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K P Malik

@TheKPMalik21,153 subscribers

Political Editor : Dainik Bhaskar. Vice President : DJA (NUJ-India). Executive Member : Press Association of India, Member : PCI, personal views.

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इन नरपिशाचों के सामने खड़ी ये मासूम बच्चियाँ कितनी सहमी और घबराई हुई है! क्या इन्हे इतनी छोटी सी उम्र की बच्चियों पर भी तरस नहीं आया? #EpsteinFiles #EpsteinTrumpFiles #EpsteinFiles #Epstein #EpsteinFilesIndia

इन नरपिशाचों के सामने खड़ी ये मासूम बच्चियाँ कितनी सहमी और घबराई हुई है! क्या इन्हे इतनी छोटी सी उम्र की बच्चियों पर भी तरस नहीं आया? #EpsteinFiles #EpsteinTrumpFiles #EpsteinFiles #Epstein #EpsteinFilesIndia

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किस खतरे की बात रहें हैं जगदीप धनकड? पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड को ऐसा क्या महसूस हुआ कि उन्होंने कह दिया कि मैं पहले ही उन खतरनाक चुनौतियों का भुक्तभोगी हूं? जो मुझे अपनों से मिली हैं। और जिनका कोई तार्किक आधार भी नहीं है और उसकी हम चर्चा भी नहीं कर सकते? जो राज काज से जुड़ी हुई है, जिसका राष्ट्र विकास से संबंध नहीं है। इन चुनौतियों का मैं ख़ुद शिकार हूं। अब सवाल यह उठता है कि क्या जगदीप धनखड़ को किसी अनहोनी की आशंका पहले ही हो गई थी? और क्या इसी कारण उन्होंने पहले से ऐसा बयान देकर संकेत देने की कोशिश की थी? #VicePresident #vicepresidentelection #VicePresidentElection2025 #VicePresidentialElection #BiharElections2025 #PunjabFloodRelief #PunjabFloods

किस खतरे की बात रहें हैं जगदीप धनकड? पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड को ऐसा क्या महसूस हुआ कि उन्होंने कह दिया कि मैं पहले ही उन खतरनाक चुनौतियों का भुक्तभोगी हूं? जो मुझे अपनों से मिली हैं। और जिनका कोई तार्किक आधार भी नहीं है और उसकी हम चर्चा भी नहीं कर सकते? जो राज काज से जुड़ी हुई है, जिसका राष्ट्र विकास से संबंध नहीं है। इन चुनौतियों का मैं ख़ुद शिकार हूं। अब सवाल यह उठता है कि क्या जगदीप धनखड़ को किसी अनहोनी की आशंका पहले ही हो गई थी? और क्या इसी कारण उन्होंने पहले से ऐसा बयान देकर संकेत देने की कोशिश की थी? #VicePresident #vicepresidentelection #VicePresidentElection2025 #VicePresidentialElection #BiharElections2025 #PunjabFloodRelief #PunjabFloods

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अमेरिकन कुत्तों ने किया था निरीक्षण (एच-1बी वीज़ा) देश प्रमुख चैनल एबीपी पर एच-1बी वीज़ा पर डिबेट चल रही थी। एंकर संदीप चौधरी ने जब राष्ट्रीय लोक दल के राष्ट्रीय प्रवक्ता और जयंत चौधरी के वरिष्ठ राजनीतिक सलाहकार गु-हित घग्घर-वाल से ट्रंप सरकार के एच-1बी वीज़ा के विषय में सवाल पूछा तो स्टूडियो में पिन ड्रॉप साइलेंस हो गया। दरअसल महान विशेषज्ञ ने बताया कि बराक ओबामा के भारत आने से पहले अमेरिकन कुत्ते निरीक्षण करने आए थे उसके बाद अमेरिका के राष्ट्रपति भारत आए थे। एच-1बी वीज़ा से अमेरिका को बहुत बड़ा नुक्सान होगा। और भारत का...? इसलिए कहा जाता है कि रालोद से काबिल प्रवक्ता, किसी अन्य दल के पास नहीं है। सारे तराशे हुए हीरे यहीं हैं। यही कारण है कि पार्टी का ग्राफ भयंकर तरीके से बढ़ता ही जा रहा है। बहरहाल संदीप चौधरी ने जो आरती उतारी है उनसे ऐसी आशा नहीं थी उनको समझना चाहिए कितनी मजबूरियां हैं चवन्नी, खीर और महामानव में किसान मसीहा की छवि आदि। Rashtriya Lok Dal BJP Uttar Pradesh UP Congress Samajwadi Party I.P. Singh prof dr Arun Prakash Mishra 🇺🇲 #RLD

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उत्तराखंड की महिलाओं ने फिर दिखाया दम! अंकिता को न्याय का ऐतिहासिक जन विद्रोह! आज उत्तराखंड की सड़कें गूंज उठीं, सीएम घेराव और अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने का वो जन आंदोलन जो न भजन मंडली था, न राजनीतिक तमाशा। हजारों उत्तराखंडवासी देहरादून की सड़कों पर उतरे, जिसमें सामाजिक कार्यकर्ताओं का गुस्सा और राज्य सरकार के विरोध में महिलाओं का विद्रोह साफ़ नज़र आ रहा था। दरअसल खास बात यह थी कि इसका आह्वान, नेतृत्व और दिशा सब उत्तराखंड की उन वीरांगनाओं ने तय कीं, जिन्होंने राज्य गठन के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था। सोशल मीडिया पर लाखों लोग, प्रदेश से लेकर दुनिया भर के लोग अपनी सहभागिता दर्ज कराते हुए नज़र आए। ये कोई 'पार्टी का ज़ुमला' नहीं, बल्कि उत्तराखंड की जनता का ठोस संदेश है! 4 जनवरी 2026 की तारीख़ उत्तराखंड के इतिहास की किताब में दर्ज हो गई! ये दिन महिलाओं को न्याय दिलाने और सशक्तिकरण के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। सरकार को महिलाओं की सीधी चेतावनी कि सीबीआई की जांच करके दोषियों को सज़ा करो! मासूम अंकिता के परिवार को न्याय के नाम पर सत्ताधारी नेताओं षड्यंत्र बंद करो, 'यूकेडी का ड्रामा' या 'विपक्षी साजिश' जैसे जुमलों से तंग मत करो और सिद्धांतवादी पार्टी का नैतिक पतन बंद करो! बहरहाल ये पब्लिक मूवमेंट है उत्तराखंड के स्थानीय लोगों का, बेटियों का गुस्सा है। अपेक्षाएं हैं जो सड़कों पर गूंजीं। अब बोलो, कब तक 'राजनीतिक चश्मा' लगाकर जनता को बेवकूफ बनाओगे? न्याय दो, वरना ये आग इस पूरे भ्रष्टाचारी सिस्टम को ही लपेट लेगी! #Uttarakhand #uttarakhandnews #AnkitaBhandariCase #AnkitaBhandari #englot #njwk20 #Parasakthi

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जयंत को निपटाने की रणनीति... भाजपा की चौधरी चरण सिंह के वंशजों को सियासत से समाप्त करने की पुरानी हसरत रही है उसी के मद्देनजर भाजपा ने जयंत चौधरी को सियासी चक्रव्यूह में जकड़ लिया है। और उसी के तहत उनसे यूपी सीएम योगी के खिलाफ या तमिलनाडु में स्टालिन के खिलाफ बयान दिलवाये जा रहे हैं। यें वही जयंत चौधरी हैं जिनका भाजपा का नाम लेते ही पारा चढ़ जाया करता था। अगर मैं 2014 या 2017 में भाजपा के ऑफर की बात करूं तो छोटे चौधरी यानि अजित सिंह यह ऑफर ठुकराने के मूड में नहीं थे लेकिन उस समय जयंत ने भाजपा के उस ऑफर को ठुकराते हुए कहा था कि मरना पसंद है लेकिन भाजपा में जाना गवारा नहीं है। मैं भाजपा में जाने से अच्छा राजनीतिक छोड़ना पसंद करूंगा। चवन्नी थोड़ी हूं जो पलट जाऊंगा, यह जुमला तो सबको याद ही होगा। लेकिन हैरानी की बात यह है कि एकाएक जयंत चौधरी को क्यों बीजेपी में जाना पड़ा? क्या इसके पीछे कोई दबाव है या कोई मजबूरी है? अगर कुछ ऐसा है तो जयंत चौधरी को अपने समाज के सामने इस बात को रखना चाहिए ताकि समाज उनके साथ उठ खड़ा हो। दूसरी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के भाजपा के स्थानीय नेता और दूसरे सियासी दलों के नेता भी जयंत चौधरी की सियासी जमीन को हड़पने और उसका राजनीतिक कैरियर खत्म करने के लिए तमाम हथकंडे अपना रहे हैं। माना यह जा रहा है कि इसी रणनीति के तहत किसानों की राजधानी कहे जाने वाले सिसौली में जाट आरक्षण को लेकर एक महा पंचायत हो रही है। उस पंचायत में निर्णय लिया जाएगा कि भाजपा की मोदी सरकार से जाटों को आरक्षण दिलाने का काम किया जाए, यह बात जग जाहिर है कि भाजपा जाट आरक्षण को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेगी और अंत में यह बॉल क्या भाजपा के चक्रव्यूह में फस चुके हैं जयंत? भाजपा की चौधरी चरण सिंह के वंशजों को सियासत से समाप्त करने की पुरानी हसरत रही है उसी के मद्देनजर भाजपा ने जयंत चौधरी को सियासी चक्रव्यूह में जकड़ लिया है। और उसी के तहत उनसे यूपी सीएम योगी के खिलाफ या तमिलनाडु में स्टालिन के खिलाफ बयान दिलवाये जा रहे हैं। यें वही जयंत चौधरी हैं जिनका भाजपा का नाम लेते ही पारा चढ़ जाया करता था। अगर मैं 2014 या 2017 में भाजपा के ऑफर की बात करूं तो छोटे चौधरी यानि अजित सिंह यह ऑफर ठुकराने के मूड में नहीं थे लेकिन उस समय जयंत ने भाजपा के उस ऑफर को ठुकराते हुए कहा था कि मरना पसंद है लेकिन भाजपा में जाना गवारा नहीं है। मैं भाजपा में जाने से अच्छा राजनीतिक छोड़ना पसंद करूंगा। चवन्नी थोड़ी हूं जो पलट जाऊंगा, यह जुमला तो सबको याद ही होगा। लेकिन हैरानी की बात यह है कि एकाएक जयंत चौधरी को क्यों बीजेपी में जाना पड़ा? क्या इसके पीछे कोई दबाव है या कोई मजबूरी है? अगर कुछ ऐसा है तो जयंत चौधरी को अपने समाज के सामने इस बात को रखना चाहिए ताकि समाज उनके साथ उठ खड़ा हो। दूसरी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के भाजपा के स्थानीय नेता और दूसरे सियासी दलों के नेता भी जयंत चौधरी की सियासी जमीन को हड़पने और उसका राजनीतिक कैरियर खत्म करने के लिए तमाम हथकंडे अपना रहे हैं। माना यह जा रहा है कि इसी रणनीति के तहत किसानों की राजधानी कहे जाने वाले सिसौली में जाट आरक्षण को लेकर एक महा पंचायत हो रही है। उस पंचायत में निर्णय लिया जाएगा कि भाजपा की मोदी सरकार से जाटों को आरक्षण दिलाने का काम किया जाए। हालांकि यह बात भी जग जाहिर है कि भाजपा की मोदी सरकार किसी भी कीमत पर जाट आरक्षण पर कोई विचार नहीं करने जा रही है लेकिन जयंत को घेरने के लिए उनके विरोधियों के लिए यह है स्वर्णिम अवसर है। अंत में यह बॉल जयंत चौधरी के पाले में डालकर उनको बली का बकरा बनाने की रणनीति दिखाई दे रही है। अब इस रणनीति का मुकाबला जयंत कर पाते हैं? या इसमें फंसकर वह शहीद हो जाते हैं यह तो समय ही बताएगा। Rashtriya Lok Dal BJP West UP Aazad Samaj Party - Delhi Samajwadi Party

K P Malik

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अब संदीप चौधरी और दिबांग की ख़ैर नहीं? मोदी सरकार जब सत्ता में आई तो सपना दिखाया गया था कि 2022 तक 20 करोड़ युवाओं को हुनरमंद बना दिया जाएगा। लेकिन हक़ीक़त ये है कि 20 करोड़ तो दूर, गिनती दो करोड़ तक भी बमुश्किल पहुँची है। फिर भी केंद्रीय मंत्री और पार्टी के वरिष्ठ प्रवक्ता हर रोज़ टीवी स्टूडियो में बैठकर बताते हैं कि “कौशल विकास” में ग़ज़ब का काम हुआ है। क्योंकि पार्टी प्रवक्ता खेती-किसानी, पश्चिमी यूपी के सियासी गणित और राजनीति, चौधरी चरण सिंह की विचारधारा और उनकी नीतिओं के ज्ञाता हैं और गन्ना किसानों की समस्याओं के समाधान गिनाकर किसानों की नब्ज़ पढ़ते रहतें हैं। मानो चैनल पर ही मंत्रालय का वार्षिक लेखा-जोखा पेश हो रहा हो। लेकिन इस बीच संदीप चौधरी और दिबांग जैसे पत्रकारों ने उनकी “सफलता की स्क्रिप्ट” पर सवाल खड़े कर दिए। वें रालोद मुखिया और केंद्रीय कौशल विकास मंत्री को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। इसलिये रालोद के सूत्र कह रहे हैं कि अब पार्टी दोनों वरिष्ठ पत्रकारों पर मानहानि का दावा ठोकने का विचार कर रही है। यानि मंत्री जी का काम फुल स्पीड से चल रहा है भले ही वो सिर्फ़ पेपर पर हो लेकिन जो सवाल उठायेगा उसको…? पता है ना कौनसी सरकार है? इस सरकार में शायद यही नया कौशल है कि युवाओं को ट्रेंड करने से ज़्यादा, सवाल पूछने वालों को कोर्ट-कचहरी का रास्ता दिखाना! (व्यंग) #BiharSIR_2025 #BiharElection2025

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37,724 views • 11 months ago

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भूपेन बोरा का 'महान कन्फेशन'! बेईमान राजनीति का ईमानदार नेता… असम कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष भूपेन बोरा ने कैमरे पर ठसक से कबूला है कि सीएम हिमंता बिस्वा सरमा से 50 करोड़ अपने 'पिताजी के सपने' को पूरा करने के लिए पैसे लिए हैं। पैसे लेकर ख़लेआम बेशर्मी से स्वीकार करने वाले पहले 'ईमानदार' भारतीय नेता बन गए हैं। नेता तो लेकर मुकर जाते हैं। ऐसी ईमानदारी? ये तो बेशर्मी का ओलंपिक गोल्ड है। आज के दौर में बेशर्मी का आलम ये है कि लूटो, कबूलो, और तालियां बजवाओ! और देने वाला, लेने वाला—दोनों मज़े करों। क्योकि एजेंसियां तो विपक्ष के लिए है सत्ताधारियों के लिए तो वॉशिंग मशीन है। #BJP4IND #Congress Congress BJP

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क्या चाणक्य ने चक्रव्यूह रच दिया है? यूपी में शिवलिंग पर बिच्छु बैठा है। हाथ बढ़ाओ तो आस्था डसने का डर, जूता उठाओ तो संस्कार कुचलने का अपराध। यही तो चाणक्य का असली चक्रव्यूह है। यह बिच्छु कोई साधारण नहीं है। यह खुद को धर्मरक्षक बताता है, ज़हर फैलाता है और कहता है कि “मैं न होता तो शिवलिंग सुरक्षित न रहता।” समस्या यह नहीं कि बिच्छु बैठा है, समस्या यह है कि उसे बैठने दिया गया, फिर बचाया गया, और अब वह मालिक बनने लगा है। चाणक्य ने तलवार नहीं, दुविधा दी। ऐसी दुविधा जिसमें हर विकल्प या तो आस्था के खिलाफ़ दिखे या राजनीति के खिलाफ़ नज़र आए। हाथ से हटाओ तो डस ले, जूते से मारो तो शोर मचे कि “देखो, शिवलिंग का अपमान हुआ!” यही तो चाल है। बिच्छु को मारना मुद्दा नहीं, उसे अपरिहार्य बना देना असली साज़िश है। तो उपाय क्या है? बिच्छु को शहीद बनाने का अवसर मत दो। न हाथ उठाओ, न जूता दिखाओ। बस इतना उजाला कर दो कि वह खुद अपनी ज़हरिली पहचान में नंगा खड़ा दिखे। जब समाज समझ जाएगा कि शिवलिंग की रक्षा बिच्छुओं से नहीं होती, तब बिच्छु अपने आप मर जाएगा, बिना शोर, बिना तमाशे। और शिवलिंग? वह तो तब भी पवित्र था, अब भी है। जय बाबा महाकाल!

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16,952 views • 5 months ago

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दस सालों में क्या बदला? अपराधी अब ‘अपना-पराया’ है सत्ताधारी पार्टी हो या अन्य सियासी दल देखो, जनता का गुस्सा मैनेज है। अंकिता पर बीजेपी ने ‘क्लीन चिट’ ट्राई की, सेंगर पर ‘फैमिली प्रॉब्लम’ कहा। देश का मीडिया में 2012 में चीखता था, आज पीआर एजेंसी बना हुआ है, किसे ‘राष्ट्रभक्त’ बता बचाओ, किसे ‘वोटबैंक’ ठहराओ। संस्थाएँ यानि सीबीआई-ईडी राजनीतिक हथियार, न्यायपालिका पर दबाव। जनता को पुलिस का डर, सड़क पर उतरोगे तो ‘अराजक’। 2012 में सत्ता डरती थी, आज जनता डर गई। बेटी की इज्जत ‘वोटबैंक’ से नीचे गिर गई। समाज सुन्न नहीं बेजान हो चुका, ये खामोशी क्रांति की नहीं, पतन की घंटी है। Yogita Bhayana योगिता भयाना #UnnaoCaseFacts #UnnaoCase

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17,396 views • 6 months ago

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देश के बड़े व्यापारी और राजनीतिक मौसम विज्ञानी का सोनिया गांधी और राहुल गांधी को बेटे की शादी का न्यौता देने उनके घर आना, राजस्थान की पूर्व सीएम वसुंधरा राजे का पिछले दो-तीन दिनों से एकाएक सक्रिय होना, राजस्थान सरकार के कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री किरोड़ी लाल मीणा का अपने पद से इस्तीफा देना। उधर यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा अपनी पसंद का मुख्य सचिव बनाया जाना, 10 विधानसभा उप चुनाव के लिए अपने डेढ़ दर्जन मंत्रियों को प्रभारी बनाकर टिकट बांटने की तैयारी करना आदि जताता है कि माहौल में बदलाव दिखाई पड़ने लगे हैं। मीडिया संस्थानों का एनडीए शासित राज्य बिहार में गिरते पुलों की विशेष कवरेज़ करना, चुनाव के दौरान रायबरेली में एक मीडिया संस्थान के आधा दर्जन से अधिक लोगों का प्रियंका गांधी का इंटरव्यू करना और तस्वीरें खिंचवाने के लिए याचना करना आदि तमाम कारण एक ही संकेत दे रहे हैं कि आज की सरकार मोदी जी की गारंटी की नहीं बल्कि एनडीए की कमज़ोर बैसाखियों पर खड़ी सरकार है। ख़ैर हमारे जैसे छोटे पत्रकार आज भी मुख्य सत्ताधारी दल भाजपा से खुलकर सवाल पूछ रहे हैं और जब कभी सरकार बदलेगी तो उस समय की सरकार के मुख्य सत्ताधारी दल से भी कड़वे सवाल पूछेगें। जैसी डिबेट अभी कर रहे हैं तब भी करेंगे। बस आप मेन स्ट्रीम मीडिया पर नजरे बनाए रखिए।

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पुलिस की तानाशाही : जयंत चौधरी मेरठ पुलिस ने एक आदेश जारी किया जिसमें कहा गया कि सड़क पर नमाज नहीं होगी, अगर सड़क पर कोई नमाज पढ़ता हुआ मिला तो उसके खिलाफ कठोर कार्यवाही की जाएगी। मेरठ पुलिस के इस आदेश से आहत होकर राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष जयंत चौधरी ने .. "Policing towards Orwellian 1984!" यह ट्वीट किया है। मेरी अंग्रेजी बहुत कमजोर है लेकिन मैंने इसको समझने की जो थोड़ी बहुत कोशिश की तो मुझे जो अर्थ मुझे साधारण शब्दों में समझ में आता है वह यह है कि "प्रदेश में पुलिस प्रशासन की तानाशाही चल रही है! योगी जी का पुलिस प्रशासन का कंट्रोल नहीं है शायद जयंत चौधरी यही कहना चाहते हैं। लेकिन यहां सवाल यह बन जाता है कि जयंत चौधरी अगर इस आदेश का विरोध कर रहे हैं? तो वह सीधे मीडिया में आकर अपना वक्तव्य क्यों नहीं दे देते? वह सीएम योगी जी को फोन क्यों नहीं करते? वह केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जी से बात क्यों नहीं करते? पार्टी के अध्यक्ष जे पी नड्डा को शिकायत क्यों नहीं करते? जब इस प्रकार के तमाम सवाल हों तो क्या माना जाए कि जयंत चौधरी खाली नूरा कुश्ती और रस्म अदायगी कर रहे हैं?

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यूजीसी पर सुप्रीम कोर्ट का स्टे और विपक्ष की खामोशी के मायने? सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए अस्पष्ट नियमों पर रोक लगाते हुए साफ कहा कि भारत की एकता हर शैक्षणिक संस्थान में झलकनी चाहिए। लेकिन सवाल वही पुराना है कि सरकार के फ़ैसले पर विपक्ष ने 'राष्ट्रवादी' हस्तक्षेप का विरोध या समर्थन क्यों नहीं किया? जवाब साफ है कि उसे भी चुनावी फायदे की भूख है! भाजपा हो या विपक्ष की तमाम पार्टियां, सत्ता की कुर्सी पर बैठते ही सबका आचरण एक ही रंग का हो जाता है। यूजीसी को अपने इशारों पर नचाना हर दल का पुराना हथियार है। क्योंकि इन्हे असली चिंता लोकतंत्र की नहीं, वोटबैंक की है। BJP Uttar Pradesh BJP Samajwadi Party Media Cell Akhilesh Yadav Mayawati Rahul Gandhi Rashtriya Lok Dal Chandra Shekhar Aazad Dr Nishikant Dubey #GOLD #Silver

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श्री-श्री रविशंकर को एकाएक क्यों याद आए खाप चौधरी और किसान? हरियाणा में चुनावी मौसम में तमाम सियासी दलों के अलग-अलग पैंतरे और अलग-अलग सियासी तौर तरीके दिखाई पड़ रहे हैं। उसी के तहत सत्ताधारी दल भाजपा का एक नया अनोखा पैंतरा सामने आया है। प्राकृतिक खेती सीखने और हरियाणा की खाप पंचायत की कार्यशैली से दक्षिण भारत के लोगों को परिचित कराने के लिए हरियाणा से कुछ किसानों और खाप पंचायतों के कुछ लोगों को ग्रुप आज बेंगलुरु रवाना हो गया है। इस ग्रुप का श्री श्री रविशंकर के आश्रम में जाने और उनसे रूबरू होने का भी कार्यक्रम है। हरियाणा के कुछ लोग सवाल भी पूछ रहे हैं कि एकाएक बेंगलुरु में बैठे श्री श्री रविशंकर को हरियाणा के खाप चौधरियों की याद क्यों आई? अपुष्ट खबरें हैं कि रुकने और मुफ्त हवाई यात्रा का सारा इंतजाम श्री श्री रविशंकर की ओर से ही कराया जा रहा है। दरअसल सवाल उठता है कि हरियाणा में जहां इतना महत्वपूर्ण चुनाव चल रहा है, ऐसे में एकाएक किसानों और पंचायत के प्रतिनिधियों का श्री-श्री रविशंकर से बेंगलुरु जाकर मिलना इतना आवश्यक क्यों है? सूत्र बताते हैं कि हरियाणा चुनाव में भाजपा की खराब स्थिति को देखते हुए इस नए पैंतरे के तहत किसान वर्ग और खापों में तोड़फोड़ करने के मद्देनजर बेंगलुरु में किसानों के कैंप के नाम पर किसानों को हवाई जहाज से एक सप्ताह घूमने के लिए बेंगलुरु ले जाया जा रहा है। इस से समझ सकते हैं कि इस समय इस तरह के कैंप लगाने और किसानों को हवाई जहाज से बेंगलुरु ले जाने का यह आइडिया किसका होगा और इसके पीछे क्या रणनीति होगी? क्या कोई संगठन एकाएक किसानों का हितैसी बनकर खड़ा हो गया है जो उसको चुनाव के दौरान किसानों की चिंता हो गई है? इस पर हरियाणा के किसान विचार कर रहे हैं। उनका कहना है कि आज उनको किसान मसीहा चौधरी छोटूराम की वह बात याद आ रही है कि : "हे किसान पहले तो बोलना सीख ले और दुश्मन को पहचानना सीख ले।"

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भाजपाई जाटों के मुंह पर कृष्ण जानू का करारा तमाचा? - के. पी. मलिक राजनीति में अक्सर "मौन" को "सहमति" माना जाता है। लेकिन जब अपनी ही पार्टी के भीतर से सत्य और साहस की आवाज़ उठे, तो यह केवल मतभेद नहीं, बल्कि नीति और चरित्र पर गंभीर सवाल होता है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और राजस्थान प्रदेश प्रवक्ता कृष्ण कुमार जानू ने जिस स्पष्टता और कठोरता के साथ पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक को राजकीय सम्मान से वंचित किए जाने और पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को फेयरवेल नहीं दिए जाने की आलोचना की है, वह भाजपा में लंबे समय से दबाई जा रही अंतर्विरोध की आवाज़ को पहली बार सार्वजनिक मंच पर ले आती है। पूर्व राज्यपाल स्वर्गीय सत्यपाल मलिक जैसे स्पष्टवक्ताओं को सत्ता के गलियारों में "अप्रिय" माना जाता है, लेकिन उनके योगदान को नकारना या अपमानित करना केवल व्यक्ति का नहीं, पूरे जाट समाज की चेतना और मूल्य पर चोट है। भाजपा से जुड़े कुछ जाट नेताओं की चुप्पी और अवसरवादिता इस अपमान को और भी गहरा बनाती है। यह कहना कि "जाटों का इतना अपमान पहले कभी नहीं हुआ" केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं है, यह एक ऐतिहासिक चेतावनी भी है। जाट समुदाय ने सदैव अन्याय के विरुद्ध मुखर होकर अपनी पहचान बनाई है। आज यह परंपरा खतरे में है, और उसकी सबसे बड़ी वजह जाट समाज के भीतर पैदा हुई राजनीतिक चाटुकारिता की संस्कृति है। पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को हटाए जाने के बाद, कुछ नेता "आपदा में अवसर" तलाशने में जुटे हैं। लेकिन मेरा मानना है कि "इन नेताओं का हश्र जगदीप धनखड़ और सत्यपाल मलिक से भी बुरा होगा" यह एक गहरी बात है। मेरा यह संदेश उन लोगों के लिए है जो राजनीतिक चुप्पी को वफादारी समझते हुए आत्मगौरव को भूल बैठे हैं। भाजपा जैसी पार्टी, जो खुद को राष्ट्रवाद और संस्कृति का संरक्षक बताती है, अगर अपने ही वरिष्ठ नेताओं को इस तरह से दरकिनार करे, तो यह विचारणीय है कि वह दूसरों के सम्मान की कितनी परवाह करती होगी। आज भाजपा से जुड़े या सत्ता की खीर और मलाई खा रहे जाट समाज के नेताओं के लिए यह आत्ममंथन का समय है। यह आंकलन करने की आवश्यकता है कि यदि भाजपा के भीतर से ऐसी स्वतंत्र आवाज़ें उठने लगी हैं, तो यह न केवल जाट समाज बल्कि पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शुभ संकेत है। अब समय है कि जाट समाज अपने भीतर के आत्मघाती मौन को तोड़े और अपने इतिहास, अस्मिता और आत्मसम्मान की परंपरा को पुनर्जीवित करे। क्योंकि अगर आज यह चेतना नहीं जागी, तो वह दिन दूर नहीं जब राजनीतिक उपयोगिता समाप्त होते ही समाज के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया जाएगा। इसलिए यह समझना होगा कि कृष्ण जानू की आलोचना कोई मामूली बयान नहीं, यह भाजपा की सत्ता-केन्द्रित राजनीति में डूबी जाट राजनीति के लिए एक करारा तमाचा है। अब यह जाट समाज पर निर्भर है कि वह अपने स्वाभिमान की रक्षा करता है या सुविधाजनक चुप्पी ओढ़ लेता है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं) Satyapal Malik Sakshee Malikkh Ramandeep Singh Mann Pushpendra Singh BJP Uttar Pradesh #satypalmalik #SatyaPalMalik #VicePresident #VoterList

K P Malik

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