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Manish Singh

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गिरती हुई दीवार का हमदर्द हूं लेकिन चढते हुए सूरज की, परस्तिश नही करता

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मुसलमान तो पेचकस लेकर ही घूम रहा है न ... स्किल डेवलपमेट मिनिस्ट्री को 1.48 लाख करोड़ का Annual बजट आवंटित होता है। पिछले 8 साल मे करीब 5 लाख करोड़ खर्च हो चुके हैं। ●● लाखो करोड रूपया मिस्त्री, इलेक्ट्रिशियन, प्लंबर, आटो मेकेनिक जैसे काम मे प्रशिक्षित मजदूर बनाने के लिए। यह पेचकस लेकर घूमने का ही काम है। जो बकौल Ex-CM - पिछड़ेपन का प्रतीक है। तो क्यो तेरी सरकार हिंदुओ को पेचकस लेकर घुमवाने के लिए अरबो खर्च कर रही है भई?? ●● घर बनाना हो, टाइल्स लगानी हो, फर्नीचर बनवाना हो, Craft और हाथ का कोई काम हो। बनारसी साड़ी से मुरादाबादी पीतल तक, आगरा के चमड़े के कारखाने और बोर लेथ के वर्कशाप। भरोसेमंद मैकेनिक तो कोई मुसलमान ही है। हिंदुओ स्कीम डेवलपमेण्ट का ज्यादातर पैसा जीम लिया गया है। हिंदू इंजीनियर की डिग्री लेकर जोमैटो का डिलीवरी बॉय बना हआ है। आईटी सेल मे देश बचा रहा है, ड्रीम इलेवन पर सट्टा खेल रहा है, लड़कियो के इनबॉक्स मे घुस रहा है। पर पेचकस लेकर काम करना नही चाहता। छोटा काम है न .. ●● बस एक रील बनाना बड़ा काम है। वह एक मुस्लिम के साथ, नेताजी की पत्नी कर रही हैं। सौगंध राम की खाते हैं रील यहीं बनाऐंगे।

मुसलमान तो पेचकस लेकर ही घूम रहा है न ... स्किल डेवलपमेट मिनिस्ट्री को 1.48 लाख करोड़ का Annual बजट आवंटित होता है। पिछले 8 साल मे करीब 5 लाख करोड़ खर्च हो चुके हैं। ●● लाखो करोड रूपया मिस्त्री, इलेक्ट्रिशियन, प्लंबर, आटो मेकेनिक जैसे काम मे प्रशिक्षित मजदूर बनाने के लिए। यह पेचकस लेकर घूमने का ही काम है। जो बकौल Ex-CM - पिछड़ेपन का प्रतीक है। तो क्यो तेरी सरकार हिंदुओ को पेचकस लेकर घुमवाने के लिए अरबो खर्च कर रही है भई?? ●● घर बनाना हो, टाइल्स लगानी हो, फर्नीचर बनवाना हो, Craft और हाथ का कोई काम हो। बनारसी साड़ी से मुरादाबादी पीतल तक, आगरा के चमड़े के कारखाने और बोर लेथ के वर्कशाप। भरोसेमंद मैकेनिक तो कोई मुसलमान ही है। हिंदुओ स्कीम डेवलपमेण्ट का ज्यादातर पैसा जीम लिया गया है। हिंदू इंजीनियर की डिग्री लेकर जोमैटो का डिलीवरी बॉय बना हआ है। आईटी सेल मे देश बचा रहा है, ड्रीम इलेवन पर सट्टा खेल रहा है, लड़कियो के इनबॉक्स मे घुस रहा है। पर पेचकस लेकर काम करना नही चाहता। छोटा काम है न .. ●● बस एक रील बनाना बड़ा काम है। वह एक मुस्लिम के साथ, नेताजी की पत्नी कर रही हैं। सौगंध राम की खाते हैं रील यहीं बनाऐंगे।

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क्या ही प्राणी है भई... क्या ही डरा लोगे इसे?? ईडी इंट्रोगेशन कर रही है, और मैं उधर लॉकअप देख रहा हूँ। सोच रहा हूँ, की मेरे परदादा 12 साल ऐसी ही सेल में बैठे थे... तो दस साल तो मेरा भी बनता है.. ●● अक्रॉस द पार्टीज, अक्रॉस द नेशन.. एक नेता बता दो, जो ऐसी बात बोल देने का भी गट्स रखता हो। एंड आई सीरियसली बिलीव, कि इस बंदे को पीएम शिएम बनने में कत्तई रुचि नही। ये तो सर से पाँव तक घोर एंटी एस्टेब्लिशमेंट है। तो मौका आएगा, तो टोपी किसी और के हाथ दे देगा। सत्ता की कुंजी हाथ मे रखेगा। वह सब कुछ, कान पकड़कर औरो से करवाएगा, जो सत्ता में रहने वाले को सत्ता की मजबूरियां करने नही देती। ●● राहुल,अपने जीवन मे राहुल होने का आनंद ले रहे है। गांधी होने का वजन हंसकर, हंसाकर उठा रहे हैं। जो मोहब्बत, जो लगाव, और जो पीस डालने वाली आशाओं का दबाव इस सरनेम के साथ जुड़ा होता है, ये उसके बोझ से चरमराता हुआ शख्स नही है। उसकी गुरुता से गर्वित है। न मौत का डर, न जेल का। न ठेके दिलाने हैं, न कमीशन में रुचि। लड़के में आज जवाहरलाल का वारिस, गांधी का अक्स दिखा है। ●● हां, उस म्यार पर पंहुचने में तो अभी वक्त है। उसके हिस्से का सँघर्ष बाकी है, लेकिन इंशाअल्लाह लम्बी उम्र भी बाकी है। राह यही पकड़ी रही, तो उनसे भी आगे जायेगा। वीडियो, पता नही कब, कहाँ का है। किसी ने आज लिंक भेजा, तो 20 बार देख चुका हूँ। आप भी देखिए।

क्या ही प्राणी है भई... क्या ही डरा लोगे इसे?? ईडी इंट्रोगेशन कर रही है, और मैं उधर लॉकअप देख रहा हूँ। सोच रहा हूँ, की मेरे परदादा 12 साल ऐसी ही सेल में बैठे थे... तो दस साल तो मेरा भी बनता है.. ●● अक्रॉस द पार्टीज, अक्रॉस द नेशन.. एक नेता बता दो, जो ऐसी बात बोल देने का भी गट्स रखता हो। एंड आई सीरियसली बिलीव, कि इस बंदे को पीएम शिएम बनने में कत्तई रुचि नही। ये तो सर से पाँव तक घोर एंटी एस्टेब्लिशमेंट है। तो मौका आएगा, तो टोपी किसी और के हाथ दे देगा। सत्ता की कुंजी हाथ मे रखेगा। वह सब कुछ, कान पकड़कर औरो से करवाएगा, जो सत्ता में रहने वाले को सत्ता की मजबूरियां करने नही देती। ●● राहुल,अपने जीवन मे राहुल होने का आनंद ले रहे है। गांधी होने का वजन हंसकर, हंसाकर उठा रहे हैं। जो मोहब्बत, जो लगाव, और जो पीस डालने वाली आशाओं का दबाव इस सरनेम के साथ जुड़ा होता है, ये उसके बोझ से चरमराता हुआ शख्स नही है। उसकी गुरुता से गर्वित है। न मौत का डर, न जेल का। न ठेके दिलाने हैं, न कमीशन में रुचि। लड़के में आज जवाहरलाल का वारिस, गांधी का अक्स दिखा है। ●● हां, उस म्यार पर पंहुचने में तो अभी वक्त है। उसके हिस्से का सँघर्ष बाकी है, लेकिन इंशाअल्लाह लम्बी उम्र भी बाकी है। राह यही पकड़ी रही, तो उनसे भी आगे जायेगा। वीडियो, पता नही कब, कहाँ का है। किसी ने आज लिंक भेजा, तो 20 बार देख चुका हूँ। आप भी देखिए।

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प्रेम नाम है मेरा, प्रेम चोपड़ा.. बॉलीवुड विलेन्स में प्रेम चोपड़ा लीग से हटकर थे। ऑन स्क्रीन प्रेजेंस इतनी जबरजस्त.. कि उनके लिए विशेष डायलॉग लिखे जाते थे। ●● कोर कोर तक बुरा आदमी, धूर्त, बेईमान, लम्पट किरदार जिसके शक्ल से उमड़ता काइयांपन उनके विलेनियस किरदार को जीवंत बना देता था। भला कौन ऐसा दूजा एक्टर है जो कहे- "सांप से मैनें यह सीखा है, की जो दूध पिलाये, उसे डस लो".. और जनता उछल उछल कर खुश हो जाये। दरअसल प्रेम चोपड़ा वो बला थे, जो शीशे से पत्थर तोड़ते थे। उनके द्वारा निभाये रहे कैरेक्टर की कमीनगी पर ऐसा अटूट भरोसा होता कि जब वो कहे- "कर भला तो हो भला" तो जनता जान जाती कि ये अब ये बन्दा बहुत गलीज किस्म का काम करने जा रहा है। प्रेम चोपड़ा को भी अपनी इमेज पर कोई शुबहा न था। खुद ही कहते - "नेचर तो मेरा जानते ही हो तुम लोग" ●● प्रेम की कमीनगी में परफेक्शन, जीवन भर लगन और समर्पण से सीखते रहने से आया। वे बताते है- उल्लू से मैनें यह सीखा है कि अपने घोंसले खुद नही बनाते। वे दूसरों के घोसले पर कब्जा कर लेते है..!! सर्वशक्तिमान होते थे प्रेम चोपड़ा। आखरी सीन में गिरफ्तारी, हीरो के हाथों भयंकर पिटाई वगैरह को छोड़ दें, तो तीन घण्टे की फ़िल्म में ढाई घण्टे तो उनका ही दबदबा होता। वे कहते- "जिंदगी भले ऊपरवाले के हाथ मे हो, लेकिन मौत का डिपार्टमेंट हमने अपने हाथ मे ले रखा है" ●● वे दुश्मन की कमजोरी का भरपूर लाभ उठाते। कहते है- जिनके घर शीशे के होते है, वे बत्ती बुझाकर कपड़े बदलते हैं। गरीबो के प्रति हिकारत का यह आलम कि बार-बार बोलते- नंगा नहायेगा क्या, और निचोड़ेगा क्या? सेल्फ प्रमोशन में उनका जवाब नही था। हर फिल्म में नया गेट अप, नया अंदाज, और आत्म प्रशंसा...!! एक बार वह नागपाल बने थे, तो अपने बारे में कहते है-नागपाल वो सांप है, जिसका काटा पानी नही मांगता। इस फ़िल्म में वे करप्ट मंत्री का रोल करते है। एक जगह अपने ही साथी को कहते है- "मैं तुम्हारी सजा माफ करा सकता हूँ। लेकिन तुम्हे नागपाल रिलीफ फंड में 20 लाख रोकड़ा देना होगा' ●● इसी फिल्म में वे एक जगह कहते है- अगर अपोजिशन वाले जनता को राशन देंगे, तो हम जनता को भाषण देंगे। उनका लक, कॉन्फिडेन्स, और तिकड़म इतनी तगड़ी, की इस फ़िल्म में फिर से चुनाव जीत जाते हैं। ●● प्रेम चोपड़ा का जवाब नही। उनका शानदार कॅरियर, उनके डायलॉग्स की वजह से फेमस हुआ। 1935 में जन्मे प्रेम चोपड़ा सिल्वर स्क्रीन पर 60 के दशक से लगातार चमकने के बाद, अब पकी उम्र में फिल्मों से सन्यास ले चुके हैं। लेकिन उनके संवाद लेखकों ने नही। इसमे से कुछ ने प्रधानमंत्री मोदी का भाषण लिखना शुरू कर दिया है। 🙏❤️🥰

प्रेम नाम है मेरा, प्रेम चोपड़ा.. बॉलीवुड विलेन्स में प्रेम चोपड़ा लीग से हटकर थे। ऑन स्क्रीन प्रेजेंस इतनी जबरजस्त.. कि उनके लिए विशेष डायलॉग लिखे जाते थे। ●● कोर कोर तक बुरा आदमी, धूर्त, बेईमान, लम्पट किरदार जिसके शक्ल से उमड़ता काइयांपन उनके विलेनियस किरदार को जीवंत बना देता था। भला कौन ऐसा दूजा एक्टर है जो कहे- "सांप से मैनें यह सीखा है, की जो दूध पिलाये, उसे डस लो".. और जनता उछल उछल कर खुश हो जाये। दरअसल प्रेम चोपड़ा वो बला थे, जो शीशे से पत्थर तोड़ते थे। उनके द्वारा निभाये रहे कैरेक्टर की कमीनगी पर ऐसा अटूट भरोसा होता कि जब वो कहे- "कर भला तो हो भला" तो जनता जान जाती कि ये अब ये बन्दा बहुत गलीज किस्म का काम करने जा रहा है। प्रेम चोपड़ा को भी अपनी इमेज पर कोई शुबहा न था। खुद ही कहते - "नेचर तो मेरा जानते ही हो तुम लोग" ●● प्रेम की कमीनगी में परफेक्शन, जीवन भर लगन और समर्पण से सीखते रहने से आया। वे बताते है- उल्लू से मैनें यह सीखा है कि अपने घोंसले खुद नही बनाते। वे दूसरों के घोसले पर कब्जा कर लेते है..!! सर्वशक्तिमान होते थे प्रेम चोपड़ा। आखरी सीन में गिरफ्तारी, हीरो के हाथों भयंकर पिटाई वगैरह को छोड़ दें, तो तीन घण्टे की फ़िल्म में ढाई घण्टे तो उनका ही दबदबा होता। वे कहते- "जिंदगी भले ऊपरवाले के हाथ मे हो, लेकिन मौत का डिपार्टमेंट हमने अपने हाथ मे ले रखा है" ●● वे दुश्मन की कमजोरी का भरपूर लाभ उठाते। कहते है- जिनके घर शीशे के होते है, वे बत्ती बुझाकर कपड़े बदलते हैं। गरीबो के प्रति हिकारत का यह आलम कि बार-बार बोलते- नंगा नहायेगा क्या, और निचोड़ेगा क्या? सेल्फ प्रमोशन में उनका जवाब नही था। हर फिल्म में नया गेट अप, नया अंदाज, और आत्म प्रशंसा...!! एक बार वह नागपाल बने थे, तो अपने बारे में कहते है-नागपाल वो सांप है, जिसका काटा पानी नही मांगता। इस फ़िल्म में वे करप्ट मंत्री का रोल करते है। एक जगह अपने ही साथी को कहते है- "मैं तुम्हारी सजा माफ करा सकता हूँ। लेकिन तुम्हे नागपाल रिलीफ फंड में 20 लाख रोकड़ा देना होगा' ●● इसी फिल्म में वे एक जगह कहते है- अगर अपोजिशन वाले जनता को राशन देंगे, तो हम जनता को भाषण देंगे। उनका लक, कॉन्फिडेन्स, और तिकड़म इतनी तगड़ी, की इस फ़िल्म में फिर से चुनाव जीत जाते हैं। ●● प्रेम चोपड़ा का जवाब नही। उनका शानदार कॅरियर, उनके डायलॉग्स की वजह से फेमस हुआ। 1935 में जन्मे प्रेम चोपड़ा सिल्वर स्क्रीन पर 60 के दशक से लगातार चमकने के बाद, अब पकी उम्र में फिल्मों से सन्यास ले चुके हैं। लेकिन उनके संवाद लेखकों ने नही। इसमे से कुछ ने प्रधानमंत्री मोदी का भाषण लिखना शुरू कर दिया है। 🙏❤️🥰

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ग़ालिब छूटी शराब पर अब भी कभी कभी पीता हूँ, रोज ए अब्र ए शब ए माहताब में कभी कभी शायरी पढ़ता हूँ। जावेद अख्तर फेवरिट है, बशीर बद्र भी, और राहत इन्दोरी भी। ●● गालिब भी पढ़ता हूँ। पहली बार गालिब से परिचय जगजीत सिंह के एलबम के मार्फ़त हुआ। तब आधा समझे, और बाकी आधा गलत सलत ही रटते हुए गुनगुनाते थे। फिर एक किताब ली। दीवान ए गालिब... उसमे कठिन शब्दो के अर्थ दिए होते थे। अबकी ज्यादा समझा। और अनसुने कलाम को भी पढा। लेकिन शब्द समझने के बाद भी कई बार भाव, सिर के ऊपर से निकल जाता। ●● फिर गूगल युग आया। न सिर्फ शब्दार्थ, बल्कि भावार्थ भी मिल जाते। ग़ालिब की खासियत यह है, हर सिचुएशन को एक्सप्लेन कर जाते हैं, अनिवर्चनीय को कह जाते हैं। और जादू यह, कि उस बोल का अर्थ दूसरी बहुत सी सिचुएशन में लागू होता है। याने अपने हालात के मुताबिक हर पाठक के लिए अर्थ कुछ अलग है। हर एक के दिल की किसी जुदा तंत्रिका को वह शेर छूता है। और जुबान वाह कहना भी भूल जाती है। ●● अच्छा लेखन वही, कि आदमी खो जाये। उसके भीतर कुछ घुड़मुड़ाये। उसके लिए, शब्द समझ मे आने चाहिए, भाव हृदय में उतरना चाहिए। ग़ालिब के दौर में अधिसंख्य लोग उर्दू समझते होंगे। अब नही। वो ट्रेडिशन्स नही, जिसमे ग़ालिब के भाव फिट हों। जैसे कागजी है पैरहन हर पैकरे तस्वीर का। तब जिन्हें शिकायत होती थी, वे कागज के वस्त्र पहनकर जाते थे शिकवा करने। अब वो ट्रेडिशन नही रही। तो कैसे समझेंगे की ग़ालिब कह रहे है- यहां हर शख्स कुछ न शिकवा लिए घूम रहा है। ●● इसके मुकाबले आप बशीर बद्र को पढिये। सीधी, साफ, समझ मे आने वाली खूबसूरत रूमानी शायरी है। जावेद को पढिये। एक मोहरे का सफर, नया हुक्मनामा, जो कहते सब डरते है, तू वो बात लिख... सीधा, सिम्पल, सटाक से दिल को लगने वाला। मगर इन सबसे ऊपर हैं- राहत इंदौरी। द किंग ऑफ सिम्पलीसिटी। हिम्मत, गुरुर, जज्बे का शायर। बशीर और जावेद का कॉंटॅक्स पूरा पेज या नज्म पढ़ने पर जाहिर होता है। यहां राहत, दो लाइन में आग लगा जाते हैं। गुलाब,ख़्वाब, दवा, ज़हर, जाम क्या क्या है मैं आ गया हूँ बता, इंतिज़ाम क्या क्या है ●● बड़े शायर, बड़े लेखक, शब्दो से नही खेलते। भाव से खेलते हैं। ये भाव, अनुभव से आपबीती से आते हैं। आपबीती न हो, तो सिंपथि से आते हैं, एम्पाथि से आते है, करुणा से उपजते हैं। यह करुणा, इंसान के हृदय को उर्वर बनाती है, ख्याल उपजते हैं। गैर की पीड़ा को, उसके दिल के हालात को, उसकी निगाह को अपने भीतर पैवस्त करना-फिर जहां को देखना जो दिखे, उसे गहरे, आसान लफ्जों में लिख देना। महान शायर और लेखक तो वही हुए, जिन्होंने आसान लफ्जों में गहरी बात कही- क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात नही कहोगे?? यहां साहस है, चुनौती है, एक मजबूर, मजलूम बेवा की इल्तजा है पंच परमेश्वर से सवाल है। ●● आपमे सिंपथि नही, एम्पाथि नही, तो भाव कालजयी कैसे हो?? जब आपकी बात भीतर प्रेम न जगाए, शीतल न करे। चुनौती न दे, सवाल न हो, जो विद्रोह का साहस न जगाए... घृणा जगाये। जातीय, धार्मिक, सामुदायिक नफरत से लबरेज हो। लेखक का, शायर का दिल बंजर है, ईर्ष्या से भरा है। इस ज्वालामुखी के क्रेटर से कौन से भाव उगलेंगे?? ●● जलाने वाला मैग्मा ही निकलेगा। सस्ता साहित्य, घटिया कविता, बकवासी तुकबन्दी। पाकिस्तान से पर चढ़ाई और हिंदुस्तान की वाहवाही.. छपवा लो दस किताबें, मगर कालजयी कृति कैसे बनेगी भईया? खोखले चिकने शब्दों से कितना खेलोगे। अगर खूब सारे भारी भरकम शब्दो का जमावड़ा ही कालजयी साहित्य होता.. तो भार्गव की डिक्शनरी शेक्सपियर के साहित्य से बड़ी मानी जाती। ●● आज शब्दजाल वाले किसी उभरते लेखक से बकझक हुई। सो लिख दिया। समझने वाले समझ गए। जो न समझे उनके लिए अर्ज करता हूँ- जमी पर घर बनाया, मगर जन्नत में रहते है हमारी खुश नसीबी है, कि हम भारत मे रहते है अब आप इसे घटिया शेर मानते है तो आपकी शायरी की समझ है। अगर बेहतरीन शेर मानते है, तो पॉलिटिक्स की समझ है। अगर आप इसे शेर नही, अनहद पॉपुलिस्ट बकैती मानते है, तो अब आपको मेरी भी समझ है। ❤️

ग़ालिब छूटी शराब पर अब भी कभी कभी पीता हूँ, रोज ए अब्र ए शब ए माहताब में कभी कभी शायरी पढ़ता हूँ। जावेद अख्तर फेवरिट है, बशीर बद्र भी, और राहत इन्दोरी भी। ●● गालिब भी पढ़ता हूँ। पहली बार गालिब से परिचय जगजीत सिंह के एलबम के मार्फ़त हुआ। तब आधा समझे, और बाकी आधा गलत सलत ही रटते हुए गुनगुनाते थे। फिर एक किताब ली। दीवान ए गालिब... उसमे कठिन शब्दो के अर्थ दिए होते थे। अबकी ज्यादा समझा। और अनसुने कलाम को भी पढा। लेकिन शब्द समझने के बाद भी कई बार भाव, सिर के ऊपर से निकल जाता। ●● फिर गूगल युग आया। न सिर्फ शब्दार्थ, बल्कि भावार्थ भी मिल जाते। ग़ालिब की खासियत यह है, हर सिचुएशन को एक्सप्लेन कर जाते हैं, अनिवर्चनीय को कह जाते हैं। और जादू यह, कि उस बोल का अर्थ दूसरी बहुत सी सिचुएशन में लागू होता है। याने अपने हालात के मुताबिक हर पाठक के लिए अर्थ कुछ अलग है। हर एक के दिल की किसी जुदा तंत्रिका को वह शेर छूता है। और जुबान वाह कहना भी भूल जाती है। ●● अच्छा लेखन वही, कि आदमी खो जाये। उसके भीतर कुछ घुड़मुड़ाये। उसके लिए, शब्द समझ मे आने चाहिए, भाव हृदय में उतरना चाहिए। ग़ालिब के दौर में अधिसंख्य लोग उर्दू समझते होंगे। अब नही। वो ट्रेडिशन्स नही, जिसमे ग़ालिब के भाव फिट हों। जैसे कागजी है पैरहन हर पैकरे तस्वीर का। तब जिन्हें शिकायत होती थी, वे कागज के वस्त्र पहनकर जाते थे शिकवा करने। अब वो ट्रेडिशन नही रही। तो कैसे समझेंगे की ग़ालिब कह रहे है- यहां हर शख्स कुछ न शिकवा लिए घूम रहा है। ●● इसके मुकाबले आप बशीर बद्र को पढिये। सीधी, साफ, समझ मे आने वाली खूबसूरत रूमानी शायरी है। जावेद को पढिये। एक मोहरे का सफर, नया हुक्मनामा, जो कहते सब डरते है, तू वो बात लिख... सीधा, सिम्पल, सटाक से दिल को लगने वाला। मगर इन सबसे ऊपर हैं- राहत इंदौरी। द किंग ऑफ सिम्पलीसिटी। हिम्मत, गुरुर, जज्बे का शायर। बशीर और जावेद का कॉंटॅक्स पूरा पेज या नज्म पढ़ने पर जाहिर होता है। यहां राहत, दो लाइन में आग लगा जाते हैं। गुलाब,ख़्वाब, दवा, ज़हर, जाम क्या क्या है मैं आ गया हूँ बता, इंतिज़ाम क्या क्या है ●● बड़े शायर, बड़े लेखक, शब्दो से नही खेलते। भाव से खेलते हैं। ये भाव, अनुभव से आपबीती से आते हैं। आपबीती न हो, तो सिंपथि से आते हैं, एम्पाथि से आते है, करुणा से उपजते हैं। यह करुणा, इंसान के हृदय को उर्वर बनाती है, ख्याल उपजते हैं। गैर की पीड़ा को, उसके दिल के हालात को, उसकी निगाह को अपने भीतर पैवस्त करना-फिर जहां को देखना जो दिखे, उसे गहरे, आसान लफ्जों में लिख देना। महान शायर और लेखक तो वही हुए, जिन्होंने आसान लफ्जों में गहरी बात कही- क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात नही कहोगे?? यहां साहस है, चुनौती है, एक मजबूर, मजलूम बेवा की इल्तजा है पंच परमेश्वर से सवाल है। ●● आपमे सिंपथि नही, एम्पाथि नही, तो भाव कालजयी कैसे हो?? जब आपकी बात भीतर प्रेम न जगाए, शीतल न करे। चुनौती न दे, सवाल न हो, जो विद्रोह का साहस न जगाए... घृणा जगाये। जातीय, धार्मिक, सामुदायिक नफरत से लबरेज हो। लेखक का, शायर का दिल बंजर है, ईर्ष्या से भरा है। इस ज्वालामुखी के क्रेटर से कौन से भाव उगलेंगे?? ●● जलाने वाला मैग्मा ही निकलेगा। सस्ता साहित्य, घटिया कविता, बकवासी तुकबन्दी। पाकिस्तान से पर चढ़ाई और हिंदुस्तान की वाहवाही.. छपवा लो दस किताबें, मगर कालजयी कृति कैसे बनेगी भईया? खोखले चिकने शब्दों से कितना खेलोगे। अगर खूब सारे भारी भरकम शब्दो का जमावड़ा ही कालजयी साहित्य होता.. तो भार्गव की डिक्शनरी शेक्सपियर के साहित्य से बड़ी मानी जाती। ●● आज शब्दजाल वाले किसी उभरते लेखक से बकझक हुई। सो लिख दिया। समझने वाले समझ गए। जो न समझे उनके लिए अर्ज करता हूँ- जमी पर घर बनाया, मगर जन्नत में रहते है हमारी खुश नसीबी है, कि हम भारत मे रहते है अब आप इसे घटिया शेर मानते है तो आपकी शायरी की समझ है। अगर बेहतरीन शेर मानते है, तो पॉलिटिक्स की समझ है। अगर आप इसे शेर नही, अनहद पॉपुलिस्ट बकैती मानते है, तो अब आपको मेरी भी समझ है। ❤️

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मैंने हमेशा कहा है कि मेरी पोस्ट कॉपीराइट फ्री है। जहां मर्ज़ी छाप दें, कॉपी पेस्ट करें, वीडियो बना लेंवे। और धड़ल्ले से , अपने नाम से यूज कर सकते हैं। कुछ लोगो ने किया, वीडियोज भी बनाये। ●● लेकिन इतना बढ़िया नही, जितना की आशु झा Ashu Jha ‘नक़्क़ाश’ ने बनाया है। असल मे लिखते वक़्त जो धाराप्रवाह वाक्य संरचना होती है। और गंभीर बात के बीच हास्य का टोन देकर झट से गम्भीर विषय पर लौट जाना- आशु ठीक वैसा रचते हैं, जो लिखते वक्त मेरे दिमाग मे था। इसका मतलब की अगर मैं अपने पोस्ट पढ़कर वीडियो बनाता, तो बिल्कुल यही बनाता। शायद आशु ने उससे भी बेहतर बनाया है। ●● भाई ने मेरी कुछ और भी पोस्ट पर वीडियो किये हैं। उन्हें उनके हैंडल पर जाकर देखा जाए। उन्हें चटपट फॉलो करना स्ट्रोंगली रिकमण्डित है। ❤️😊👍💕

Manish Singh

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नेहरू ने दिलवा दी चीन को वीटो पॉवर.. अबे साले...!!! चीन, सिक्योरिटी काउंसिल का फाउंडर मेम्बर था। उनके पास 1945 से ही वीटो पॉवर थी। नेहरू के PM बनने के ढाई साल पहले से.. ●● लेकिन लोचा ये हुआ,कि जब 1949 में चीन में कम्युनिस्ट तख्तापलट हो गया। माओ के नए रेजीम को UN ने मान्यता नही दी। इसलिए वह वीटो पॉवर का इस्तेमाल नही कर सकता था। ऐसा तब तक रहा जब तक कि चीन की मान्यता, UN मेम्बरशिप और वीटो पॉवर रिस्टोर न हो गयी। वो रिस्टोर हुई - 25 अक्टूबर 1971 को नेहरू के मरने के 7 साल बाद। ●● तो जो चीज, चीन के पास नेहरू के पीएम बनने के पहले से थी, और खो जाने पर, नेहरू के मरने के 7 साल बाद मिली.. उसे नेहरू ने दिलवा दिया, नेहरू ने दिलवा दिया नेहरू ने दिलवा दिया। अबे घोंचू!! स्वर्ग से दिलवा दिया। ●● टाई लगाकर, सूट पहनकर, शानदार रोशनी में, कंडेनसर माइक के सामने, HD हाई कैमरा पे अपनी जहालत की दुकान पसारे, ये बेवकूफ कौन है, मुझे नही पता। लेकिन इस चवन्नी छाप पॉडकास्टर को कोई जानता हो तो बता दे। ये जो कागज पढ़कर सुना रहा है, - इंफॉर्मली सजेशंस हैव... पहला शब्द-इंफॉर्मली अबे साले। इंफॉर्मली!!! इंफॉर्मली!! इंफॉर्मली!! ●● ये यूनाइटेड नेशंस है। किसी जिले की कलक्टरी नही, की मंत्री जी कमीशन लेकर पोस्टिंग दिलवा देंगे। यूएन के चार्टर (सम्विधान) में सिर्फ 5 परमानेंट सीट का प्रावधान है। छठवां जोड़ने के लिए चार्टर में संशोधन आएगा। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्ताव होगा। इसके लिए दुनिया के दो तिहाई देशो का बहुमत लगेगा। बशर्ते कि पांच बड़े में से कोई एक वीटो न कर दे। ●● चीन की जगह भारत को लाने के लिए भी ठीक यही प्रक्रिया होगी। लेकिन ऐसा होगा नही, बस लड़ाई लगाने की बात है। अमेरिका हो रशिया, या कोई और देश। इत्ता बड़ा चोंगा कोई नही है की इंफॉर्मली (अनौपचारिक रूप से) पर्मानेंट मेम्बरशिप जेब में धरा हो। और चूरन की तरह बांटता फिरे। ●● तो इस 1950 या 1951 में यह "इनफॉर्मल ऑफर" मिलने पर, नेहरू ने आइजनहॉवर से एक लाइन में पूछा- यूएन चार्टर में बदलाव की कितनी सम्भावना है। आइजनहॉवर बोले-फिलहाल कोई संभावना नही। नेहरू हंस दिए। समझ गए कि बकवास हो रही है। दरअसल भारत को आज तक अमेरिका से, या रूस, या खुद UN से फॉर्मली, याने औपचारिक तौर पर स्थायी सदस्य बनने का प्रस्ताव, आज कभी नही मिला है। ●● किसी को भी नही मिला है। हां, अमेरिका जरूर इंडिया, जापान, जर्मनी, साउथ अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, वगैरह को समय समय पर, परमानेंट मेम्बरशिप दिलवाने की चूरन चटाता रहता है। खाली अपना कोई तात्कालिक काम निकालने को, ठगने को, उल्लू बनाने को। ●● ठीक वैसे ही जैसे आपको धन दुगना करने और 50 करोड़ की लॉटरी जीतने के ईमेल और फोन आते हैं। बस 20 हजार जमा करो, करोड़पति बन जाओ। बुद्धिमान लोग ये सब बेवकूफियों में नही फंसते। इस जैसे टाई वाले चूतियों की बात निराली है। ●● तो हिस्ट्री जानिए, प्रोसेस समझिए। अपना भी दिमाग, (अगर हो, तो) लगाइये। बस, इन चमन च्युतियो और भांडकास्टरों के चक्कर मे आकर अपना मानसिक दीवाला न पिटवाइये। 🙏

Manish Singh

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क्या भारत के प्रधानमंत्री, किसी और देश के राष्ट्रपति के अधीनस्थ है? यदि नही, तो इस रिपोर्टिंग का क्या मतलब है? भारत के सुरक्षा सलाहकार, भारत के प्रधानमंत्री की... किसी अन्य देश के नेता के साथ हुई गोपनीय बातचीत का विवरण, थर्ड पार्टी से क्यो साझा कर रहे हैं। ●● वीडियो देखें, जो रूसी समाचार एजेंसी, स्पूतनिक ने जारी किया है। मिमियाते हुए NSA पुतिन के सामने गिड़गिड़ा रहे है- मेरे प्रधानमंत्री ने, जैसा कि फ़ोन पर कहा, वो आपको अपनी यूक्रेन की यात्रा के बारे में एवं प्रेसिडेंट जेलेंस्की से मुलाक़ात के बारे में बताने के लिए उत्सुक थे। वो चाहते थे कि मैं उनकी मुलाक़ात का ब्यौरा आपसे व्यक्तिगत रूप से मिलकर दूँ। प्रेसिडेंट जेलिन्सकी से उनकी मुलाक़ात एक क्लोज फ़ॉर्मेट में हुई। मुलाक़ात में दो नेता मौजूद थे। साथ में उनके दो लोग और थे। और प्रधानमंत्री की तरफ़ से मैं भी मौजूद था। वीडियो यही कट हो जाता है। ●● इसे डिकोड कीजिए। समझ आयेगा कि डेढ़ होशियार, और विदेश नीति को महज फोटोबाजी समझने वाले पीएम ने, यूक्रेन में जेलिन्सकी के गले लगाकर, कंधे पर धौल मारकर, हाथ पकड़कर मसलते हुए जो फोटोबाजी की। उससे पुतिन ने सहजता से नही लिया, और नाराज हैं। जब झाड़ पड़ी, तो पीएम ने फोन करके मान मनव्वल करने की कोशिश की रही होगी। फिर भी जब बात बनी नही, तो विशेष दूत को आपाधापी में भेजा गया है- जो मां कसम खाकर बता रहे है कि भैया, जेलिन्सकी के साथ हमारा कुछ गम्भीर नही हुआ। बस एवें ही यूक्रेन पर्यटन पर चले गए थे। सच्ची मुच्ची, कुछ खास नही हुआ। मैं तो खुद भी था न वहां, मैं गवाह हूँ। ●● यह विदेश में डंका बजने की सचाई है। नाक रगड़ी जा रही है। फॉरेन पॉलिसी का मलीदा बन चुका है। मजाक चल रहा है यहां। देश की सोवर्निटी के घोड़े लगे हैं। भक्त चिल्ला रहे है- "वार रुकवा दी पों-पों" ●● क्या ही चुनता है यह देश? दोषी ये नही, 38% मूर्खो का जमावड़ा है। 😤

Manish Singh

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जंगल मे अशिक्षा थी। जानवरों ने शिक्षा का महत्व समझ लिया, और स्कूल खोल दिया। मिलजुलकर सिलेबस तय हुआ। समानता लायी जाएगी, सबको सब कुछ सिखाया जायेगा। तो सबको सब कुछ सिखाया गया, एग्जाम हुए। रिजल्ट आया। ●● मछली तैरने में फुल मार्क्स, उड़ने दौड़ने में फेल हो गयी। पक्षी उड़ने में पास हुए, मगर तमाम कोचिंग ट्यूशन के बावजूद तैर न सके। कोयल गायन में फर्स्ट क्लास रही, और कुत्ते फेल हो गए। अब कुत्तों में बड़ा असंतोष फैला। वे अगले सत्र में भौकने को सिलेबस में रखने की मांग करने लगे। सबको बताया- भौंकना मौलिक अधिकार है। हमारी स्वतंत्रता है। फंडामेंटल डॉगी राइट है। बिन भौकन सब सून.. क्या अब एक कुत्ता अपने ही जंगल मे भौंक भी नही सकता ?? आंदोलन फैल गया। ●● बड़ा समर्थन मिला। भौकना उत्तम कर्म होता है। न कोई सुर, न ताल, न तुक, न राग, न द्वेष। ना नियम की सीमा हो, न छंद का हो बंधन ... जंगल में दर्जन भर कोयल हैं। उनको जब गाने का स्पेशल राइट मिला, तो क्या यह कोयलों का तुष्टिकरण करण नही था। भला उन्हें भौंकने की जिम्मेदारी क्यो नही दी गई। बताओ, बताओ.. ●● याने ऐसा चौक चौराहों, भजन पूजन के पंडालों में फुसफुसाकर बताया गया। कानाफूसी चहुं ओर फैल गयी। फिर टीआरपी के चक्कर मे टीवी कूदा। मीडिया में बैठे श्वानों की विभिन्न प्रजातियां भी दम खम से अपने स्पीशीज का साथ देने लगे। जो साथ ने थे, उन पर कुत्तों ने हमला करके भगा दिया। अब तो कुत्ता टाइम्स, कुत्ता न्यूज, Doggy Now पर बैठे कुत्तन-कुत्तनियाँ दिन रात भौकने की महिमा का गान करते, और बुलाकर हर जानवर से पूछते की वह आखिर भौकने के खिलाफ क्यूँ है? ●● कई बार, कुत्ते भेड़, बकरी, मछली, मुर्गा, हिरन का भेष बनाकर आते। उन्हें स्वतंत्र विश्लेषक बताकर, खूब भौंकवाया जाता। अथक मेहनत से आखिरकार पूरा जंगल कन्विंस हो गया। कुत्तों की सरकार बन गयी। सभी प्रमुख पदों पर कुत्ते आरूढ़ हुए। मने यूँ समझो कि कुत्ता ही वीसी हुआ, कुत्ता ही प्रिंसिपल, कुत्ता शिक्षक हुआ.. और चौकीदार तो कुत्ता था ही। ●●● इस प्रकार सम्पूर्ण विद्यालय में कुत्तों का वर्चस्व हुआ। अब पहले मौके में सम्विधान संशोधन करके सिलेबस बदल दिया गया। नये सिलेबस में भौकना अनिवार्य तथा एकमात्र विषय था। सभी जानवर अपनी बोली छोड़ भौंक रहे थे। मगर क्या ही खाकर कुत्तों से बेहतर भौकते। ●● अब विद्यालय में भौंकश्री, भौकभूषन, भौकरत्न के पुरस्कार बंटते है। और आश्चर्य की बात की कभी कभी मछली, पक्षी और घोड़े भी इनाम जीत जाते है, या जितवा दिये जाते हैं। इससे कुत्तों की निष्पक्षता पर यकीन बना रहता है। ●● तो सिलेबस बदलने से बड़ा फर्क पड़ता है। हमारे देश मे भी स्कूली दिनों में विज्ञान, गणित, एंटायर पोलिटिकल साइंस की किताब में छुपाकर.. मस्तराम, गुलशन नंदा और वेद प्रकाश शर्मा को पढ़ने वालो ने.. सुना है उन्हें सिलेबस ही बना दिया है। #कुत्तकथा

Manish Singh

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आपसे चार्ली चैप्लिन मिलना चाहते है बापू.. - कौन चार्ली चैप्लिन.. ?? गांधी फिल्में नही देखते थे। तो किसी ने बताया - जोकर है एक!!! दूसरे ने टोका - नही बापू, एक्टर है, बहुत फेमस है... - ठीक है। मैं अभी नही मिलना चाहता... ●● गोलमेज कॉन्फ्रेंस अटैंड करने को बापू लन्दन में थे। तमाम मुद्दे, राजनीतिक सवाल, दिमाग मे उलझ रहे थे। ऊपर से प्रेस वालो, सेलेब्रिटियों, पॉलिटिशियन्स का तांता लगा हुआ था। कोई "मैडम तुसाड म्यूजियम" वाले बुला रहे थे। अब पता नही कि ये मैडम तुसाद कौन है? कोई एक गौहर जान भी है, कहते है कि मशहूर गायिका है। मिलने को आतुर है- एक मुलाकात के लिए 12000 रुपये दान देने की चिट्ठी लिखी है। बस, वो अपना गाना सुनाना चाहती है गांधी को.. औऱ गांधी चाहते थे कि समय निकालकर लंकाशायर जायें। वहां के मिल मजदूरों से मिलें। चार्ली वाली बात आई गयी हो गई। ●● किंग्सले हॉल में उनके कार्यक्रम के आयोजक विलियम रिन्ड ने पूछा- आप चार्ली चैपलिन को मिलने समय नही दे रहे ? गांधी ने अपनी असमर्थता जताई। "आपको उससे मिलना चाहिए। वो दुनिया का सबसे मशहूर बन्दा है, ऑफकोर्स आपको छोड़कर.. रिन्ड हंसे। और फिर गम्भीरता से कहा- वो आपके उद्देश्य से सहानुभूति रखता है।उसने गरीबी देखी है, बड़े क्रांतिकारी विचार रखता है। उससे मिलना, आपके कॉज में सहायक होगा.. गांधी ने सर हिलाया ठीक है फिर.. ●● चार्ल्स स्पेन्सर चैपलिन, नाइट कमांडर ऑफ द मोस्ट एक्सीलेंट ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश एम्पायर, उर्फ चार्ली चैप्लिन (KBE)... एपोइंटमेंट लेकर, अपने पैरों चलकर उस फकीर से, जिसे 1982 में पिक्चर रिलीज होने के पहले कोई जानता नही था, मिलने आये। अपनी ऑटोबायोग्राफी में वे याद करते हैं, ईस्ट इंडिया डॉक रोड में, स्लम एरिया का वह घर, जहां गांधी ठहरे थे। और गांधी से मिलने के लिए सीढियां चढ़ते समय अपनी नर्वसनेस... वे गांधी से मिलकर क्या कहेंगे?? एक्टर थे, तो मन ही मन अपनी ओपनिंग लाइनें दोहरा रहे थे- "मि गांधी, मैं आपके देश और आपके लोगो की आजादी का समर्थक हूँ" ●● मुलाकात अच्छी हुई। ऑटोबायोग्राफी में चार्ली लिखते है- चरखे को देखकर मैनें पूछ ही लिया, मि. गांधी, मैं आपके सारे विचारों से सहमत हूँ, लेकिन आप मशीनों का विरोध क्यो करते हैं? गांधी बोले- चरखा चलाने का मतलब, सारी तकनीकी का विरोध नही। ये उससे जुड़े आर्थिक और राजनीतिक तंत्र का विरोध है। शोषण की व्यवस्था का विरोध है। गरीबो से समेटकर, चंद जेबें भरने का विरोध है। इंगलैंड ने भारत के सारे उद्योग नष्ट कर, यहां मशीनों से प्रोडक्शन शुरू किया है। ताकि यहां माल बनाकर भारतीयों को बेच सकें। वहां का धन, यहां लाया जा सके। हम मशीन से बने कपड़े का नही, उस शोषण के फ़लसफ़े का विरोध करते हैं। इसलिए चरखे से भारतीय खुद कपड़ा बनाये, खुद का उत्पाद पहने, चरखा चलाकर इसका संकेत देता हूँ। ●● बातचीत के बाद दोनो ने साथ साथ प्रार्थना की। गांधी ने अपने तरीके से, चार्ली ने अपने तरीके से.. गांधी का भजन जरा लम्बा चला, तो चार्ली भी सुनते रहे। फिर दोनो ने भोजन किया। ऑटोबायोग्राफी में चार्ली ने "मोस्ट ब्रिलिएंट मैन ही एवर मेट" और "वन ऑफ मोस्ट गॉड लाइक एज वेल" लिखकर गांधी से मुलाकात के अध्याय को समाप्त किया। ●● प्रेस और मीडिया से, 45- बेक्टन रोड के दोनो फ्लोर पैक थे। हजारों लंदनवासी , सड़क पर इकट्ठे थे। गांधी और चार्ली की मुलाकात का गवाह बनने के लिए.. वो 2 सितंबर 1931 की शाम थी। और 2024 की भी एक शाम है, जब पूड़ीपैक और 500 रुपये देकर, टेक्टरों से भीड़ इकट्ठा करवाने वाला नशेड़ी जोकर, गांधी की गुमनामी पर दया बरसा रहा है। ●● उसके जैसे ही एक सनकी, आत्ममुग्ध, बौने, अवतारी तानाशाह का मजाक उड़ाते हुए, चार्ली ने अपनी सर्वकालिक महान क्लासिक " द ग्रेट डिक्टेटर" बनाई। और उसके अंत में अपना सन्देश दिया। चैप्लिन शांति का, अहिंसा का प्रेम, साहचर्य, की बात करते हैं। जब वे गरिमा औऱ मानवता को लालच, नफरत, अहंकार और मशीनो से ज्यादा जरूरी बताते है.. तो उनकी बात में गांधी से मुलाकात की छाप दिखती है। और चैप्लिन की जुबान से जब गांधी बोलते दिखाई देते हैं, तब आपका, मेरा, और हिंदुस्तान का सीना.. गर्व से दोगुना हो जाता है। ❤️🙏

Manish Singh

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कानूनों से खतरनाक खिलवाड़.. अजीत भारती नाम के भक्त को राहुल गांधी के खिलाफ अफवाह फैलाने के लिए कर्नाटक में केस हुआ। यह कांग्रेस सरकार ने किया है। इसके पहले श्याम मीरा सिंह पर असम में केस हुआ था। यह भाजपा सरकार ने किया। अभी लेखक अरुंधति रॉय पर 12-14 साल पहले के किसी बयान पर UAPA लगाने की बात चल रही है। PMLA कानून तो किसी से कुछ भी बयान लेकर, बड़े बड़े लोगो को जेल डालने के कुख्यात हो ही चुका है। पर इन सबका बाप, भारतीय न्याय संहिता, 15 दिन में लागू होने को है। जिसके कण कण में UAPA, TADA, PMLA रचा बसा है। ●● न्याय संहिता में पुलिस को इतने अधिकार है, की जब जिसे चाहे, मिनटों में फ्रेम करके गिरफ्तार कर सकती है। गिरफ्तारी आयरन क्लैड है, और जमानत को, यदि पुलिस न चाहे, तो एकदम अलभ्य कर दिया है। याने कोर्ट भी, पुलिस के सामने अशक्त है। ●● आजाद समाज का बेसिक फलसफा, राइट टू फ्रीडम है। याने पुराने जमाने के राजा की तरह सरकार जिसे मन आये, काल कोठरी में बन्द नही करवा सकती। ऐसा करने का उचित कारण हो, और वह कानून में डिफाइन हो। फिर कानून, अभियुक्त को बचाव का पूरा मौका दे। 100 गुनहगार छूट जाए, एक निर्दोष को सजा नही होनी चाहिए। जमानत नॉर्म होना चाहिए, जेल एक्सेप्शन। अपराध, क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम को साबित करना है, न कि आरोपी को अपनी निर्दोषता साबित करनी है। जब तक अपराध, बियॉन्ड रीजनेबल डाउट, सिद्ध न हो, सजा नही होनी चाहिए। ●● लेकिन मौजूदा दौर में, निचली अदालतों ने बेल देना लगभग बन्द कर दिया है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट "बेल पर" फैसले दे रही हैं। इंतजार में हवालात, या पुलिस कस्टडी में 50-60 दिन गुजारने वाले शख्स को मिली जमानत भी बेकार है।बिना दोषसिद्धि के सजा है। नई न्याय संहिता, इन एबरेशन को नार्म बनाती है। इसमे आतंकवाद की परिभाषा में जोड़े गए प्रावधान- सड़क पर एक मामूली प्रदर्शन, वहां लगाए नारे, किसी धरने को भी आतंकवाद के दायरे में रखने की सुविधा देते हैं। वो पुलिस को यह अधिकार देते हैं कि "उचित न समझे" तो केस की सूचना पर रिपोर्ट दर्ज न करे। याने न्याय के लिए आप थाने की आशा छोड़ दीजिए। हां, पहले भी यह चोरी-छुपे होता था, पर अब अधिकार में है। आगे, पुलिस को गिरफ्तारी के बाद 24 घण्टे में कोर्ट में पेश करने की जरूरत नहीं। डॉक्टरी मुलाहिजे की जरूरत नही। 7 दिन बाद वह एसडीएम से रिमांड बढ़वा सकता है। असल कोर्ट तो 14 दिन में पेश करे। बिना चार्जशीट के 6 माह तक हवालात एक्सटेंन की जा सकती है। ●● दमन का खजाना है यह अन्याय संहिता। देशभक्त खुश होंगे। अब आएगा मजा। चमचों को जमकर पकड़ा जाएगा, उल्टा लटकाकर पीटेंगे। गद्दारों की खाल में भूसा भरा जायेगा। यस, श्योर। लेकिन याद रखें। ये पावर्स पुलिस को है। याने उन जगहों की पुलिस को भी जहां भाजपा की सरकार नही है। और आज की डेट में आधे देश मे नही है। इधर वाले, उधर वालो की जिंदगियां तबाह करेंगे, उधर वाले इधर की। सुरक्षित कोई नही। ●● ये कानून, क़ानून व्यवस्था की बेहतरी के लिए नही बने। राजनीतिक वजहो से बने हैं। विपक्ष की आवाज बन्द करने, और आम नागरिक को टेरराइज करने को बने हैं। बात व्यवस्था की है, तो कानून व्यवस्था और शांति के लिए, अंग्रेजो की बनाई व्यवस्था से बढ़िया कुछ नही। क्योकि वह हमारे बीच, 150 साल पुरानी हो चुकी। वह बार बार माँज कर, चमका कर, कतरब्योंत और सुधार के लंबे कालक्रम से गुजर चुकी है। अंग्रेजो की नही , यह हमारी व्यवस्था हो चुकी है। आजाद हिंदुस्तान की 15 संसदों, सरकारों, और हजारों जजों ने लाखों मामलों के फैसलों से, हर सिचुएशन के लिए एक गाइडलाइन बना दी है। इस कानून को सब लोग समझते हैं, स्वीकार करते हों, फॉलो करते हैं। वकील, पुलिस, अदालतें, समझती हैं। ●● तो IPC हमारे शरीर मे फिट, और शरीर कानून में फिट हो चुका है। टेलर फिट। अब नए चोले को फिर उतना ही समय लगेगा, परफेक्ट, टेलर फिट होने में। यदि इसका आधा ही समय लगा, या चलो, कि चौथाई या दसवां हिस्सा ही लगा परफेक्ट होने, सेट होने में- तो भी.. पहले 20 साल तो आम लोगो, वकीलों, कोर्ट्स को इससे जूझते, रास्ते और राहतें खोजते लग गए न.. ●● और यह बड़ा वीभत्स दौर होने वाला है। राजनीतिक कटुता, और शुचिता के अभाव में कानूनन बेलगाम पुलिस, किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के कन्ट्रोल में नही रहेगी, लिख लीजिए। वह दोनो तरफ को दबाएगी। ताक कर रखेगी, इसकी सरकार में उसको, उसकी सरकार में इसको निपटायेगी। यह पुलिस राज, व्यवस्था में अंसतोष और विद्रोह को जन्म देगा। और सरकारों को इसका नजला भुगतना पड़ेगा। और फाइनली लोकतन्त्र को गहरा डेंट लगेगा। ●● कानूनों से खिलवाड़ बन्द हो। न्याय संहिता का इमिडीएट रिवीजन होना चाहिए।

Manish Singh

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