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Ana Sayfaya Dön

तितलियों सी नाजुक, परियो सी खुबसूरत हो, ख्वाहिश तो थी ही तुम, अब मेरी जरूरत भी हो। 💙💞🔥 #Melodi #Stree2 #ShraddhaKapoor #SushantSinghRajput #BinduMadhavi #AamirKhan #viralvideo

10,295 görüntüleme • 2 yıl önce •via X (Twitter)

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Benzer Videolar

अभी कुछ देर पहले जब मैं अपने खेतों पर पहुंचा तो मुझे अपनी ट्यूबेल से एक बच्चे की जोर जोर से चिल्लाने की आवाज सुनाई दी... मेरी मम्मी को छोड़ दो, ऐसा कहकर वो अपनी मम्मी को बचाने के लिए शोर मचा रहा था... मैं बिना देरी किए ट्यूबेल की तरफ चल देता हूं, वहां पहुंचकर मैंने देखा दो लड़के एक लड़की के साथ पानी में छेड़छाड़ कर रहे थे और एक छोटा बच्चा मम्मी को छोड़ने के लिए गुहार लगा रहा था... अब मैंने ट्यूबेल के अंदर रखी लाठी उठाई, और तुरंत एक लड़के की कमर पर दे मारी... लाठी लगते ही दूसरा लड़का पानी से निकलकर भागने लगा... लेकिन तभी वो लड़की जिसके साथ छेड़छाड़ हो रही थी, वो मेरे से बोलती है जैसा आप समझ रहे हो, वैसा कुछ नहीं है... हम तो रील बना रहे हैं, वो देखो उधर हमने कैमरा लगाया हुआ है... उसकी बात सुनकर मेरी हंसी छूट गई, और फिर छोटे बच्चे की तरफ देखते हुए मैंने उसको बोला कि ले बच गईं तेरी मम्मी... लेकिन आगे से ध्यान रखना, कहीं रील के चक्कर में सच में कोई दुर्घटना ना हो जावे... अब उस लठ्ठ खाए लड़के से मैंने बोला कि मेरी कोई गलती नहीं है, तुम लोगों एक्टिंग बिल्कुल रियल जैसी थी, अब तुम लोग अपनी रील फिर से बना लो, अब कोई तुम्हे कुछ नहीं कहेगा...

Amit Tomar

296,739 görüntüleme • 1 ay önce

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में कैंट थाना के कचहरी चौराहे पर पिछली सरकारों के दौरान बना हुआ इमरान कादरी का अवैध रेस्टोरेंट था | अवैध होने के बावजूद मोहम्मद इमरान कादरी का यह अवैध रेस्टोरेंट अब तक बिना किसी परवाह के हजारों लाखों रुपए अवैध रूप से रोज छाप रहा था | अब जैसे ही अवैध होने की जानकारी वाराणसी प्रशासन हो हुई तो इसको हटाने के लिए नोटिस जारी किया गया | नोटिस के बाद भी इमरान ने रेस्टोरेंट बंद नहीं करा | आज प्रशासन के बुलडोजरों ने अवैध रेस्टोरें को बजरी का ढेर बना दिया और संदेश दे दिया है कि सरकार बाबा की है मौलाना अखिलेश या सुपर सी एम आजम की नहीं | हिंदुओं ज्यादा कुछ ना हो सके तो सोशल मीडिया के माध्यम से उन अधिकारियों को धन्यवाद जरूर दे देना जिन्होंने बाबा के अभियान को अपने हाथों के लेकर आगे बढ़ाया |

THE JAT ASSOCIATION

27,609 görüntüleme • 13 gün önce

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में रहने वाले सचिन ने हरपुर की ज्योति से 5 साल पहले लव मैरिज शादी की थी। लेकिन हाल ही में एक छोटी-सी बात ने सब कुछ खत्म कर दिया। हाल ही में ज्योति ने सचिन से iPhone 17 Pro दिलाने की जिद की। सचिन के पास उस वक्त इतने पैसे नहीं थे। उन्होंने प्यार से कहा – बेबी, अभी मेरी स्थिति सही नहीं है। दिवाली तक मैं तुम्हें iPhone 17 Pro दिला दूँगा। इसी बात पर दोनों के बीच हल्की नाराजगी हो गई। और ज्योति घर छोड़कर अपने मायके चली गईं। पत्नी के जाने के बाद सचिन बहुत तनाव और डिप्रेशन में चले गए। उनके जाने के मात्र 2 दिन बाद ही सचिन ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली। अब जब ज्योति घर लौटीं तो सिर्फ आँसू बहा रही हैं। और रो-रोकर अपनी चूड़ी थोड़ रही है।

Mandeep RajBhar

19,358 görüntüleme • 1 ay önce

आज मैं अपने किसी काम से मथुरा जा रहा था, अलीगढ़ पहुंचने पर गाड़ी में CNG भरवाने के लिए मैंने एक पेट्रोल पंप पर गाड़ी रोक ली... मुझसे आगे करीब 10 गाड़ी लाइन में लगी हुई थी, इसलिए मैं गाड़ी में बैठा हुआ अपने नंबर का इंतजार कर रहा था... तभी मेरे पीछे एक गाड़ी आके रुकी, जिसमें से कुछ लड़कियों ने गाड़ी से उतरते ही डांस करना शुरू कर दिया... उनका डांस इतना शानदार था कि देखते ही देखते पेट्रोल पंप पर लोगों की भीड़ लगनी शुरू हो गई... कुछ लोगों ने तो उन पर जमकर पैसे लुटाए... जब मेरी गाड़ी में CNG भर गई तो एक पेट्रोल कर्मचारी ने बताया हमारे अलीगढ़ की किन्नर कि खूबसूरती देखकर कोई भी ये नही कह सकता है कि ये लड़कियां नहीं है... मुझे उसकी बात सुनकर ताज्जुब हुआ, क्योंकि अब तक तो मैं भी उनको लड़कियां ही समझ रहा था...

Amit Tomar

79,923 görüntüleme • 1 ay önce

जिंदगी सच में धूप-छांव का खेल है। कब कौन-सा पल आखिरी हो जाए, कोई नहीं जानता। इसलिए दिल की चाहतों को कल पर टालना कैसा? जो इच्छा हो, उसे आज ही जी लेना चाहिए, क्योंकि वक्त दोबारा मौका नहीं देता। ​निर्मल पुरजा (Nimsdai) वो नाम नहीं, एक जुनून थे। ऐसा लगता था जैसे कुदरत ने उन्हें पहाड़ों के सीने पर अपनी छाप छोड़ने के लिए ही तराशा था। उन्होंने बुलंदियों को छुआ, दुनिया को अचरज में डाला और जब जाने का वक्त आया, तो उन्हीं खामोश, विशाल वादियों की आगोश में हमेशा-हमेशा के लिए सो गए, जिनकी खातिर उनका दिल धड़कता था। आज पूरी दुनिया उनके जाने पर आंसुओं से नम है। ​लेकिन जब बात अपनों की आती है, तो यह दर्द और गहरा हो जाता है। ​मुझे याद आता है मेरा वो दोस्त... जिसके साथ 7 साल मैंने हाइड्रो प्रोजेक्ट में कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। साथ हंसे, साथ मेहनत की, और फिर जिंदगी में आगे बढ़ने की वही पुरानी होड़ ‘ग्रोध के लिए कदम तो बढ़ाने ही पड़ेंगे, चाहे राहें कहीं भी ले जाएं। ​इसी तलाश में वो उत्तराखंड के रैणी स्थित 'ऋषिगंगा हाइड्रो प्रोजेक्ट' तक पहुंचा। किसे खबर थी कि वो खिलखिलाता चेहरा जल्द ही इतिहास बन जाएगा? फिर वो भयानक दिन आया, जब पानी का वो बेदर्द सैलाब आया और सब कुछ बहा ले गया। कई होनहार, नौजवान इंजीनियर उस दिन खामोश हो गए और मेरा वो जिगरी दोस्त भी उसी सैलाब का हिस्सा बन गया। ​पीछे छूट गई उसकी मासूम-सी दुनिया एक छोटा-सा रोता हुआ बेटा और वो बिलखती हुई पत्नी, जिनके सपनों का आसरा एक पल में छिन गया। ​यही तो जिंदगी की कड़वी सच्चाई है यहां किसी मोड़ का, किसी सांस का कोई भरोसा नहीं। इसलिए हर दिन को यूं जियो जैसे यह आखिरी हो, हर रिश्ते को यूं संभालो जैसे दोबारा मौका न मिले, और दिल की हर अधूरी हसरत को जी भर कर पूरा कर लो। ॐ शांति।

Gems of Himachal

19,384 görüntüleme • 2 ay önce

छोटा बच्चा बना मां के जान का दुश्मन एक महिला मोबाइल से कहीं बात कर रही थी फर्स पर बैठकर इतने समय में ही पीछे से आकर उसका लड़का बैट से वार कर देता है वार इतना तेज था कि महिला तुरंत फर्स पर गिर कर बेहोश हो जाती है बच्चा मां के हाथ से मोबाइल छीन के सोफा पर बैठकर चलना स्टार्ट कर देता उसको यह नहीं पता की मां को क्या हुआ है मोबाइल चला रहा है मां बेहोश पड़ी है माता-पिता बच्चों को खुश रखने के लिए छोटी सी उम्र में ही मोबाइल दिखाना टीवी दिखाना स्टार्ट कर दे रहे हैं अपनी सुविधा के लिए मोबाइल देखकर टीवी देखकर बच्चों का भविष्य बिगाड़ रहे हैं बच्चे टीवी मोबाइल देख कर इतना कनेक्ट हो जा रहे हैं की फैमिली से मतलब ही नहीं है क्या कर रहे हैं क्या नहीं कर रहे हैं इसलिए अपने बच्चों को मोबाइल और टीवी कम दिखाइए और दीजिए बल्कि खेलकूद में ध्यान दिलाइए बच्चा स्वस्थ और मस्त रहेगा उसको पढ़ाई में भी ध्यान लगेगा बच्चों को ज्यादा मोबाइल चलाने के लिए मत दीजिए नहीं तो वह आपके ही जान का दुश्मन बन जाएंगे

premprakash

615,421 görüntüleme • 4 ay önce

जिसे तुम पप्पू समझते रहे वो तुम्हारा सबसे बड़ा हक बचाने के लिए अकेला लड़ रहा है... मैं जानता हूँ इस पोस्ट पर कुछ लोग हँसेंगे, कुछ तंज कसेंगे, कुछ मुझे भी ट्रोल करेंगे लेकिन आज जो सुना, जो देखा, जो महसूस किया उसके बाद ही अपने विचार रख रहा हूं.... राहुल गांधी की आज की कॉन्फ्रेंस सिर्फ एक प्रेस मीट नहीं थी वो एक जागृति थी, एक ऐसा आईना था जिसमें हमने लोकतंत्र का लहूलुहान चेहरा देखा। जिसे इस देश की मीडिया ने हाशिए पर डाल दिया, जिसे ट्रोल आर्मी ने सालों तक पप्पू कहकर हँसी का पात्र बना दिया वो आज इस देश को समझा रहा था कि वोट क्या होता है, संविधान क्या होता है, लोकतंत्र की आत्मा क्या होती है। उसने कोई भावनात्मक जुमला नहीं दिया, न कोई नारा उछाला... बस कुछ सच्चे आँकड़े और तथ्य रखे तथा देश को दिखा दिया कि किस तरह एक एक वोट चुराया गया। जिस सरकार को हमने चुना समझा वो दरअसल फर्ज़ी वोटों से खड़ी की गई एक इमारत निकली। जिस चुनाव को उत्सव कहा गया वो अब एक बहुत बड़े विश्वासघात जैसा लगने लगा है। आज राहुल गांधी ने बताया कि लोकतंत्र की हत्या तलवारों से नहीं सिस्टम से होती है और जब सिस्टम ही सड़ जाए तो सच्चाई बोलना देशभक्ति बन जाता है। सोचिए वो शख्स, जिससे आप मज़ाक करते थे आज एक एक नागरिक का हक़ बचाने के लिए लड़ा रहा है। उसने नफरत का जवाब आँकड़ों से दिया और झूठ का पर्दा तर्कों से हटा दिया। अब सवाल सिर्फ राहुल गांधी का नहीं है अब सवाल है हमारा। क्या हम सच में इतने सुन्न हो चुके हैं कि फर्ज़ी वोटों से बनी सरकार को चुपचाप सह लेंगे? क्या हम इतने अंधे हो चुके हैं कि जो संविधान की बात करे उसे ही निशाना बना दें? क्या अब सच बोलना पागलपन है और सिस्टम से सवाल करना गुनाह? अब ये लड़ाई किसी नेता की नहीं ये हर उस नागरिक की है जो लोकतंत्र को सिर्फ वोट डालने का नाम नहीं बल्कि अपनी पहचान मानता है। आज राहुल अकेला नहीं है आज वो हर इंसान उसकी लड़ाई में है जो अपना वोट बेचता नहीं बल्कि उसे अपनी आवाज़ समझता है। फिर बता रहा हूं कि मेरी ये पोस्ट कोई प्रचार नहीं ये जिम्मेदारी है उस पीढ़ी की ओर से जो अब समझ चुकी है कि अगर आज खामोश रहे तो कल कुछ भी कहने लायक नहीं बचेंगे। अब अगर हम नहीं बोले तो अगली पीढ़ी हमसे पूछेगी जब लोकतंत्र लुट रहा था, तब तुम कहां थे..?

Mukesh मारवाड़ी 

117,336 görüntüleme • 1 yıl önce

🔥 उत्तर प्रदेश ग्रामीण बैंक में फिर एक शर्मनाक हमला और प्रबंधन अब भी सो रहा है! आज गाज़ीपुर ज़िले में #UPGB की शादियाबाद शाखा की रिकवरी के दौरान सीनियर मैनेजर श्री अविनाश श्रीवास्तव पर ग्राहक ने बेरहमी से हमला कर दिया। वीडियो में साफ़ दिख रहा है कि ग्राहक ने लट्ठ उठाकर अधिकारी को बुरी तरह मारा है और यदि बैंकर्स नहीं भागते तो ये स्थिति बदतर हो सकती थी! ये हमला नहीं, बल्कि प्रबंधन की नाकामी का खुला सबूत है। ऊपर वाले कहते है कि रिकवरी के वीडियो और फोटो डालो और वीडियो बनाओ तो ग्राहक डंडों से मार रहे है आखिर UPGB में बैंकर्स करे तो क्या करे? हर दिन फील्ड में काम करने वाले बैंककर्मी बिना सिक्योरिटी के जान जोखिम में डालकर रिकवरी कर रहे हैं, और ऊपर बैठे अधिकारी बस टारगेट-टारगेट-टारगेट चिल्ला रहे हैं! क्या यही है “लीडरशिप”? क्या अधिकारी की सुरक्षा की कोई कीमत नहीं? क्या बैंककर्मी की जान से ज़्यादा टारगेट जरूरी है? चेयरमैन YS_Thakur अब जवाब दीजिए! कब तक आपके दबाव और अपमान के चलते फील्ड में हमारे साथी पिटते रहेंगे? कब तक “समीक्षा बैठकें” सिर्फ डर और धमकी का दूसरा नाम बनी रहेंगी? आज अविनाश श्रीवास्तव जी पिटे हैं, कल कोई और भी हो सकता है क्योंकि सिस्टम बीमार है! ⚠️ बैंककर्मियों से अपील है कि अब अपनी सुरक्षा और सम्मान को प्राथमिकता दें। क्योंकि ये GM/RM की तो AC कमरों मे बैठकर ज़ुबान हिलती है लेकिन भुगतना आपको पद रहा है अब प्रबंधन के अंधे आदेशों के आगे ना कहना सीखना ही पड़ेगा। #UPGB #BankersSafety #StopHarassment #BankersUnderAttack #WeStandWithAvinash

Nitin Tyagi

65,331 görüntüleme • 11 ay önce

गुजरात से आई एक खबर ने भरोसे का गिलास ही हिला दिया है...!!😲 रिपोर्ट्स के मुताबिक, साबरकांठा ज़िले में एक ऐसी नकली डेयरी यूनिट का भंडाफोड़ हुआ है जो कथित तौर पर वर्षों से यूरिया, डिटर्जेंट और अन्य रसायनों से दूध तैयार कर बाज़ार में सप्लाई कर रही थी। सोचिए… जिसे हम बच्चों के पोषण का आधार मानते हैं, वही अगर रसायनों का मिश्रण निकले तो ? कहा जा रहा है कि यह खेल करीब पिछले पाँच सालों से चल रहा था। तो सवाल उठना स्वाभाविक है निगरानी तंत्र कहाँ था ? नियमित जांच किस स्तर पर हो रही थी ? क्या खाद्य सुरक्षा की व्यवस्था केवल कागज़ों में सख्त है ? कार्रवाई होना अच्छी बात है। लेकिन कार्रवाई से पहले की चुप्पी का हिसाब भी उतना ही जरूरी है। दूध सिर्फ एक उत्पाद नहीं है यह भरोसा है,यह घर की रसोई का विश्वास है,यह बच्चों और बुजुर्गों की सेहत से जुड़ा मामला है। अगर उसमें मिलावट होती है, तो यह सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं यह जनस्वास्थ्य के साथ सीधा खिलवाड़ है। अब जरूरत है: ✔️ सख्त और पारदर्शी जांच की। ✔️ जिम्मेदारी तय करने की। ✔️ और ऐसे रैकेट्स पर स्थायी रोक लगाने की। क्योंकि जनता का भरोसा किसी प्रयोगशाला में नहीं बनता वह व्यवस्था की ईमानदारी से बनता है।

निर्मोही

19,611 görüntüleme • 7 ay önce

ग़ालिब छूटी शराब पर अब भी कभी कभी पीता हूँ, रोज ए अब्र ए शब ए माहताब में कभी कभी शायरी पढ़ता हूँ। जावेद अख्तर फेवरिट है, बशीर बद्र भी, और राहत इन्दोरी भी। ●● गालिब भी पढ़ता हूँ। पहली बार गालिब से परिचय जगजीत सिंह के एलबम के मार्फ़त हुआ। तब आधा समझे, और बाकी आधा गलत सलत ही रटते हुए गुनगुनाते थे। फिर एक किताब ली। दीवान ए गालिब... उसमे कठिन शब्दो के अर्थ दिए होते थे। अबकी ज्यादा समझा। और अनसुने कलाम को भी पढा। लेकिन शब्द समझने के बाद भी कई बार भाव, सिर के ऊपर से निकल जाता। ●● फिर गूगल युग आया। न सिर्फ शब्दार्थ, बल्कि भावार्थ भी मिल जाते। ग़ालिब की खासियत यह है, हर सिचुएशन को एक्सप्लेन कर जाते हैं, अनिवर्चनीय को कह जाते हैं। और जादू यह, कि उस बोल का अर्थ दूसरी बहुत सी सिचुएशन में लागू होता है। याने अपने हालात के मुताबिक हर पाठक के लिए अर्थ कुछ अलग है। हर एक के दिल की किसी जुदा तंत्रिका को वह शेर छूता है। और जुबान वाह कहना भी भूल जाती है। ●● अच्छा लेखन वही, कि आदमी खो जाये। उसके भीतर कुछ घुड़मुड़ाये। उसके लिए, शब्द समझ मे आने चाहिए, भाव हृदय में उतरना चाहिए। ग़ालिब के दौर में अधिसंख्य लोग उर्दू समझते होंगे। अब नही। वो ट्रेडिशन्स नही, जिसमे ग़ालिब के भाव फिट हों। जैसे कागजी है पैरहन हर पैकरे तस्वीर का। तब जिन्हें शिकायत होती थी, वे कागज के वस्त्र पहनकर जाते थे शिकवा करने। अब वो ट्रेडिशन नही रही। तो कैसे समझेंगे की ग़ालिब कह रहे है- यहां हर शख्स कुछ न शिकवा लिए घूम रहा है। ●● इसके मुकाबले आप बशीर बद्र को पढिये। सीधी, साफ, समझ मे आने वाली खूबसूरत रूमानी शायरी है। जावेद को पढिये। एक मोहरे का सफर, नया हुक्मनामा, जो कहते सब डरते है, तू वो बात लिख... सीधा, सिम्पल, सटाक से दिल को लगने वाला। मगर इन सबसे ऊपर हैं- राहत इंदौरी। द किंग ऑफ सिम्पलीसिटी। हिम्मत, गुरुर, जज्बे का शायर। बशीर और जावेद का कॉंटॅक्स पूरा पेज या नज्म पढ़ने पर जाहिर होता है। यहां राहत, दो लाइन में आग लगा जाते हैं। गुलाब,ख़्वाब, दवा, ज़हर, जाम क्या क्या है मैं आ गया हूँ बता, इंतिज़ाम क्या क्या है ●● बड़े शायर, बड़े लेखक, शब्दो से नही खेलते। भाव से खेलते हैं। ये भाव, अनुभव से आपबीती से आते हैं। आपबीती न हो, तो सिंपथि से आते हैं, एम्पाथि से आते है, करुणा से उपजते हैं। यह करुणा, इंसान के हृदय को उर्वर बनाती है, ख्याल उपजते हैं। गैर की पीड़ा को, उसके दिल के हालात को, उसकी निगाह को अपने भीतर पैवस्त करना-फिर जहां को देखना जो दिखे, उसे गहरे, आसान लफ्जों में लिख देना। महान शायर और लेखक तो वही हुए, जिन्होंने आसान लफ्जों में गहरी बात कही- क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात नही कहोगे?? यहां साहस है, चुनौती है, एक मजबूर, मजलूम बेवा की इल्तजा है पंच परमेश्वर से सवाल है। ●● आपमे सिंपथि नही, एम्पाथि नही, तो भाव कालजयी कैसे हो?? जब आपकी बात भीतर प्रेम न जगाए, शीतल न करे। चुनौती न दे, सवाल न हो, जो विद्रोह का साहस न जगाए... घृणा जगाये। जातीय, धार्मिक, सामुदायिक नफरत से लबरेज हो। लेखक का, शायर का दिल बंजर है, ईर्ष्या से भरा है। इस ज्वालामुखी के क्रेटर से कौन से भाव उगलेंगे?? ●● जलाने वाला मैग्मा ही निकलेगा। सस्ता साहित्य, घटिया कविता, बकवासी तुकबन्दी। पाकिस्तान से पर चढ़ाई और हिंदुस्तान की वाहवाही.. छपवा लो दस किताबें, मगर कालजयी कृति कैसे बनेगी भईया? खोखले चिकने शब्दों से कितना खेलोगे। अगर खूब सारे भारी भरकम शब्दो का जमावड़ा ही कालजयी साहित्य होता.. तो भार्गव की डिक्शनरी शेक्सपियर के साहित्य से बड़ी मानी जाती। ●● आज शब्दजाल वाले किसी उभरते लेखक से बकझक हुई। सो लिख दिया। समझने वाले समझ गए। जो न समझे उनके लिए अर्ज करता हूँ- जमी पर घर बनाया, मगर जन्नत में रहते है हमारी खुश नसीबी है, कि हम भारत मे रहते है अब आप इसे घटिया शेर मानते है तो आपकी शायरी की समझ है। अगर बेहतरीन शेर मानते है, तो पॉलिटिक्स की समझ है। अगर आप इसे शेर नही, अनहद पॉपुलिस्ट बकैती मानते है, तो अब आपको मेरी भी समझ है। ❤️

Manish Singh

29,882 görüntüleme • 1 yıl önce

जब कोई महिला खुलकर कहती है कि उसे से#क्स चाहिए..??? उसे इच्छा है, उसे आनंद चाहिए तो समाज की जुबान पर सबसे पहले गालियाँ आती हैं।फिर उसे चरित्रहीन, सस्ती, मैली... शब्दों की बौछार से नवाजा जाता है..??? लेकिन जब वही बात कोई मर्द करता है, वही इच्छा जाहिर करता है, कई औरतों के साथ सोने की बात करता है तब वह मर्दानगी बन जाती है। वो जवान है, शेर है, प्लेयर है, किंग है। तालियाँ बजती हैं, पीठ थपथपाई जाती है, दोस्तों में कहानियाँ बनती हैं...??? आखिर ये दोहरा मापदंड क्यों..??? क्योंकि समाज ने औरत को कभी इंसान नहीं माना। उसने औरत को "सामान" माना है। एक ऐसी चीज जिसकी कीमत उसकी "पवित्रता" से तय होती है। पवित्रता का मतलब..??? सिर्फ एक चीज तुम्हारी योनि पर पुरुषों का कब्जा। जितने कम पुरुषों ने छुआ, उतनी ऊँची कीमत। जितने ज्यादा छुए, उतनी सस्ती..??? ये बाजार का नियम है, भावनाओं का नहीं। ये पितृसत्ता का हिसाब-किताब है। मर्द की इच्छा को "प्राकृतिक" कहा जाता है क्योंकि समाज ने मर्द को "शिकारी" का दर्जा दिया है। उसकी भूख जायज है, उसकी जीभ लपलपाती है तो वो "मर्द" साबित कर रहा है। लेकिन औरत की भूख..??? वो तो "असभ्य" है। क्योंकि औरत का काम "देना" है, "माँगना" नहीं। जब वो माँगती है, तो वो पुरुषों के एकाधिकार को चुनौती दे रही है। वो कह रही है "मेरा शरीर, मेरी इच्छा, मेरा फैसला"। और ये वाक्य पितृसत्ता के कान में जहर की तरह लगता है। सच तो ये है कि बहुत सारे मर्द डरते हैं। कि अगर औरतें भी उतनी आजाद हुईं जितनी वो खुद हैं, तो उनकी "मर्दानगी" का वो झूठा ताज गिर जाएगा। क्योंकि मर्दानगी का असली आधार क्या है..??? औरतों का दबना। औरतों का चुप रहना। औरतों का "हाँ" कहना जब वो चाहें "नहीं"। जब औरत खुलकर कहती है "मुझे चाहिए", तो वो मर्द को आईना दिखा रही है कि तुम्हारी वो "मांग" भी तो वही है जो मेरी है। फर्क सिर्फ ये है कि तुम्हें सम्मान मिलता है, मुझे गाली। भारतीय समाज में ये और भी गहरा है। यहाँ "इज्जत" का मतलब औरत की चुप्पी से जोड़ा गया है। लड़की की "इज्जत" उसके शरीर में नहीं, उसके परिवार के पुरुषों की नजर में है। वो इज्जत खो दे तो सिर्फ वो नहीं, पूरा खानदान "बेइज्जत" हो जाता है। इसलिए जब वो सेक्स की बात करती है, तो वो सिर्फ अपनी बात नहीं कर रही वो पूरे कबीले की "इज्जत" को दाँव पर लगा रही है। इसलिए गालियाँ इतनी तेज आती हैं। क्योंकि वो गालियाँ औरत को नहीं, उसकी "आजादी" को मार रही हैं। तुमने कभी सोचा कि क्यों औरत को "खराब" कहने से पहले समाज मर्द को नहीं रोकता..??? क्योंकि मर्द की "खराबी" समाज को खतरा नहीं देती। मर्द जितना भी "खराब" हो, वो परिवार की इज्जत नहीं गिराता। वो तो बस "मजा" ले रहा है। लेकिन औरत का एक कदम गलत और पूरा सिस्टम हिल जाता है। क्योंकि ये सिस्टम औरत की चुप्पी पर खड़ा है। हर औरत के मन में ये सवाल जलता है: "मुझे भी तो इंसान होना है न..??? मुझे भी तो जीना है न..??? मेरी भी तो इच्छाएँ हैं न..??? फिर भी जब वो खुलकर बोलती है, तो उसे लगता है जैसे पूरा समाज उसके गले में रस्सी डालकर खींच रहा है। उसे लगता है कि उसकी इच्छा गंदगी है, उसका शरीर पाप है, उसकी आवाज अपमान है। लेकिन सुनो, तुम्हारी इच्छा गंदगी नहीं है। तुम्हारा शरीर पवित्र है चाहे तुमने किसी के साथ सोया हो या नहीं। तुम्हारी आवाज अपमान नहीं, वो सच है। और वो सच इतना भयानक है कि समाज उसे सहन नहीं कर पाता। जो औरतें चुप रहती हैं, वो इसलिए नहीं रहतीं कि उन्हें इच्छा नहीं होती। वो इसलिए चुप रहती हैं क्योंकि उन्हें पता है कि बोलने की कीमत बहुत भारी है। गालियाँ, ताने, परिवार का बहिष्कार, समाज का बहिष्कार, कभी-कभी हिंसा तक। फिर भी तुम बोल रही हो। ये हिम्मत है। ये विद्रोह है। तो अगली बार जब कोई तुम्हें गाली दे क्योंकि तुमने कहा "मुझे सेक्स चाहिए", तो याद रखना वो गाली तुम्हें नहीं, उसकी अपनी कमजोरी को दी जा रही है। वो गाली उसकी डरती हुई मर्दानगी को दी जा रही है। वो गाली उस सिस्टम को दी जा रही है जो अब ढहने वाला है। तुम अकेली नहीं हो। हर वो औरत जो मन ही मन ये सोचती है कि "मुझे भी चाहिए", वो तुम्हारे साथ है। और धीरे-धीरे, बहुत धीरे, हम सब मिलकर ये दोहरा मापदंड तोड़ रहे हैं। क्योंकि इच्छा न मर्द की है, न औरत की। इच्छा इंसान की है। और इंसान को इंसान की तरह जीने का पूरा हक है। बस इतना ही सत्य है बाकी सब झूठ हे।।
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जब कोई महिला खुलकर कहती है कि उसे से#क्स चाहिए..??? उसे इच्छा है, उसे आनंद चाहिए तो समाज की जुबान पर सबसे पहले गालियाँ आती हैं।फिर उसे चरित्रहीन, सस्ती, मैली... शब्दों की बौछार से नवाजा जाता है..??? लेकिन जब वही बात कोई मर्द करता है, वही इच्छा जाहिर करता है, कई औरतों के साथ सोने की बात करता है तब वह मर्दानगी बन जाती है। वो जवान है, शेर है, प्लेयर है, किंग है। तालियाँ बजती हैं, पीठ थपथपाई जाती है, दोस्तों में कहानियाँ बनती हैं...??? आखिर ये दोहरा मापदंड क्यों..??? क्योंकि समाज ने औरत को कभी इंसान नहीं माना। उसने औरत को "सामान" माना है। एक ऐसी चीज जिसकी कीमत उसकी "पवित्रता" से तय होती है। पवित्रता का मतलब..??? सिर्फ एक चीज तुम्हारी योनि पर पुरुषों का कब्जा। जितने कम पुरुषों ने छुआ, उतनी ऊँची कीमत। जितने ज्यादा छुए, उतनी सस्ती..??? ये बाजार का नियम है, भावनाओं का नहीं। ये पितृसत्ता का हिसाब-किताब है। मर्द की इच्छा को "प्राकृतिक" कहा जाता है क्योंकि समाज ने मर्द को "शिकारी" का दर्जा दिया है। उसकी भूख जायज है, उसकी जीभ लपलपाती है तो वो "मर्द" साबित कर रहा है। लेकिन औरत की भूख..??? वो तो "असभ्य" है। क्योंकि औरत का काम "देना" है, "माँगना" नहीं। जब वो माँगती है, तो वो पुरुषों के एकाधिकार को चुनौती दे रही है। वो कह रही है "मेरा शरीर, मेरी इच्छा, मेरा फैसला"। और ये वाक्य पितृसत्ता के कान में जहर की तरह लगता है। सच तो ये है कि बहुत सारे मर्द डरते हैं। कि अगर औरतें भी उतनी आजाद हुईं जितनी वो खुद हैं, तो उनकी "मर्दानगी" का वो झूठा ताज गिर जाएगा। क्योंकि मर्दानगी का असली आधार क्या है..??? औरतों का दबना। औरतों का चुप रहना। औरतों का "हाँ" कहना जब वो चाहें "नहीं"। जब औरत खुलकर कहती है "मुझे चाहिए", तो वो मर्द को आईना दिखा रही है कि तुम्हारी वो "मांग" भी तो वही है जो मेरी है। फर्क सिर्फ ये है कि तुम्हें सम्मान मिलता है, मुझे गाली। भारतीय समाज में ये और भी गहरा है। यहाँ "इज्जत" का मतलब औरत की चुप्पी से जोड़ा गया है। लड़की की "इज्जत" उसके शरीर में नहीं, उसके परिवार के पुरुषों की नजर में है। वो इज्जत खो दे तो सिर्फ वो नहीं, पूरा खानदान "बेइज्जत" हो जाता है। इसलिए जब वो सेक्स की बात करती है, तो वो सिर्फ अपनी बात नहीं कर रही वो पूरे कबीले की "इज्जत" को दाँव पर लगा रही है। इसलिए गालियाँ इतनी तेज आती हैं। क्योंकि वो गालियाँ औरत को नहीं, उसकी "आजादी" को मार रही हैं। तुमने कभी सोचा कि क्यों औरत को "खराब" कहने से पहले समाज मर्द को नहीं रोकता..??? क्योंकि मर्द की "खराबी" समाज को खतरा नहीं देती। मर्द जितना भी "खराब" हो, वो परिवार की इज्जत नहीं गिराता। वो तो बस "मजा" ले रहा है। लेकिन औरत का एक कदम गलत और पूरा सिस्टम हिल जाता है। क्योंकि ये सिस्टम औरत की चुप्पी पर खड़ा है। हर औरत के मन में ये सवाल जलता है: "मुझे भी तो इंसान होना है न..??? मुझे भी तो जीना है न..??? मेरी भी तो इच्छाएँ हैं न..??? फिर भी जब वो खुलकर बोलती है, तो उसे लगता है जैसे पूरा समाज उसके गले में रस्सी डालकर खींच रहा है। उसे लगता है कि उसकी इच्छा गंदगी है, उसका शरीर पाप है, उसकी आवाज अपमान है। लेकिन सुनो, तुम्हारी इच्छा गंदगी नहीं है। तुम्हारा शरीर पवित्र है चाहे तुमने किसी के साथ सोया हो या नहीं। तुम्हारी आवाज अपमान नहीं, वो सच है। और वो सच इतना भयानक है कि समाज उसे सहन नहीं कर पाता। जो औरतें चुप रहती हैं, वो इसलिए नहीं रहतीं कि उन्हें इच्छा नहीं होती। वो इसलिए चुप रहती हैं क्योंकि उन्हें पता है कि बोलने की कीमत बहुत भारी है। गालियाँ, ताने, परिवार का बहिष्कार, समाज का बहिष्कार, कभी-कभी हिंसा तक। फिर भी तुम बोल रही हो। ये हिम्मत है। ये विद्रोह है। तो अगली बार जब कोई तुम्हें गाली दे क्योंकि तुमने कहा "मुझे सेक्स चाहिए", तो याद रखना वो गाली तुम्हें नहीं, उसकी अपनी कमजोरी को दी जा रही है। वो गाली उसकी डरती हुई मर्दानगी को दी जा रही है। वो गाली उस सिस्टम को दी जा रही है जो अब ढहने वाला है। तुम अकेली नहीं हो। हर वो औरत जो मन ही मन ये सोचती है कि "मुझे भी चाहिए", वो तुम्हारे साथ है। और धीरे-धीरे, बहुत धीरे, हम सब मिलकर ये दोहरा मापदंड तोड़ रहे हैं। क्योंकि इच्छा न मर्द की है, न औरत की। इच्छा इंसान की है। और इंसान को इंसान की तरह जीने का पूरा हक है। बस इतना ही सत्य है बाकी सब झूठ हे।।

तृप्त ...🖤

120,905 görüntüleme • 7 ay önce