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क्या बोलती है पब्लिक बता दीजिए मत क्या यहां एक गार्ड की बिना गलती के महिला ने लात मार दी उसी गुस्सा में गार्ड जबरदस्त वापसी की एक बार में दिमाग सही कर दिया क्या सही क्या गार्ड ने....... open news

क्या बोलती है पब्लिक बता दीजिए मत क्या यहां एक गार्ड की बिना गलती के महिला ने लात मार दी उसी गुस्सा में गार्ड जबरदस्त वापसी की एक बार में दिमाग सही कर दिया क्या सही क्या गार्ड ने....... open news

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मां बाप की मेहनत का पसीना स्कूल से निकलकर होटल में बहाया जा रहा शर्म नाम खत्म हो चुका इनके अंदर आज के समय में कुछ बच्चों के सामने पढ़ाई से ज्यादा सोशल मीडिया, रील और दिखावे की दुनिया हावी होती जा रही है। स्कूल की ड्रेस पहनकर घर से पढ़ने के नाम पर निकलना और फिर दोस्तों के साथ घूमना-फिरना या रील बनाना यह देखकर सवाल उठता है कि आखिर हम अपने बच्चों को किस दिशा में जाते हुए देख रहे हैं? एक तरफ माता-पिता दिन-रात मेहनत करते हैं। कभी धूप में पसीना बहाते हैं, कभी मजदूरी करते हैं, कभी अपनी जरूरतें रोककर बच्चों की फीस, किताबों और पढ़ाई का खर्च उठाते हैं। कई मां-बाप की हथेलियां मेहनत करते-करते कठोर हो जाती हैं, शरीर थक जाता है, लेकिन उनके चेहरे पर एक ही उम्मीद रहती है कि हमारा बच्चा पढ़-लिखकर एक दिन अपने पैरों पर खड़ा होगा। लेकिन जब वही बच्चा पढ़ाई के नाम पर घर से निकलकर अपना समय केवल घूमने रील बनाने और दिखावे में लगाने लगे, तो सबसे ज्यादा चोट माता-पिता के विश्वास को पहुंचती है। यह बात हर बच्चे पर लागू नहीं होती। आज भी लाखों बच्चे ईमानदारी से मेहनत कर रहे हैं, अपने माता-पिता के सपनों को पूरा करने के लिए दिन-रात पढ़ रहे हैं। लेकिन जो बच्चे पढ़ाई और जिम्मेदारी से भटक रहे हैं, उन्हें समझना चाहिए कि जिंदगी केवल कुछ मिनट की वायरल रील या सोशल मीडिया की तारीफ का नाम नहीं है। दोस्ती करना गलत नहीं है, किसी से बात करना भी गलत नहीं है, लेकिन उम्र, जगह और जिम्मेदारी को समझना जरूरी है। स्कूल जाने की उम्र में पढ़ाई और अपने भविष्य को प्राथमिकता देना सबसे जरूरी है। किसी भी बच्चे को केवल इसलिए बुरा या चरित्रहीन कहना भी सही नहीं है कि वह किसी दोस्त के साथ दिखाई दे रहा है मगर अगर कोई बच्चा सचमुच पढ़ाई के बहाने घरवालों से झूठ बोलकर अपना समय गलत कामों में बर्बाद कर रहा है, तो उसे रोकना और समझाना परिवार तथा स्कूल दोनों की जिम्मेदारी है। माता-पिता अपने बच्चों से सिर्फ अच्छे नंबर की उम्मीद नहीं करते, वे चाहते हैं कि उनका बच्चा अच्छा इंसान बने, सही-गलत में फर्क समझे और उनके संघर्ष की कीमत जाने। इसलिए बच्चों से बस इतनी अपील है मां-बाप की मेहनत को कभी छोटा मत समझना। उनके पास शायद महंगे कपड़े या बड़ी गाड़ी न हो, लेकिन तुम्हारे भविष्य के लिए उन्होंने अपनी जिंदगी के अनगिनत दिन कुर्बान किए हैं। तुम्हारे हाथ में मोबाइल देने से पहले उन्होंने शायद अपनी जरूरत की कोई चीज नहीं खरीदी होगी। रील कुछ सेकंड की होती है, वायरल होने की खुशी कुछ समय की होती है, लेकिन शिक्षा और अच्छा भविष्य पूरी जिंदगी साथ रहते हैं। और माता-पिता से भी यही कहना है कि बच्चों को केवल डांटने के बजाय उनसे खुलकर बात करें, उनकी दोस्ती, सोशल मीडिया और उनकी परेशानियों को समझें। डर के माहौल से ज्यादा जरूरी है विश्वास और सही मार्गदर्शन। बच्चों को रोकना नहीं, उन्हें सही दिशा दिखाना जरूरी है। क्योंकि मां-बाप की मेहनत का सबसे खूबसूरत परिणाम यह नहीं कि बच्चा कितना पैसा कमाता है, बल्कि यह है कि वह बड़ा होकर कितना जिम्मेदार, संस्कारी और अच्छा इंसान बनता है।

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मां बाप की मेहनत का पसीना स्कूल से निकलकर होटल में बहाया जा रहा शर्म नाम खत्म हो चुका इनके अंदर आज के समय में कुछ बच्चों के सामने पढ़ाई से ज्यादा सोशल मीडिया, रील और दिखावे की दुनिया हावी होती जा रही है। स्कूल की ड्रेस पहनकर घर से पढ़ने के नाम पर निकलना और फिर दोस्तों के साथ घूमना-फिरना या रील बनाना यह देखकर सवाल उठता है कि आखिर हम अपने बच्चों को किस दिशा में जाते हुए देख रहे हैं? एक तरफ माता-पिता दिन-रात मेहनत करते हैं। कभी धूप में पसीना बहाते हैं, कभी मजदूरी करते हैं, कभी अपनी जरूरतें रोककर बच्चों की फीस, किताबों और पढ़ाई का खर्च उठाते हैं। कई मां-बाप की हथेलियां मेहनत करते-करते कठोर हो जाती हैं, शरीर थक जाता है, लेकिन उनके चेहरे पर एक ही उम्मीद रहती है कि हमारा बच्चा पढ़-लिखकर एक दिन अपने पैरों पर खड़ा होगा। लेकिन जब वही बच्चा पढ़ाई के नाम पर घर से निकलकर अपना समय केवल घूमने रील बनाने और दिखावे में लगाने लगे, तो सबसे ज्यादा चोट माता-पिता के विश्वास को पहुंचती है। यह बात हर बच्चे पर लागू नहीं होती। आज भी लाखों बच्चे ईमानदारी से मेहनत कर रहे हैं, अपने माता-पिता के सपनों को पूरा करने के लिए दिन-रात पढ़ रहे हैं। लेकिन जो बच्चे पढ़ाई और जिम्मेदारी से भटक रहे हैं, उन्हें समझना चाहिए कि जिंदगी केवल कुछ मिनट की वायरल रील या सोशल मीडिया की तारीफ का नाम नहीं है। दोस्ती करना गलत नहीं है, किसी से बात करना भी गलत नहीं है, लेकिन उम्र, जगह और जिम्मेदारी को समझना जरूरी है। स्कूल जाने की उम्र में पढ़ाई और अपने भविष्य को प्राथमिकता देना सबसे जरूरी है। किसी भी बच्चे को केवल इसलिए बुरा या चरित्रहीन कहना भी सही नहीं है कि वह किसी दोस्त के साथ दिखाई दे रहा है मगर अगर कोई बच्चा सचमुच पढ़ाई के बहाने घरवालों से झूठ बोलकर अपना समय गलत कामों में बर्बाद कर रहा है, तो उसे रोकना और समझाना परिवार तथा स्कूल दोनों की जिम्मेदारी है। माता-पिता अपने बच्चों से सिर्फ अच्छे नंबर की उम्मीद नहीं करते, वे चाहते हैं कि उनका बच्चा अच्छा इंसान बने, सही-गलत में फर्क समझे और उनके संघर्ष की कीमत जाने। इसलिए बच्चों से बस इतनी अपील है मां-बाप की मेहनत को कभी छोटा मत समझना। उनके पास शायद महंगे कपड़े या बड़ी गाड़ी न हो, लेकिन तुम्हारे भविष्य के लिए उन्होंने अपनी जिंदगी के अनगिनत दिन कुर्बान किए हैं। तुम्हारे हाथ में मोबाइल देने से पहले उन्होंने शायद अपनी जरूरत की कोई चीज नहीं खरीदी होगी। रील कुछ सेकंड की होती है, वायरल होने की खुशी कुछ समय की होती है, लेकिन शिक्षा और अच्छा भविष्य पूरी जिंदगी साथ रहते हैं। और माता-पिता से भी यही कहना है कि बच्चों को केवल डांटने के बजाय उनसे खुलकर बात करें, उनकी दोस्ती, सोशल मीडिया और उनकी परेशानियों को समझें। डर के माहौल से ज्यादा जरूरी है विश्वास और सही मार्गदर्शन। बच्चों को रोकना नहीं, उन्हें सही दिशा दिखाना जरूरी है। क्योंकि मां-बाप की मेहनत का सबसे खूबसूरत परिणाम यह नहीं कि बच्चा कितना पैसा कमाता है, बल्कि यह है कि वह बड़ा होकर कितना जिम्मेदार, संस्कारी और अच्छा इंसान बनता है।

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इस वीडियो में देखकर एक सवाल जरूर उठता है सावर्जिनक जगहों पर सम्मान और अधिकारों की सीमा आखिर कहां तक है।। अगर कोई पुरुष किसी महिला की सीट पर ऐसा वार्ताव करता तो शायद पुरुष ही उसे पीटने लगते लेकिन ये महिलाओं को देखिए इनके अंदर बिल्कुल दया भाव की कोई जगह नहीं है एक गुंडे की तरह वार्ताव करती दो महिलाएं एक बालक से जहां बैठने की जगह नहीं लेकिन जबरदस्ती उसको हटाने लगती देखते ही देखते दोनों महिलाएं उस लड़के को मारने लगती और सीट से नीचे गिरा देती यही समान भाव है क्या जहां महिलाओं के उनके इज्जत मर्यादा की बात की जाती है वही दूसरी तरफ महिलाएं एक सीमा को लांघ रही हैं सोचिये इनके पास इतना पावर कहाँ से आता

Shivam Samajvadi

255,196 Aufrufe • vor 1 Monat

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आइए, आपको दिल्ली की एक ऐसी घटना बताते हैं जो हमें सिर्फ ताकत नहीं, बल्कि इंसानियत और संस्कार की ताकत का मतलब समझाती है। भाई साहब अपने आपको ताकतवर समझ रहे थे 2 मिनट में रिक्शा वाले ने इनको सुधार दिया वीडियो में दिखाई देता है कि एक गरीब रिक्शावाला एक व्यक्ति को अपनी मेहनत से उसकी मंजिल तक पहुंचाता है। जब वह अपनी मेहनत का किराया मांगता है तो बात कहासुनी तक पहुंच जाती है और देखते ही देखते मामला हाथापाई में बदल जाता है। शायद सामने वाले को अपनी शारीरिक ताकत पर बहुत भरोसा था। शरीर बनाया जा सकता है, मांसपेशियां मजबूत की जा सकती हैं, लेकिन असली ताकत इंसान के आचरण, व्यवहार और संस्कारों में होती है। जिस रिक्शावाले को कमजोर समझा गया, वह भी आखिर मेहनत करने वाला इंसान है। दिन-रात सड़कों पर पसीना बहाकर अपना और अपने परिवार का पेट पालता है। उसकी कमाई भले कम हो, लेकिन वह अपनी मेहनत की कमाई से जीता है और उसी मेहनत का हक मांगता है। इस घटना से एक बात जरूर सीखनी चाहिए पैसा आपको बड़ा बना सकता है लेकिन सम्मान आपको आपके व्यवहार से मिलता है। गरीबी इंसान को परिस्थितियों से मजबूर कर सकती है, लेकिन उसकी इज्जत नहीं छीन सकती। गरीब आदमी भी सम्मान का हकदार है। उसके साथ अच्छा व्यवहार करना कोई एहसान नहीं, बल्कि इंसान होने की पहचान है। इसलिए चाहे आप जिंदगी में कितने भी बड़े और ताकतवर क्यों न बन जाएं, अपने से कमजोर या गरीब समझे जाने वाले व्यक्ति का अपमान मत कीजिए। क्योंकि शरीर की ताकत कुछ मिनटों की होती है, लेकिन अच्छे आचरण की पहचान जिंदगी भर रहती है। मेरी नजर में इस वीडियो की सबसे बड़ी सीख यही है गरीब की मजबूरी को उसकी कमजोरी मत समझिए। वह भी मेहनत करता है, सपने देखता है और सम्मान के साथ जीने का पूरा अधिकार रखता है। आप इस घटना को देखकर क्या सीखते हैं?

Shivam Samajvadi

214,089 Aufrufe • vor 1 Monat

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आजकल बाबा भी लॉन्च हो रहे हैं एक से बढ़कर एक कहीं झाड़-फूंक वाला बाबा, कहीं पानी पिलाने वाला, कहीं कंबल बाँटने वाला और कहीं तरह-तरह के ढोंग-ढकोसलों के जरिए लोगों की आस्था का फायदा उठाने वाले बाबा। अब एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसमें एक बाबा लकड़ी के सहारे कथित झाड़-फूंक करता दिखाई दे रहा है और महिलाओं के साथ आपत्तिजनक तरीके से व्यवहार करने के आरोपों को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। आखिर समाज हम किस दिशा में ले जा रहे हैं? क्या ऐसे ढोंग और अंधविश्वास से देश की उन्नति होगी? देश की तरक्की चमत्कारों और अंधविश्वास से नहीं, बल्कि शिक्षा, वैज्ञानिक सोच, तर्क और संविधान में विश्वास से होगी। किसी भी व्यक्ति को सिर्फ बाबा या साधु होने के नाम पर कानून और मर्यादा से ऊपर नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में वीडियो देखकर फैसला सुनाने के बजाय पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। अगर आरोप सही पाए जाते हैं तो दोषी के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। विडंबना यह है कि कुछ लोग आंख मूंदकर हर बाबा को चमत्कारी मान लेते हैं। जरूरत है कि हम आस्था का सम्मान करें, लेकिन अंधविश्वास को बढ़ावा न दें। सवाल बाबाओं की संख्या का नहीं, हमारी वैज्ञानिक सोच का है। देश तभी आगे बढ़ेगा, जब हम चमत्कार नहीं तर्क और विज्ञान पर भरोसा करेंगे।

Shivam Samajvadi

33,852 Aufrufe • vor 22 Tagen

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गंगाराम: एक मगरमच्छ जिसने इंसानों को प्रेम, विश्वास और सह-अस्तित्व का अर्थ सिखाया अपने अंतिम समय में हर उस इंसान को रुलाया जो जीव जंतु से डरते थे😭 कहते हैं कि प्रेम की भाषा शब्दों की नहीं, बल्कि विश्वास की होती है। यह कहानी उसी विश्वास की है, जिसने इंसान और एक मगरमच्छ के बीच ऐसा रिश्ता बना दिया कि उसकी विदाई पर पूरा गाँव रो पड़ा। यह सच्ची घटना छत्तीसगढ़ के एक गाँव की है, जहाँ एक तालाब में रहने वाले मगरमच्छ को गाँव वालों ने प्यार से "गंगाराम" नाम दिया था। बताया जाता है कि गंगाराम ने लगभग 193 वर्ष तक जीवन जिया। इतने लंबे जीवन में उसने कभी किसी इंसान, पशु या पक्षी को नुकसान नहीं पहुँचाया। उसी तालाब से गाय, भैंस, बकरियाँ, पक्षी और गाँव के लोग निडर होकर पानी लेते थे, लेकिन गंगाराम ने कभी किसी पर हमला नहीं किया। समय के साथ गंगाराम गाँव के परिवार का हिस्सा बन गया। जब वह गाँव की ओर निकलता, तो लोग डरते नहीं थे। बच्चे मुस्कुराकर कहते, "गंगाराम आ गए!" और घरों से दाल-चावल निकालकर उसे खिलाते। पूरा गाँव उसे अतिथि नहीं, अपने परिवार के सदस्य की तरह अपनाता था। यह रिश्ता किसी मजबूरी का नहीं, बल्कि वर्षों से बने विश्वास और स्नेह का था। फिर एक दिन वह क्षण आया जिसने पूरे गाँव की आँखें नम कर दीं। गंगाराम की मृत्यु हो गई। उसकी अंतिम विदाई किसी जंगली जीव की तरह नहीं, बल्कि परिवार के प्रिय सदस्य की तरह की गई। गाँव के लोगों ने नम आँखों से उसे विदा किया। उस दिन हर व्यक्ति को ऐसा लगा जैसे उसने अपना कोई अपना खो दिया हो। गंगाराम की कहानी केवल एक मगरमच्छ की कहानी नहीं है। यह इस बात का प्रमाण है कि यदि इंसान प्रकृति और जीव-जंतुओं के साथ प्रेम, सम्मान और विश्वास का व्यवहार करे, तो वे भी उसी प्रेम का उत्तर देते हैं। हिंसा हर जीव का स्वभाव नहीं होती; परिस्थितियाँ और व्यवहार उसे वैसा बनाते हैं। आज भी गंगाराम की कहानी लोगों को यह संदेश देती है कि धरती केवल इंसानों की नहीं, बल्कि हर जीव की है। प्रेम और विश्वास की डोर सबसे शक्तिशाली होती है—इतनी शक्तिशाली कि वह इंसान और एक मगरमच्छ के बीच भी अटूट रिश्ता बना सकती है।

Shivam Yadav

49,966 Aufrufe • vor 1 Monat

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