरुणाचल में नदियों का ये उफान 2013 की केदारनाथ आपदा की याद दिलाता है। तब मंदाकिनी, भागीरथी और अलकनंदा का पानी यूं ही घरों को बहा ले गया था।

अरुणाचल में नदियों का ये उफान 2013 की केदारनाथ आपदा की याद दिलाता है। तब मंदाकिनी, भागीरथी और अलकनंदा का पानी यूं ही घरों को बहा ले गया था।

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"प्रशांत किशोर तृणमूल कांग्रेस के पतन का मुख्य कारण है।" - कल्याण बनर्जी टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी कह रहे हैं कि प्रशांत किशोर की I-PAC ने तृणमूल कांग्रेस के संगठन को ध्वस्त कर दिया। वह साफ कह रहे हैं कि Prashant Kishore is the main reason to destroy the Trinmool Congress politics. He is an opportunist. बनर्जी की ये बात भले ही पार्टी की हार के बाद उपजी हो लेकिन उनका यह कहना सही है कि प्रशांत किशोर की टीम ने राजनीतिक पार्टियों को पंगु कर दिया है। वह चुनाव को संगठन खड़ा करने और जनता के बीच जाने से अधिक अब मैनेजमेंट, डिजिटल कम्युनिकेशन और पैसे का खेल समझने लगी हैं। इस वीडियो में कल्याण बनर्जी का साफ कहना है कि कार्यकर्ता को ज़मीन से काटने और भ्रम में रखने में आई-पैक ही कारण है।

Hridayesh Joshi

241,385 görüntüleme • 2 ay önce

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देवप्रयाग के गांवों का संकट सारे गांवों का है। क्यों? 👇 देवप्रयाग के पास गांवों में जल संकट के खिलाफ प्रदर्शन की तस्वीरें वायरल हो रही हैं। लोग यहां पर गंगा को बनाने वाली भागीरथी और अलकनंदा के संगम की दुहाई दे रहे हैं जो ठीक है। लेकिन ये महान नदियां भले ही मैदानी क्षेत्र में सिंचाई और पनबिजली के काम आती हों गांवों की प्यास नहीं बुझातीं। गांवों के काम आने वाली नदियां होती हैं वो जलधारायें जो गांवों के पास होती हैं और लोगों की जीवनदायिनी बनती हैं। जो वैटलैंड जो स्रोत बनाते हैं। वो नौले या कुंयें जिनसे लोग पानी भरते हैं। वो सब सूख रहे हैं। यही छोटी - बड़ी जलधारायें इन बड़ी नदियों का जलागम बनाती हैं यानी कैचमेंट। इन जल धाराओं को गधेरे, फॉरेस्ट रिवर्स और स्प्रिंग्स कहा जाता है। जंगलों और वेटवैंड का नष्ट होना और सड़क निर्माण में मलबे का गलत निस्तारण और अंधाधुंध निर्माण इनके खत्म होने की कुछ वजहें हैं। एक स्वस्थ कैचमेंट पानी को रोककर बाढ़ को नियंत्रित करता है और साल भर बड़ी नदियों में पानी बनाये रखता है। लेकिन हमने कैचमेंट को खत्म कर बाढ़ और सूखी नदियों के लिए आदर्श स्थिति बना दी है। बड़ी नदियां पनबिजली, सिंचाई या धार्मिक अनुष्ठानों (या फिर मैदानी क्षेत्र में जल आपूर्ति ) के लिए तो ठीक हैं लेकिन गांवों को खुशहाल रखने के लिए नदियों का जलागम क्षेत्र स्वस्थ रखना होगा। इस बारे में मेरी लिखी रिपोर्ट्स का लिंक कमेंट सेक्शन में है और यू-ट्यूब चैनल जहां हम ये सब जानकारी देते हैं।

Hridayesh Joshi

27,020 görüntüleme • 1 ay önce

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The first day of the Kedarnath Yatra has once again exposed a hard truth — our approach to Himalayan tourism is deeply flawed. I witnessed severe difficulties faced by pilgrims due to an overwhelming rush. This is not devotion alone — this is mismanagement. There is no serious planning on carrying capacity. Fragile Himalayan regions like Kedarnath cannot handle unlimited numbers. Regulating footfall is not restriction — it is protection: of people, of ecology, and of faith itself. We also need to question the growing “zip-pass tourism” model — helicopters, express access, rushed darshans. This may look efficient, but it sidelines the very people who sustain the local economy. Small dhabas, tea sellers, porters, and local businesses depend on pilgrims who stay, walk, and engage. When tourists come and leave within hours, the local economy loses its lifeline. And when disasters or disruptions occur, communication collapses. Panic spreads, bookings get cancelled across the region, and once again, it is the local communities that suffer the most. This is an ecologically sensitive zone. Visual spectacles like helicopters showering petals may look grand, but they are completely unnecessary and out of sync with the spirit of the Himalaya. We must ask: 👉 Are we building a system that respects the mountains? 👉 Or are we turning sacred spaces into high-speed consumption zones? We are not against tourism. We are for sustainable, responsible tourism — one that balances faith, environment, and livelihoods. Because in the Himalaya, every decision echoes far beyond the moment. And while such issues trend only when something goes wrong and are quickly forgotten, I consistently raise these concerns through my videos to build long-term awareness — do subscribe and join Eco N Energy Talk: #Kedarnath #SustainableTourism #Himalaya #CharDham #ResponsibleTravel

Hridayesh Joshi

32,941 görüntüleme • 3 ay önce

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सुबह सुबह ये बात मैं बहुत भारी मन से लिख रहा हूं। पिछले कुछ महीनों के फील्ड वर्क, रिसर्च, अध्ययन और विशेषज्ञों से बात के बाद मेरा यह विश्वास और दृढ़ हुआ है कि हम आधुनिकता और संपत्ति के डेरे, जो हमारे शहर बना रहे हैं वो हमारी नेचुरल वेल्थ और संसाधनों को पूरी तरह नष्ट कर रहे हैं। जो झीलें, तालाब और जलधारायें हमारे पास हुआ करती थीं उनका जलागम नष्ट करके पिछले कुछ दशकों में ये शहरी बसावटें खड़ी की गईं हैं और इस कारण पैदा हुआ ख़तरा हम नहीं देख पा रहे। सच ये है कि शहरों ने न केवल आसपास की वॉटर बॉडीज़ को प्रदूषित और नष्ट कर दिया है वह दूर दराज़ के गांवों और कस्बों का पानी खींचकर अपनी जल संकट की भरपाई कर रहे हैं। बढ़ते हीटआईलैंड प्रभाव के पीछे एक कारण यह भी है। हमारे शहरों में ग्राउंड वॉटर की समस्या का बढ़ना इसका एक और संकेतक है। मैंने कार्बनकॉपी पॉडकास्ट के लिए इस बारे में दो विशेषज्ञों आईआईटी दिल्ली के डॉ अजय माथुर और संरक्षण जीवविज्ञानी और रीवाइ्ल्डर विजय धस्माना और पर्यावरण कार्यकर्ता भवरीन कंधारी से बात की है। पूरी बातचीत का लिंक कमेंट सेक्शन में है। अगर संभव हो तो देखें .. हो सकता है बहुत रुचिकर नहीं लगे लेकिन आपको जानकारी ज़रूर मिलेगी।

Hridayesh Joshi

16,779 görüntüleme • 1 ay önce