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सुमन्त

@sumantkabir12,246 subscribers

24 साल हिंदी-अंग्रेजी के राष्ट्रीय कारोबारी मीडिया में रहा। विद्वान नहीं, जिज्ञासु हूँ। चंबल में गाय चराता हूं।

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आज सुबह बिहार के #खगड़िया से फोन आया। फेसबुक पर जुड़े 32 वर्षीय युवा Abnish Singh का। मूलतः बेगूसराय के हैं और #भूमिहार_समाज से हैं। हम दोनों कभी मिले नहीं। फोन की मित्रता है। बोला दादा! सोलर ड्रायर लगा लिया है, फिलहाल ड्राई माल सूरत का एक कारोबारी खरीद रहा है। अभी टमाटर और पके केले ड्राई कर रहे हैं। बातचीत में पूछा, यह विचार कैसे आया? अबनीश बोले, आपकी पोस्ट पढ़ कर..लगा कब तक समस्या गिनाते रहेंगे? कब तक सरकार को जिम्मेदार ठहराते रहेंगे..आपकी बातों से कुछ करने का उत्साह जागा। मैंने कहा, मेरी तारीफ बहुत हुई, यह बताओ, खर्च कितना आया? बताया, करीब साढ़े तीन लाख, इसमें से 45% #सब्सिडी मिली है। तो यह है Narendra Modi का असल करिश्मा! अबनीश साक्षात उदाहरण है। ऐसे एक नहीं, लाखों युवा उदाहरण हैं, जो समृद्धि की ओर निरन्तर बढ़ रहे हैं, इन्होंने राजनीतिक दलों की #दरी_बिछाने से इनकार कर दिया..सत्ता की योजनाओं का लाभ लिया, #चाकर से स्वयं #मालिक बन गए। मोदी तो चाहता भी नहीं कि आकर दरी बिछाओ! अबनीश को कहा, भूल कर भी #शिक्षितों की बातों में मत आना, ये भारत के, समाज के, परिवर्तन की राह में सबसे बड़े #स्पीड_ब्रेकर हैं, आपके हाथ में उत्पाद है तो बाजार लेने वास्ते तैयार खड़ा है। जानकारी के लिए, मक्का, मखाना, सरसो के क्षेत्र में #बिहार अपने बूते भारत का #नंबर_वन बना, #सत्ता का सहयोग बाद में आया। जल्द #मछली के क्षेत्र में बढ़त लेने जा रहा है। आपको जानकर आश्चर्य होगा, दशक भर पहले तक #आंध्रप्रदेश से मछली दिल्ली-जम्मू के बाजार बिकने जाती थी। एक ऐसे राज्य से जहां पानी की भारी किल्लत है। फिर बिहार तो पानी से समृद्ध है। समय और भविष्य उन्ही युवाओं का है, जिनको स्वयं पर #विश्वास है। हर सुबह उठकर धरती नापिए। सोशल मीडिया पर लाइक-शेयर गिनना फिजूल वक्त का टाइम पास है।

आज सुबह बिहार के #खगड़िया से फोन आया। फेसबुक पर जुड़े 32 वर्षीय युवा Abnish Singh का। मूलतः बेगूसराय के हैं और #भूमिहार_समाज से हैं। हम दोनों कभी मिले नहीं। फोन की मित्रता है। बोला दादा! सोलर ड्रायर लगा लिया है, फिलहाल ड्राई माल सूरत का एक कारोबारी खरीद रहा है। अभी टमाटर और पके केले ड्राई कर रहे हैं। बातचीत में पूछा, यह विचार कैसे आया? अबनीश बोले, आपकी पोस्ट पढ़ कर..लगा कब तक समस्या गिनाते रहेंगे? कब तक सरकार को जिम्मेदार ठहराते रहेंगे..आपकी बातों से कुछ करने का उत्साह जागा। मैंने कहा, मेरी तारीफ बहुत हुई, यह बताओ, खर्च कितना आया? बताया, करीब साढ़े तीन लाख, इसमें से 45% #सब्सिडी मिली है। तो यह है Narendra Modi का असल करिश्मा! अबनीश साक्षात उदाहरण है। ऐसे एक नहीं, लाखों युवा उदाहरण हैं, जो समृद्धि की ओर निरन्तर बढ़ रहे हैं, इन्होंने राजनीतिक दलों की #दरी_बिछाने से इनकार कर दिया..सत्ता की योजनाओं का लाभ लिया, #चाकर से स्वयं #मालिक बन गए। मोदी तो चाहता भी नहीं कि आकर दरी बिछाओ! अबनीश को कहा, भूल कर भी #शिक्षितों की बातों में मत आना, ये भारत के, समाज के, परिवर्तन की राह में सबसे बड़े #स्पीड_ब्रेकर हैं, आपके हाथ में उत्पाद है तो बाजार लेने वास्ते तैयार खड़ा है। जानकारी के लिए, मक्का, मखाना, सरसो के क्षेत्र में #बिहार अपने बूते भारत का #नंबर_वन बना, #सत्ता का सहयोग बाद में आया। जल्द #मछली के क्षेत्र में बढ़त लेने जा रहा है। आपको जानकर आश्चर्य होगा, दशक भर पहले तक #आंध्रप्रदेश से मछली दिल्ली-जम्मू के बाजार बिकने जाती थी। एक ऐसे राज्य से जहां पानी की भारी किल्लत है। फिर बिहार तो पानी से समृद्ध है। समय और भविष्य उन्ही युवाओं का है, जिनको स्वयं पर #विश्वास है। हर सुबह उठकर धरती नापिए। सोशल मीडिया पर लाइक-शेयर गिनना फिजूल वक्त का टाइम पास है।

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मुझे याद है छात्र जीवन में मेरा एक मित्र दीपक दुबे UPSC का इंटरव्यू देने जा रहा था। घर आया। सामने लॉन में बैठे बतिया रहे थे। तभी सामने लगी सेम की छोटी लतर को दिखा कर पूछा, यह क्या है? गौर से देखने के बाद बोला, यह #पुदीना है। दीपक ने चार बार IAS का इन्टरव्यू दिया। पर नहीं हुआ। हालांकि दीपक हाल ही NTPC के GM पद से रिटायर हुए। कमी दीपक की नहीं। प्रयागराज के सेंट जोसफ से पढ़ा, वहां से सीधे इलाहाबाद यूनिवर्सिटी आ गया। भारत के बहुत बड़े जीवन से कभी साक्षात्कार का अवसर ही नहीं मिला। यह वीडियो किसी सरस्वती शिशु मंदिर की है। इन्हीं के वॉल से मिली। मंदिर के बच्चो को धान की रोपनी करा रहे थे, वामपंथी गिरोह ने वीडियो वायरल कर दी। आरोप लगाया, शिक्षा के नाम पर #बाल_मजदूरी कराई जा रही है। मंदिर चूंकि #संघ से जुड़ा है तो मौका अच्छा था। राजनीतिक औजार मिल गया। मेरे भी कुछ सवाल है.. ● बच्चो के चेहरों की मुस्कान बता रही है, क्लासरूम की घुटती हवा से निकल, साझा होकर इस काम में क्या आनन्द अनुभव कर रहे हैं? ● ये चंद कूढ़मगज, गोलबंद शिक्षित कब तक बचपन का दम घोंटते रहेंगे? ● शिक्षा के मायनों और उद्देश्य पर नागरिक समाज "व्यापक विमर्श" क्यों शुरू नहीं कर रहा है? ● जंतर-मंतर, फिर झारखंड तक, भारत का युवा केवल #याचना करेगा? जारी "सत्ता संघर्ष" में राजनीतिक दलों की #खुराक बनता रहेगा? ● आखिर कब यह शिक्षित समाज अवसरों और व्यक्तित्व को व्यापक करने पर विमर्श शुरू करेगा? मार्गदर्शन, सक्रिय सहयोग नहीं कर सकते तो कोई बात नहीं, कम से कम सड़क का #स्पीड_ब्रेकर तो मत बनिए। बहुत हुआ तो समर्थन में #रूमानी_कविता करेंगे। दद्दा! हमने यह किया था। वह किया थे। अरे भाई! आपकी रुमानियत यदि #नीति_हस्तक्षेप में सक्षम नहीं तो क्या करूंगा आपके #कालजयी_संस्मरण सुन कर? या आने वाली पीढ़ी क्या करेगी? Narendra Modi Rahul Gandhi

मुझे याद है छात्र जीवन में मेरा एक मित्र दीपक दुबे UPSC का इंटरव्यू देने जा रहा था। घर आया। सामने लॉन में बैठे बतिया रहे थे। तभी सामने लगी सेम की छोटी लतर को दिखा कर पूछा, यह क्या है? गौर से देखने के बाद बोला, यह #पुदीना है। दीपक ने चार बार IAS का इन्टरव्यू दिया। पर नहीं हुआ। हालांकि दीपक हाल ही NTPC के GM पद से रिटायर हुए। कमी दीपक की नहीं। प्रयागराज के सेंट जोसफ से पढ़ा, वहां से सीधे इलाहाबाद यूनिवर्सिटी आ गया। भारत के बहुत बड़े जीवन से कभी साक्षात्कार का अवसर ही नहीं मिला। यह वीडियो किसी सरस्वती शिशु मंदिर की है। इन्हीं के वॉल से मिली। मंदिर के बच्चो को धान की रोपनी करा रहे थे, वामपंथी गिरोह ने वीडियो वायरल कर दी। आरोप लगाया, शिक्षा के नाम पर #बाल_मजदूरी कराई जा रही है। मंदिर चूंकि #संघ से जुड़ा है तो मौका अच्छा था। राजनीतिक औजार मिल गया। मेरे भी कुछ सवाल है.. ● बच्चो के चेहरों की मुस्कान बता रही है, क्लासरूम की घुटती हवा से निकल, साझा होकर इस काम में क्या आनन्द अनुभव कर रहे हैं? ● ये चंद कूढ़मगज, गोलबंद शिक्षित कब तक बचपन का दम घोंटते रहेंगे? ● शिक्षा के मायनों और उद्देश्य पर नागरिक समाज "व्यापक विमर्श" क्यों शुरू नहीं कर रहा है? ● जंतर-मंतर, फिर झारखंड तक, भारत का युवा केवल #याचना करेगा? जारी "सत्ता संघर्ष" में राजनीतिक दलों की #खुराक बनता रहेगा? ● आखिर कब यह शिक्षित समाज अवसरों और व्यक्तित्व को व्यापक करने पर विमर्श शुरू करेगा? मार्गदर्शन, सक्रिय सहयोग नहीं कर सकते तो कोई बात नहीं, कम से कम सड़क का #स्पीड_ब्रेकर तो मत बनिए। बहुत हुआ तो समर्थन में #रूमानी_कविता करेंगे। दद्दा! हमने यह किया था। वह किया थे। अरे भाई! आपकी रुमानियत यदि #नीति_हस्तक्षेप में सक्षम नहीं तो क्या करूंगा आपके #कालजयी_संस्मरण सुन कर? या आने वाली पीढ़ी क्या करेगी? Narendra Modi Rahul Gandhi

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हजार बार लिख चुका हूं, अंतिम विजय #मूल की ही होगी। इस बहस में नहीं पड़ता कि कौन #मूल है या कौन मूल नहीं? पुरी पीठाधीश्वर श्री निश्चलानन्द जी का एक वाक्य मुझे हमेशा उद्वेलित करता है, दृष्टि और विश्वास दोनों देता है, "...मूल का ही मोल है।" क्योंकि #वर्णसंकरता को #प्रकृति भी स्वीकार नहीं करती। विश्वास नहीं है तो, एक ही बीज से बचकर बार-बार बो कर देखिए, तीसरे या चौथी बार में #हाइब्रिड बीज भी अपने #मूल पर लौट आएगा। विचार, आस्था, सिद्धान्त..कुछ भी प्रकृति के इस सिद्धान्त से बाहर नहीं।

हजार बार लिख चुका हूं, अंतिम विजय #मूल की ही होगी। इस बहस में नहीं पड़ता कि कौन #मूल है या कौन मूल नहीं? पुरी पीठाधीश्वर श्री निश्चलानन्द जी का एक वाक्य मुझे हमेशा उद्वेलित करता है, दृष्टि और विश्वास दोनों देता है, "...मूल का ही मोल है।" क्योंकि #वर्णसंकरता को #प्रकृति भी स्वीकार नहीं करती। विश्वास नहीं है तो, एक ही बीज से बचकर बार-बार बो कर देखिए, तीसरे या चौथी बार में #हाइब्रिड बीज भी अपने #मूल पर लौट आएगा। विचार, आस्था, सिद्धान्त..कुछ भी प्रकृति के इस सिद्धान्त से बाहर नहीं।

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सावन माह का आरंभ हो गया। पूरे सावन शिवलिंग पर दूध चढ़ाया जाएगा। शिवालयों से लेकर बूढ़े बरगद, युवा पीपल के नीचे बैठे भोले बाबा तृप्त मिलेंगे। मुस्कराते हुए। दस साल पहले सोशल मीडिया, कारोबारी टीवी की बहस में दलील दी जाती थी, शिवलिंग पर दूध चढ़ाने का क्या लाभ? लाखों-करोड़ों गरीब बच्चे हैं, उन्हें दीजिए! पुण्य होगा! वामपन्थी था तो मुझे भी लगता, बात तो सही है, गरीबों को दिया जाए! प्रतीकात्मक रूप से दो-चार बूंद शिवलिंग को अर्पित कर दें। सन 2018 में जब चंबल के गुर्जर गौपालकों के बीच रहने पहुंचा तो दूध चढ़ाने के #विज्ञान का रहस्य समझ आया। सावन का दूध मनुध्य क्या, गौ अपनी संतान को भी बहुत थोड़ा पिलाती है। वैसे तो गौपालक ही रोक देते हैं। प्रकृति के नियम अनुशासन से होली के आसपास गौ के बच्चे होते हैं, जो सावन तक चार-पांच माह के हो चुके होते हैं, मां के दूध की उतनी आवश्यकता भी नहीं रहती। पर्याप्त हरा चारा, कोमल दूब उपलब्ध रहती है। सावन के दूध को मानव शरीर नहीं पचा सकता। कारण है प्रकृति। हरे चारे में गांठ नहीं बन पाती। गौ मां की पाचन शक्ति भी दुर्बल हो जाती है। गोबर पतला, पानी की तरह हो जाएगा। मनुष्य पी ले तो दस्त लग जाएंगे। दूध क्या, मट्ठा भी पी कर पचाना असंभव है। स्वयं पर प्रयोग करके देखा है। मात्र घी बन सकता है। आपका सवाल है, शहर में हमें क्यों नहीं ऐसा अनुभव होता है? उत्तर है, एक शहरी को #प्राकृतिक_दूध कहां मिलता है? सावन-भादो में जब दूध बहुतायत होगा, तो फैक्ट्रियों में #मिल्क_पावडर बना कर स्टोर होगा। फिर साल भर उसी पाउडर को मिलाकर दूध बनेगा। वही एक शहरी को #पैक्ड होकर मिलता है। कभी स्वयं से एक सवाल कीजिए..क्या प्रकृति में सभव है दूध में फैट यानी वसा का अनुपात साल के बारह महीने एक समान रहे? प्रकृति में असंभव है। फैक्ट्री में संभव है। एक हिन्दू की आस्था में दूध, खासकर गौ के दूध का सम्मान है। फेंक नहीं सकता। अन्य को पीने के लिए भी दे नहीं सकता। अहित होगा। सो एक ही रास्ता, #प्रभु को अर्पित कर दो। लेकिन किस प्रभु को? उन्हीं को जो #गरल पीने की क्षमता रखते हैं...#महादेव को। आखिरी बात..फिर शिवलिंग को अर्पित दूध को पीता कौन है? #कुत्ते पीते हैं। जो मंदिर के बाहर शिवलिंग पर चढ़ाए जा रहे दूध को पीते मिलेंगे। संभवतः एकमात्र कुत्ता ही है जो सावन के दूध को पी कर पचाने की क्षमता रखता है..तभी भोलेनाथ का #गण है कुत्ता भी। #प्रकृति की गूढ़ता को जाने बिना #हिन्दू_आस्था और #उपासना_पद्धतियों पर सवाल उठाना विशुद्ध मूर्खता है। और इस मूर्खता का सार्वजनिक प्रदर्शन #आधुनिक_शिक्षित बार-बार करता है। हर!हर! महादेव!

सावन माह का आरंभ हो गया। पूरे सावन शिवलिंग पर दूध चढ़ाया जाएगा। शिवालयों से लेकर बूढ़े बरगद, युवा पीपल के नीचे बैठे भोले बाबा तृप्त मिलेंगे। मुस्कराते हुए। दस साल पहले सोशल मीडिया, कारोबारी टीवी की बहस में दलील दी जाती थी, शिवलिंग पर दूध चढ़ाने का क्या लाभ? लाखों-करोड़ों गरीब बच्चे हैं, उन्हें दीजिए! पुण्य होगा! वामपन्थी था तो मुझे भी लगता, बात तो सही है, गरीबों को दिया जाए! प्रतीकात्मक रूप से दो-चार बूंद शिवलिंग को अर्पित कर दें। सन 2018 में जब चंबल के गुर्जर गौपालकों के बीच रहने पहुंचा तो दूध चढ़ाने के #विज्ञान का रहस्य समझ आया। सावन का दूध मनुध्य क्या, गौ अपनी संतान को भी बहुत थोड़ा पिलाती है। वैसे तो गौपालक ही रोक देते हैं। प्रकृति के नियम अनुशासन से होली के आसपास गौ के बच्चे होते हैं, जो सावन तक चार-पांच माह के हो चुके होते हैं, मां के दूध की उतनी आवश्यकता भी नहीं रहती। पर्याप्त हरा चारा, कोमल दूब उपलब्ध रहती है। सावन के दूध को मानव शरीर नहीं पचा सकता। कारण है प्रकृति। हरे चारे में गांठ नहीं बन पाती। गौ मां की पाचन शक्ति भी दुर्बल हो जाती है। गोबर पतला, पानी की तरह हो जाएगा। मनुष्य पी ले तो दस्त लग जाएंगे। दूध क्या, मट्ठा भी पी कर पचाना असंभव है। स्वयं पर प्रयोग करके देखा है। मात्र घी बन सकता है। आपका सवाल है, शहर में हमें क्यों नहीं ऐसा अनुभव होता है? उत्तर है, एक शहरी को #प्राकृतिक_दूध कहां मिलता है? सावन-भादो में जब दूध बहुतायत होगा, तो फैक्ट्रियों में #मिल्क_पावडर बना कर स्टोर होगा। फिर साल भर उसी पाउडर को मिलाकर दूध बनेगा। वही एक शहरी को #पैक्ड होकर मिलता है। कभी स्वयं से एक सवाल कीजिए..क्या प्रकृति में सभव है दूध में फैट यानी वसा का अनुपात साल के बारह महीने एक समान रहे? प्रकृति में असंभव है। फैक्ट्री में संभव है। एक हिन्दू की आस्था में दूध, खासकर गौ के दूध का सम्मान है। फेंक नहीं सकता। अन्य को पीने के लिए भी दे नहीं सकता। अहित होगा। सो एक ही रास्ता, #प्रभु को अर्पित कर दो। लेकिन किस प्रभु को? उन्हीं को जो #गरल पीने की क्षमता रखते हैं...#महादेव को। आखिरी बात..फिर शिवलिंग को अर्पित दूध को पीता कौन है? #कुत्ते पीते हैं। जो मंदिर के बाहर शिवलिंग पर चढ़ाए जा रहे दूध को पीते मिलेंगे। संभवतः एकमात्र कुत्ता ही है जो सावन के दूध को पी कर पचाने की क्षमता रखता है..तभी भोलेनाथ का #गण है कुत्ता भी। #प्रकृति की गूढ़ता को जाने बिना #हिन्दू_आस्था और #उपासना_पद्धतियों पर सवाल उठाना विशुद्ध मूर्खता है। और इस मूर्खता का सार्वजनिक प्रदर्शन #आधुनिक_शिक्षित बार-बार करता है। हर!हर! महादेव!

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#दूध_को_असल_कहानी भिंड के एक दूधिए की जुबानी, दूध की असल कहानी! वैसे यही कहानी भारत के हर अंचल, हर राज्य की है। करप्शन और मिलावट का कोई #लोकल_ब्रांड नहीं होता। ध्यान रहे, डेयरी इंड्रस्ट्री बहुत ताकतवर और संगठित है। हजारों करोड़ की #डेयरी_इंडस्ट्री के पीछे, अरबों करोड़ की #हेल्थ_इंडस्ट्री और इनके पीछे खरबों करोड़ की #फॉर्मा_इंडस्ट्री खड़ी है। सत्ता और लोकतंत्र को दिन-रात ताश की गड्डियों की तरह फेंटते हैं ये। फिर भी लोकतंत्र की गलतफहमी में जी रहे हैं हम। हमारी बचकानी प्रतिक्रिया पर ये ताकतवर मुस्करा कर आगे बढ़ जाते हैं। मामूली और सब्जबाग में जीने वालों के पास एक ही वाक्य, "..सरकार क्या कर रही है?" बस! हो गया इति सिद्धम! Narendra Modi Dr Mohan Yadav

सुमन्त

18,811 просмотров • 13 дней назад

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प्रयागराज आया तो आज अपने #इलाहाबाद_विश्वविद्यालय चला गया। शाम 6 बजे पहुंचा तो प्रवेश निषेध। गार्ड की टीम से अनुनय-विनय किया पर बात नहीं बनी। आखिर में साथ गए विश्वविद्यालय के अनुज #सच्चिदानंद_त्रिपाठी ने किन्ही प्रॉक्टर साहब को फोन कर अनुमति दिलाई। हमारा समय था, जब देर रात तक छात्रों की जगह-जगह चौपाल चलती। शायद ही संसार का कोई विषय बचता, जिस पर टकराहट नहीं होती। तब UPSC की हर वर्ष निकलने वाली करीब 800 सीट में इस इलाहाबाद विश्वविद्यालय के 500 से 600 छात्र सफल रहते। आज विश्विद्यालय की दीवार हैं। चकाचोंध रोशनी हैं, पर #युवा_पीढ़ी नहीं है। सो कैंपस में जीवन नहीं है। आज इलाहाबाद विश्वविद्यालय निजीव हो चुका है, शिक्षा के इस निर्जीव देह पर बाहर #कोचिंग पनप रहे हैं करोड़ों की संपति पर लहलहा रहे हैं। हमारे वक्त इसी विश्विद्यालय में पढ़े छात्र की पत्नी इलाहाबाद विश्वविद्यालय की वाइस चांसलर हैं। लेकिन शायद ही शिक्षा क्षेत्र में कोई योगदान हों। पति सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस हैं। मनुष्य ही नहीं बदलता, शहर भी बदल जाता है। #स्मृति_यात्रा

सुमन्त

12,542 просмотров • 3 месяцев назад

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