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सुमन्त

@sumantkabir12,119 subscribers

24 साल हिंदी-अंग्रेजी के राष्ट्रीय कारोबारी मीडिया में रहा। विद्वान नहीं, जिज्ञासु हूँ। चंबल में गाय चराता हूं।

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हजार बार लिख चुका हूं, अंतिम विजय #मूल की ही होगी। इस बहस में नहीं पड़ता कि कौन #मूल है या कौन मूल नहीं? पुरी पीठाधीश्वर श्री निश्चलानन्द जी का एक वाक्य मुझे हमेशा उद्वेलित करता है, दृष्टि और विश्वास दोनों देता है, "...मूल का ही मोल है।" क्योंकि #वर्णसंकरता को #प्रकृति भी स्वीकार नहीं करती। विश्वास नहीं है तो, एक ही बीज से बचकर बार-बार बो कर देखिए, तीसरे या चौथी बार में #हाइब्रिड बीज भी अपने #मूल पर लौट आएगा। विचार, आस्था, सिद्धान्त..कुछ भी प्रकृति के इस सिद्धान्त से बाहर नहीं।

हजार बार लिख चुका हूं, अंतिम विजय #मूल की ही होगी। इस बहस में नहीं पड़ता कि कौन #मूल है या कौन मूल नहीं? पुरी पीठाधीश्वर श्री निश्चलानन्द जी का एक वाक्य मुझे हमेशा उद्वेलित करता है, दृष्टि और विश्वास दोनों देता है, "...मूल का ही मोल है।" क्योंकि #वर्णसंकरता को #प्रकृति भी स्वीकार नहीं करती। विश्वास नहीं है तो, एक ही बीज से बचकर बार-बार बो कर देखिए, तीसरे या चौथी बार में #हाइब्रिड बीज भी अपने #मूल पर लौट आएगा। विचार, आस्था, सिद्धान्त..कुछ भी प्रकृति के इस सिद्धान्त से बाहर नहीं।

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सावन माह का आरंभ हो गया। पूरे सावन शिवलिंग पर दूध चढ़ाया जाएगा। शिवालयों से लेकर बूढ़े बरगद, युवा पीपल के नीचे बैठे भोले बाबा तृप्त मिलेंगे। मुस्कराते हुए। दस साल पहले सोशल मीडिया, कारोबारी टीवी की बहस में दलील दी जाती थी, शिवलिंग पर दूध चढ़ाने का क्या लाभ? लाखों-करोड़ों गरीब बच्चे हैं, उन्हें दीजिए! पुण्य होगा! वामपन्थी था तो मुझे भी लगता, बात तो सही है, गरीबों को दिया जाए! प्रतीकात्मक रूप से दो-चार बूंद शिवलिंग को अर्पित कर दें। सन 2018 में जब चंबल के गुर्जर गौपालकों के बीच रहने पहुंचा तो दूध चढ़ाने के #विज्ञान का रहस्य समझ आया। सावन का दूध मनुध्य क्या, गौ अपनी संतान को भी बहुत थोड़ा पिलाती है। वैसे तो गौपालक ही रोक देते हैं। प्रकृति के नियम अनुशासन से होली के आसपास गौ के बच्चे होते हैं, जो सावन तक चार-पांच माह के हो चुके होते हैं, मां के दूध की उतनी आवश्यकता भी नहीं रहती। पर्याप्त हरा चारा, कोमल दूब उपलब्ध रहती है। सावन के दूध को मानव शरीर नहीं पचा सकता। कारण है प्रकृति। हरे चारे में गांठ नहीं बन पाती। गौ मां की पाचन शक्ति भी दुर्बल हो जाती है। गोबर पतला, पानी की तरह हो जाएगा। मनुष्य पी ले तो दस्त लग जाएंगे। दूध क्या, मट्ठा भी पी कर पचाना असंभव है। स्वयं पर प्रयोग करके देखा है। मात्र घी बन सकता है। आपका सवाल है, शहर में हमें क्यों नहीं ऐसा अनुभव होता है? उत्तर है, एक शहरी को #प्राकृतिक_दूध कहां मिलता है? सावन-भादो में जब दूध बहुतायत होगा, तो फैक्ट्रियों में #मिल्क_पावडर बना कर स्टोर होगा। फिर साल भर उसी पाउडर को मिलाकर दूध बनेगा। वही एक शहरी को #पैक्ड होकर मिलता है। कभी स्वयं से एक सवाल कीजिए..क्या प्रकृति में सभव है दूध में फैट यानी वसा का अनुपात साल के बारह महीने एक समान रहे? प्रकृति में असंभव है। फैक्ट्री में संभव है। एक हिन्दू की आस्था में दूध, खासकर गौ के दूध का सम्मान है। फेंक नहीं सकता। अन्य को पीने के लिए भी दे नहीं सकता। अहित होगा। सो एक ही रास्ता, #प्रभु को अर्पित कर दो। लेकिन किस प्रभु को? उन्हीं को जो #गरल पीने की क्षमता रखते हैं...#महादेव को। आखिरी बात..फिर शिवलिंग को अर्पित दूध को पीता कौन है? #कुत्ते पीते हैं। जो मंदिर के बाहर शिवलिंग पर चढ़ाए जा रहे दूध को पीते मिलेंगे। संभवतः एकमात्र कुत्ता ही है जो सावन के दूध को पी कर पचाने की क्षमता रखता है..तभी भोलेनाथ का #गण है कुत्ता भी। #प्रकृति की गूढ़ता को जाने बिना #हिन्दू_आस्था और #उपासना_पद्धतियों पर सवाल उठाना विशुद्ध मूर्खता है। और इस मूर्खता का सार्वजनिक प्रदर्शन #आधुनिक_शिक्षित बार-बार करता है। हर!हर! महादेव!

सावन माह का आरंभ हो गया। पूरे सावन शिवलिंग पर दूध चढ़ाया जाएगा। शिवालयों से लेकर बूढ़े बरगद, युवा पीपल के नीचे बैठे भोले बाबा तृप्त मिलेंगे। मुस्कराते हुए। दस साल पहले सोशल मीडिया, कारोबारी टीवी की बहस में दलील दी जाती थी, शिवलिंग पर दूध चढ़ाने का क्या लाभ? लाखों-करोड़ों गरीब बच्चे हैं, उन्हें दीजिए! पुण्य होगा! वामपन्थी था तो मुझे भी लगता, बात तो सही है, गरीबों को दिया जाए! प्रतीकात्मक रूप से दो-चार बूंद शिवलिंग को अर्पित कर दें। सन 2018 में जब चंबल के गुर्जर गौपालकों के बीच रहने पहुंचा तो दूध चढ़ाने के #विज्ञान का रहस्य समझ आया। सावन का दूध मनुध्य क्या, गौ अपनी संतान को भी बहुत थोड़ा पिलाती है। वैसे तो गौपालक ही रोक देते हैं। प्रकृति के नियम अनुशासन से होली के आसपास गौ के बच्चे होते हैं, जो सावन तक चार-पांच माह के हो चुके होते हैं, मां के दूध की उतनी आवश्यकता भी नहीं रहती। पर्याप्त हरा चारा, कोमल दूब उपलब्ध रहती है। सावन के दूध को मानव शरीर नहीं पचा सकता। कारण है प्रकृति। हरे चारे में गांठ नहीं बन पाती। गौ मां की पाचन शक्ति भी दुर्बल हो जाती है। गोबर पतला, पानी की तरह हो जाएगा। मनुष्य पी ले तो दस्त लग जाएंगे। दूध क्या, मट्ठा भी पी कर पचाना असंभव है। स्वयं पर प्रयोग करके देखा है। मात्र घी बन सकता है। आपका सवाल है, शहर में हमें क्यों नहीं ऐसा अनुभव होता है? उत्तर है, एक शहरी को #प्राकृतिक_दूध कहां मिलता है? सावन-भादो में जब दूध बहुतायत होगा, तो फैक्ट्रियों में #मिल्क_पावडर बना कर स्टोर होगा। फिर साल भर उसी पाउडर को मिलाकर दूध बनेगा। वही एक शहरी को #पैक्ड होकर मिलता है। कभी स्वयं से एक सवाल कीजिए..क्या प्रकृति में सभव है दूध में फैट यानी वसा का अनुपात साल के बारह महीने एक समान रहे? प्रकृति में असंभव है। फैक्ट्री में संभव है। एक हिन्दू की आस्था में दूध, खासकर गौ के दूध का सम्मान है। फेंक नहीं सकता। अन्य को पीने के लिए भी दे नहीं सकता। अहित होगा। सो एक ही रास्ता, #प्रभु को अर्पित कर दो। लेकिन किस प्रभु को? उन्हीं को जो #गरल पीने की क्षमता रखते हैं...#महादेव को। आखिरी बात..फिर शिवलिंग को अर्पित दूध को पीता कौन है? #कुत्ते पीते हैं। जो मंदिर के बाहर शिवलिंग पर चढ़ाए जा रहे दूध को पीते मिलेंगे। संभवतः एकमात्र कुत्ता ही है जो सावन के दूध को पी कर पचाने की क्षमता रखता है..तभी भोलेनाथ का #गण है कुत्ता भी। #प्रकृति की गूढ़ता को जाने बिना #हिन्दू_आस्था और #उपासना_पद्धतियों पर सवाल उठाना विशुद्ध मूर्खता है। और इस मूर्खता का सार्वजनिक प्रदर्शन #आधुनिक_शिक्षित बार-बार करता है। हर!हर! महादेव!

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प्रयागराज आया तो आज अपने #इलाहाबाद_विश्वविद्यालय चला गया। शाम 6 बजे पहुंचा तो प्रवेश निषेध। गार्ड की टीम से अनुनय-विनय किया पर बात नहीं बनी। आखिर में साथ गए विश्वविद्यालय के अनुज #सच्चिदानंद_त्रिपाठी ने किन्ही प्रॉक्टर साहब को फोन कर अनुमति दिलाई। हमारा समय था, जब देर रात तक छात्रों की जगह-जगह चौपाल चलती। शायद ही संसार का कोई विषय बचता, जिस पर टकराहट नहीं होती। तब UPSC की हर वर्ष निकलने वाली करीब 800 सीट में इस इलाहाबाद विश्वविद्यालय के 500 से 600 छात्र सफल रहते। आज विश्विद्यालय की दीवार हैं। चकाचोंध रोशनी हैं, पर #युवा_पीढ़ी नहीं है। सो कैंपस में जीवन नहीं है। आज इलाहाबाद विश्वविद्यालय निजीव हो चुका है, शिक्षा के इस निर्जीव देह पर बाहर #कोचिंग पनप रहे हैं करोड़ों की संपति पर लहलहा रहे हैं। हमारे वक्त इसी विश्विद्यालय में पढ़े छात्र की पत्नी इलाहाबाद विश्वविद्यालय की वाइस चांसलर हैं। लेकिन शायद ही शिक्षा क्षेत्र में कोई योगदान हों। पति सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस हैं। मनुष्य ही नहीं बदलता, शहर भी बदल जाता है। #स्मृति_यात्रा

सुमन्त

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