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पूर्णिमा

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जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

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प्रातः कालीन जम्मू कटरा से मां वैष्णो देवी के पबित्र गुफा की अद्भुत अलौकिक दर्श।। जय माता दी 🙏☘️

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प्रातः कालीन जम्मू कटरा से मां वैष्णो देवी के पबित्र गुफा की अद्भुत अलौकिक दर्श।। जय माता दी 🙏☘️

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स्वर्ग से सुंदर माँ का द्वार ।। जय माँ वैष्णो देवी🥀

स्वर्ग से सुंदर माँ का द्वार ।। जय माँ वैष्णो देवी🥀

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पूर्णिमा

175,808 Aufrufe • vor 2 Jahren

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“रामायण” क्या है? अगर कभी पढ़ो और समझो तो आंसुओ पे काबू रखना....... रामायण का एक छोटा सा वृतांत है, उसी से शायद कुछ समझा सकूँ... 😊 एक रात की बात हैं, माता कौशल्या जी को सोते में अपने महल की छत पर किसी के चलने की आहट सुनाई दी। नींद खुल गई, पूछा कौन हैं ? मालूम पड़ा श्रुतकीर्ति जी (सबसे छोटी बहु, शत्रुघ्न जी की पत्नी)हैं । माता कौशल्या जी ने उन्हें नीचे बुलाया | श्रुतकीर्ति जी आईं, चरणों में प्रणाम कर खड़ी रह गईं माता कौशिल्या जी ने पूछा, श्रुति ! इतनी रात को अकेली छत पर क्या कर रही हो बेटी ? क्या नींद नहीं आ रही ? शत्रुघ्न कहाँ है ? श्रुतिकीर्ति की आँखें भर आईं, माँ की छाती से चिपटी, गोद में सिमट गईं, बोलीं, माँ उन्हें तो देखे हुए तेरह वर्ष हो गए । उफ ! कौशल्या जी का ह्रदय काँप कर झटपटा गया । तुरंत आवाज लगाई, सेवक दौड़े आए । आधी रात ही पालकी तैयार हुई, आज शत्रुघ्न जी की खोज होगी, माँ चली । आपको मालूम है शत्रुघ्न जी कहाँ मिले ? अयोध्या जी के जिस दरवाजे के बाहर भरत जी नंदिग्राम में तपस्वी होकर रहते हैं, उसी दरवाजे के भीतर एक पत्थर की शिला हैं, उसी शिला पर, अपनी बाँह का तकिया बनाकर लेटे मिले !! माँ सिराहने बैठ गईं, बालों में हाथ फिराया तो शत्रुघ्न जी नेआँखें खोलीं, माँ ! उठे, चरणों में गिरे, माँ ! आपने क्यों कष्ट किया ? मुझे बुलवा लिया होता । माँ ने कहा, शत्रुघ्न ! यहाँ क्यों ?" शत्रुघ्न जी की रुलाई फूट पड़ी, बोले- माँ ! भैया राम जी पिताजी की आज्ञा से वन चले गए, भैया लक्ष्मण जी उनके पीछे चले गए, भैया भरत जी भी नंदिग्राम में हैं, क्या ये महल, ये रथ, ये राजसी वस्त्र, विधाता ने मेरे ही लिए बनाए हैं ? माता कौशल्या जी निरुत्तर रह गईं । देखो क्या है ये रामकथा... यह भोग की नहीं....त्याग की कथा हैं..!! यहाँ त्याग की ही प्रतियोगिता चल रही हैं और सभी प्रथम हैं, कोई पीछे नहीं रहा... चारो भाइयों का प्रेम और त्याग एक दूसरे के प्रति अद्भुत-अभिनव और अलौकिक हैं । "रामायण" जीवन जीने की सबसे उत्तम शिक्षा देती हैं । भगवान राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ तो उनकी पत्नी सीता माईया ने भी सहर्ष वनवास स्वीकार कर लिया..!! परन्तु बचपन से ही बड़े भाई की सेवा मे रहने वाले लक्ष्मण जी कैसे राम जी से दूर हो जाते! माता सुमित्रा से तो उन्होंने आज्ञा ले ली थी, वन जाने की.. परन्तु जब पत्नी “उर्मिला” के कक्ष की ओर बढ़ रहे थे तो सोच रहे थे कि माँ ने तो आज्ञा दे दी, परन्तु उर्मिला को कैसे समझाऊंगा.?? क्या बोलूँगा उनसे.? यहीं सोच विचार करके लक्ष्मण जी जैसे ही अपने कक्ष में पहुंचे तो देखा कि उर्मिला जी आरती का थाल लेके खड़ी थीं और बोलीं- "आप मेरी चिंता छोड़ प्रभु श्रीराम की सेवा में वन को जाओ...मैं आपको नहीं रोकूँगीं। मेरे कारण आपकी सेवा में कोई बाधा न आये, इसलिये साथ जाने की जिद्द भी नहीं करूंगी।" लक्ष्मण जी को कहने में संकोच हो रहा था.!! परन्तु उनके कुछ कहने से पहले ही उर्मिला जी ने उन्हें संकोच से बाहर निकाल दिया..!! वास्तव में यहीं पत्नी का धर्म है..पति संकोच में पड़े, उससे पहले ही पत्नी उसके मन की बात जानकर उसे संकोच से बाहर कर दे.!! लक्ष्मण जी चले गये परन्तु 14 वर्ष तक उर्मिला ने एक तपस्विनी की भांति कठोर तप किया.!! वन में “प्रभु श्री राम माता सीता” की सेवा में लक्ष्मण जी कभी सोये नहीं , परन्तु उर्मिला ने भी अपने महलों के द्वार कभी बंद नहीं किये और सारी रात जाग जागकर उस दीपक की लौ को बुझने नहीं दिया.!! मेघनाथ से युद्ध करते हुए जब लक्ष्मण जी को “शक्ति” लग जाती है और हनुमान जी उनके लिये संजीवनी का पर्वत लेके लौट रहे होते हैं, तो बीच में जब हनुमान जी अयोध्या के ऊपर से गुजर रहे थे तो भरत जी उन्हें राक्षस समझकर बाण मारते हैं और हनुमान जी गिर जाते हैं.!! तब हनुमान जी सारा वृत्तांत सुनाते हैं कि, सीता जी को रावण हर ले गया, लक्ष्मण जी युद्ध में मूर्छित हो गए हैं। यह सुनते ही कौशल्या जी कहती हैं कि राम को कहना कि “लक्ष्मण” के बिना अयोध्या में पैर भी मत रखना। राम वन में ही रहे.!! माता “सुमित्रा” कहती हैं कि राम से कहना कि कोई बात नहीं..अभी शत्रुघ्न है.!! मैं उसे भेज दूंगी..मेरे दोनों पुत्र “राम सेवा” के लिये ही तो जन्मे हैं.!! माताओं का प्रेम देखकर हनुमान जी की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी। परन्तु जब उन्होंने उर्मिला जी को देखा तो सोचने लगे कि, यह क्यों एकदम शांत और प्रसन्न खड़ी हैं? क्या इन्हें अपनी पति के प्राणों की कोई चिंता नहीं? हनुमान जी पूछते हैं- देवी! आपकी प्रसन्नता का कारण क्या है? आपके पति के प्राण संकट में हैं...सूर्य उदित होते ही सूर्य कुल का दीपक बुझ जायेगा।

पूर्णिमा

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अपराजिता के पौधे का महत्व जान कर आप हैरान रह जाएंगे... अपराजिता के फूल को इसकी ख़ूबसूरती के लिए जाना जाता है। इस नीले रंग के फूल का बहुत ही ज़्यादा धार्मिक और पौराणिक महत्व है। ऐसा माना जाता है कि यह फूल शनिदेव और भगवान विष्णु को दोनों को ही बेहद पसंद है। इसलिए, इस फूल का महत्व और भी ज़्यादा बढ़ जाता है। इतना ही नहीं, अपराजिता के फूल का ज्योतिष में भी बहुत ही उपयोगिता दर्शायी गई है। इस फूल के जरिए नारायण जी, माता लक्ष्मी और शनिदेव महराज की कृपा परिवार पर बनी रहती है इसके लिए तमाम ज्योतिषीय उपाय किए जाते हैं। इस फूल के ज्योतिष प्रभाव से धन से जुड़ा संकट समाप्त होता है, परिवार में संपन्नता आती है। अपराजिता पौधे को बटरफ्लाई मटर के नाम से भी जाना जाता है। इस पौधे के औषधीय गुण ऐसे हैं कि यह कई बीमारियों को ठीक कर सकता है। अपराजिता का अर्थ इसके नाम में ही है कि इसे किसी भी बीमारी से नहीं हराया जा सकता है। यह एक पवित्र पौधा माना जाता है। 🏵️अपराजिता फूल के औषधीय गुण ... अपराजिता एक औषधीय पौधा होता है जिसमें कई तरह के एंटी-इंफ्लेमेटरी तत्व पाए जाते हैं। यह एंटीऑक्सिडेंट की मात्रा को बढ़ा देते हैं, जोकि इंफ्लेमेशन को कम करके इंसान को कई तरह के क्रोनिक डिजीज से बचाने में मदद करता है। साथ ही साथ अपराजिता के अर्क से चाय बनाई जाती है, जिसे पीने से दर्द और सूजन की समस्या दूर हो जाती है। इसलिए अपराजिता के फूल का महत्व और भी ज़्यादा बढ़ जाता है। 🏵️अपराजिता फूल के ज्योतिष गुण... अपराजिता फूल का वास्तु शास्त्र और ज्योतिष विद्या में भी कई तरह का महत्व है। वास्तु शास्त्र के मुताबिक़ इस पौधे को जो लोग अपने घर में लगाते हैं, उनको धन संबंधित समस्याओं से छुटकारा मिलता है। अपराजिता धन को आकर्षित करती है, जिससे इंसान के जीवन में समृद्धि आती है। इस पौधे को लगाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, इससे व्यक्ति को जीवन में सफलता प्राप्त होती है। ऐसा सुझाव दिया जाता है कि यह पौधा पूर्व, उत्तर या फिर उत्तर-पूर्व दिशा में लगाना चाहिए। 🏵️अपराजिता के बीज का महत्व ... अपराजिता के फूल के साथ साथ बीज का भी बहुत ही विशिष्ट महत्व होता है। यह भी अपने औषधीय गुणों की वजह से विशेष महत्व का माना जाता है। अपराजिता का बीज सिर दर्द को दूर करने में मददगार पाया गया है। नीले और सफ़ेद दोनों ही प्रकार की अपराजिता को बुद्धि के विकास, वात, पित्त, कफ को दूर करने के लिए भी जाना जाता है। अपराजिता के इस्तेमाल से कई गंभीर बीमारियों का उपचार किया जा सकता है। 🏵️अपराजिता का धार्मिक महत्व ... अपराजिता के फूल को धार्मिक रूप से भी बहुत ही ज़्यादा उपयोगी माना जाता है। दिन के हिसाब से इसका अलग अलग महत्व बताया गया है। ऐसा कहा जाता है कि गुरुवार भगवान विष्णु और शुक्रवार माता लक्ष्मी को समर्पित किया गया है। यदि किसी कार्य में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा चाहिए तो गुरुवार और शुक्रवार के दिन अपराजिता का पौधा लगाना चाहिये। इससे आपके घर में लक्ष्मी का आगमन होता है, विष्णु जी की कृपा भी बनी रहती है। अपराजिता के पुष्प चढ़ाने से भगवान शिव भी प्रसन्न होते हैं।

पूर्णिमा

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