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Manjeet Negi

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Executive Editor of @Aajtak & @Indiatoday #Defence #Strategicaffairs & #Politics, Author of 3 books,Tweets & retweets are personal…डर के आगे मन-जीत है…

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Who can think of messing with these WAR MACHINES?? Indian TANKS Patrolling somewhere in the ladakh sector.🔥🇮🇳

Who can think of messing with these WAR MACHINES?? Indian TANKS Patrolling somewhere in the ladakh sector.🔥🇮🇳

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Chopta, often called the "Mini Switzerland of India," is a picturesque hill station located in the Rudraprayag district of Uttarakhand at an altitude of approximately 2,608 meters. It serves as the base for the popular 3.5 km trek to the Tungnath temple, which is the highest Shiva temple in the world. The region is a biodiversity hotspot situated within the Kedarnath Wildlife Sanctuary, renowned for its dense forests of pine, rhododendron, and lush alpine meadows (bugyals). It offers breathtaking, panoramic views of major Himalayan peaks like Nanda Devi, Trishul, and Chaukhamba. Known as a year-round destination, it is particularly famous for winter trekking and bird watching, with over 240 species of birds, including the Himalayan Monal.

Chopta, often called the "Mini Switzerland of India," is a picturesque hill station located in the Rudraprayag district of Uttarakhand at an altitude of approximately 2,608 meters. It serves as the base for the popular 3.5 km trek to the Tungnath temple, which is the highest Shiva temple in the world. The region is a biodiversity hotspot situated within the Kedarnath Wildlife Sanctuary, renowned for its dense forests of pine, rhododendron, and lush alpine meadows (bugyals). It offers breathtaking, panoramic views of major Himalayan peaks like Nanda Devi, Trishul, and Chaukhamba. Known as a year-round destination, it is particularly famous for winter trekking and bird watching, with over 240 species of birds, including the Himalayan Monal.

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उत्तराखंड की नदियाँ आज एक खामोश संकट से गुजर रही हैं- एक ऐसा संकट जो साफ दिखाई देता है, लेकिन जिस पर कार्रवाई बेहद कम नजर आती है। जहाँ कभी निर्मल जलधारा बहती थी, वहाँ अब भारी मशीनों की गड़गड़ाहट सुनाई देती है। नदी का स्वरूप बदल चुका है- पानी गायब है और उसकी जगह जेसीबी, पोकलैंड और डंपरों का कब्ज़ा दिखाई देता है। रेत और बजरी की अंधाधुंध खुदाई ने नदियों को भीतर तक खोखला कर दिया है। कई स्थानों पर नदी का प्राकृतिक प्रवाह खत्म हो चुका है और तल गहरी खाइयों में तब्दील हो गया है। यह बदलाव केवल दृश्य नहीं, बल्कि एक बड़े पर्यावरणीय संकट का संकेत है। नदी किनारों पर कटाव तेजी से बढ़ रहा है, जिससे आसपास के इलाकों और पुलों की सुरक्षा पर खतरा मंडरा रहा है। भू-स्खलन की घटनाओं में भी बढ़ोतरी देखी जा रही है, जो इस असंतुलन का सीधा परिणाम है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह सब कुछ खुलेआम हो रहा है। नियम और कानून कागज़ों तक सीमित हैं, जबकि जमीनी हकीकत में खनन बिना किसी रोक-टोक के जारी है। यह अब केवल अवैध गतिविधि नहीं, बल्कि एक संगठित तंत्र बन चुका है, जिसमें कई स्तरों पर मिलीभगत की आशंका जताई जा रही है। पहाड़ों की नदियाँ केवल पानी का स्रोत नहीं हैं,वे यहाँ की संस्कृति, आस्था और जीवन का आधार हैं। उनका इस तरह से खत्म होना केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि हमारी विरासत का भी नुकसान है। अब सवाल यह है कि क्या हम इस खामोश विनाश को यूँ ही देखते रहेंगे, या इसके खिलाफ आवाज़ उठाएँगे? क्योंकि अगर आज नहीं चेते, तो आने वाले समय में नदियों का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा। देवभूमि की इन जीवनदायिनी नदियों को बचाना हम सभी की साझा जिम्मेदारी है।

उत्तराखंड की नदियाँ आज एक खामोश संकट से गुजर रही हैं- एक ऐसा संकट जो साफ दिखाई देता है, लेकिन जिस पर कार्रवाई बेहद कम नजर आती है। जहाँ कभी निर्मल जलधारा बहती थी, वहाँ अब भारी मशीनों की गड़गड़ाहट सुनाई देती है। नदी का स्वरूप बदल चुका है- पानी गायब है और उसकी जगह जेसीबी, पोकलैंड और डंपरों का कब्ज़ा दिखाई देता है। रेत और बजरी की अंधाधुंध खुदाई ने नदियों को भीतर तक खोखला कर दिया है। कई स्थानों पर नदी का प्राकृतिक प्रवाह खत्म हो चुका है और तल गहरी खाइयों में तब्दील हो गया है। यह बदलाव केवल दृश्य नहीं, बल्कि एक बड़े पर्यावरणीय संकट का संकेत है। नदी किनारों पर कटाव तेजी से बढ़ रहा है, जिससे आसपास के इलाकों और पुलों की सुरक्षा पर खतरा मंडरा रहा है। भू-स्खलन की घटनाओं में भी बढ़ोतरी देखी जा रही है, जो इस असंतुलन का सीधा परिणाम है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह सब कुछ खुलेआम हो रहा है। नियम और कानून कागज़ों तक सीमित हैं, जबकि जमीनी हकीकत में खनन बिना किसी रोक-टोक के जारी है। यह अब केवल अवैध गतिविधि नहीं, बल्कि एक संगठित तंत्र बन चुका है, जिसमें कई स्तरों पर मिलीभगत की आशंका जताई जा रही है। पहाड़ों की नदियाँ केवल पानी का स्रोत नहीं हैं,वे यहाँ की संस्कृति, आस्था और जीवन का आधार हैं। उनका इस तरह से खत्म होना केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि हमारी विरासत का भी नुकसान है। अब सवाल यह है कि क्या हम इस खामोश विनाश को यूँ ही देखते रहेंगे, या इसके खिलाफ आवाज़ उठाएँगे? क्योंकि अगर आज नहीं चेते, तो आने वाले समय में नदियों का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा। देवभूमि की इन जीवनदायिनी नदियों को बचाना हम सभी की साझा जिम्मेदारी है।

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पौड़ी में डीएम के औचक निरीक्षण के दौरान जल संस्थान कार्यालय में कई कर्मचारी और अधिकारी अनुपस्थित मिले। वीडियो कॉल पर जेई घर पर मिले, जिसके बाद संबंधित जेई को प्रतिकूल प्रविष्टि देने और एई से जवाब तलब करने के निर्देश दिए गए। यह घटना सिर्फ एक विभाग की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम में फैली कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। लोग अपनी ड्यूटी को गंभीरता से नहीं निभाते। चाहे सरकारी अस्पताल हो, सरकारी स्कूल, तहसील या कोई अन्य सरकारी संस्थान, लापरवाही का सबसे बड़ा असर आखिरकार आम जनता पर ही पड़ता है। जब अधिकारी और कर्मचारी अपने कर्तव्यों से दूर भागते हैं, तब जनता को मूलभूत सुविधाओं के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। सरकारी नौकरी केवल वेतन और सुविधा का माध्यम नहीं, बल्कि जनता के प्रति जिम्मेदारी और जवाबदेही भी है। ऐसे लापरवाह तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होना बेहद जरूरी है ताकि सिस्टम में अनुशासन बना रहे और लोगों का भरोसा प्रशासन पर कायम रह सके।

Manjeet Negi

34,990 görüntüleme • 23 gün önce

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शायद अलकनंदा नदी कुछ समय बाद विलुप्त हो जाए, तो हमें आश्चर्य नहीं होगा। श्रीनगर गढ़वाल में अलकनंदा की जो हालत हो चुकी है, वह बेहद दुखद और चिंताजनक है। अवैध खनन ने नदी के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। दिन-रात जेसीबी और ट्रकों ने लगातार खुदाई कर नदी को भीतर से खोखला कर दिया है। जहाँ कभी जल की अविरल धारा बहती थी, आज वहाँ सूखी रेत और गड्ढे दिखाई देते हैं। नदी का प्राकृतिक स्वरूप पूरी तरह नष्ट किया जा रहा है। इससे पर्यावरण संतुलन, जलस्तर और जैव विविधता पर गहरा असर पड़ रहा है। स्थानीय लोगों की आजीविका और भविष्य भी खतरे में है। हैरानी की बात यह है कि राज्य सरकार और उसके अधिकारी पूरी तरह मौन हैं। सब जानते हैं कि यह चुप्पी किसके हित में है। नियमों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हो रही। यह सरकार की नाकामी और उदासीनता को साफ दर्शाता है। प्राकृतिक संसाधनों का यह दोहन किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है। अब हर जागरूक नागरिक का सामूहिक कर्तव्य है कि वह आवाज़ उठाए और सरकार को जवाबदेह बनाए।

Manjeet Negi

21,567 görüntüleme • 4 ay önce

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देहरादून से प्राप्त एक वीडियो ने बिंदाल नदी के साथ हो रहे गंभीर पर्यावरणीय अपराध को उजागर किया है। वीडियो में साफ़ दिखाई देता है कि किस तरह भू-माफिया और खनन माफिया ने मिलकर नदी के प्राकृतिक बहाव से छेड़छाड़ की है। बिंदाल नदी का मुख/प्रवाह जबरन बदला गया है, जो पूरी तरह अवैध है। नदी क्षेत्र के भीतर नियमों को दरकिनार कर पक्के ढांचे खड़े कर दिए गए हैं। वहां अवैध भरान और निर्माण कार्य भी धड़ल्ले से किया गया है। यह सब किसी एक दिन का काम नहीं, बल्कि सुनियोजित गतिविधियों का परिणाम लगता है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतने बड़े स्तर पर यह सब आखिर किसकी शह पर हो रहा है? क्या प्रशासन को यह सब दिखाई नहीं देता, या फिर जानबूझकर अनदेखी की जा रही है? राज्य सरकार की निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं। पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी निभाने वाला NGT इस पूरे मामले में अब तक खामोश क्यों है? नदी के प्राकृतिक मुख से छेड़छाड़ भविष्य में बाढ़ और बड़े नुकसान को न्योता दे सकती है। देहरादून पहले ही पर्यावरणीय दबाव झेल रहा है, ऐसे में यह लापरवाही बेहद खतरनाक है। अब ज़रूरत है कि दोषियों पर तत्काल सख्त कार्रवाई हो और संरक्षण देने वालों को भी बेनकाब किया जाए।

Manjeet Negi

16,435 görüntüleme • 5 ay önce

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