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क्या बुर्क़ा पर खुली बहस होनी चाहिए ?

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मैं सोच रहा था कि संविधान पर बहस होगी। हम सब बहुत खुश थे कि बिना मनमुटाव के बहस होगी, लेकिन मैं देख रहा हूं दोनों सदनों में पूरे समय जवाहरलाल नेहरू जी, इंदिरा गांधी जी, राजीव गांधी जी और मनमोहन सिंह जी को भला-बुरा कहा गया। ऐसा लग रहा है कि ये चर्चा संविधान पर है ही नहीं.. सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप है। आज क्या होना है, आगे क्या होना चाहिए, इस पर कोई बात ही नहीं है। • क्या नेहरू जी ने कोई काम नहीं किया? • क्या इंदिरा जी ने कोई काम नहीं किया? • क्या लाल बहादुर शास्त्री जी ने कोई काम नहीं किया? • क्या अटल बिहारी वाजपेई जी ने कोई काम नहीं किया? सुबह से शाम तक पूरे दो दिन की बहस सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप में चली गई। गंभीर बहस को हमने गाली-गलौज की बहस बना दिया है। हमने पुराने प्रधानमंत्रियों की खामियों पर चर्चा की, हमने उनकी कमियों पर चर्चा की। हमने सिर्फ उनकी आलोचना करने पर ध्यान दिया। 60 साल पहले किसने क्या निर्णय लिया, किन परिस्थितियों में लिया, वो भी हमें सोचना पड़ेगा। सभी प्रधानमंत्रियों ने मिलकर देश के लिए विकास के कई काम हुए। इसके अलावा, मैं बार-बार कहता हूं कि ज्यूडिशरी में भी रिफ़ॉर्म होना चाहिए, क्योंकि हर चीज में रिफॉर्म हो रहा है। मेरी मांग है कि संविधान पर दोबारा चर्चा होनी चाहिए, लेकिन वो आरोप-प्रत्यारोप वाली, बल्कि गंभीर चर्चा होनी चाहिए। : राज्य सभा में Rajeev Shukla जी

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