Video yükleniyor...

Video Yüklenemedi

Ana Sayfaya Dön

प्रेम कर भिल्लासारखं बाणावरती खोचलेलं मातीमध्ये उगवूनसुद्धा मेघापर्यंत पोचलेलं - कुसुमाग्रज ❤️

11,964 görüntüleme • 1 ay önce •via X (Twitter)

0 Yorum

Yorum bulunmuyor

Orijinal gönderinin yorumları burada görünecek

Benzer Videolar

महिलाएं एक संभोग के बाद तुरंत दूसरे के लिए तैयार हो सकती हैं, इसी कारण वेश्यावृत्ति जैसी प्रथाएँ सदियों से अस्तित्व में हैं। वहीं पुरुष के लिए दो संभोगों के बीच एक निश्चित अंतराल आवश्यक होता है। पहली बार के बाद वह तुरंत महिला से अलग हो जाता है और अक्सर सोने की इच्छा करता है — यह उसकी प्रकृति है। 😴 महिला की प्रवृत्ति इससे बिलकुल अलग होती है। वह संभोग के तुरंत बाद साथी से ऐसी बातें सुनना चाहती है जो उसे संतुष्टि और आनंद दें। 💖 अक्सर महिलाएं यह नहीं समझ पातीं कि पुरुष प्रेम के तुरंत बाद फिर से वही जुड़ाव महसूस नहीं कर सकता। पुरुष युद्ध की समाप्ति के बाद प्रेम की इच्छा रखता है। उसका मूल स्वभाव शिकारी जैसा होता है। 🏹 सभ्यता की चादर में उसकी इस प्रवृत्ति को ढक दिया जाता है, पर इसका अस्तित्व बना रहता है। इतिहास में क्रूर माने जाने वाले तानाशाहों की जीवन शैली भी कुछ ऐसी ही थी। उदाहरण के लिए, हिटलर, जिसने हजारों लोगों की जान ली, अपने प्रेमिका के पास आकर कोमल और प्रेमपूर्ण हो जाता था। उसकी प्रेमिका के साथ बिताए हुए पलों की याद में उसके आँसू बहते थे। 😢 अशोक, जिसने कलिंग युद्ध में भारी विनाश देखा, बाद में प्रेम और करुणा की ओर मुड़ गया। यही प्रेम और पश्चाताप उसे बौद्ध धर्म की ओर खींच ले गया, और आज अशोक और बौद्ध धर्म को एक-दूसरे से अलग करना कठिन है। नेपोलियन बोनापार्ट भी अपने युद्ध के कवच को उतारकर अपनी प्रेयसी के प्यार में डूब जाता था। युद्ध में जितना वह योद्धा था, उतना ही प्रेम में समर्पित। 🛡️❤️ सामान्य पुरुष, इतनी गहराई से प्रेम या इतनी घृणा के साथ युद्ध नहीं कर सकता। उसके लिए संभोग कुछ मिनटों का खेल मात्र है, जो उसे वास्तविक संतुष्टि नहीं दे पाता। 😕 असंतोष की यह भावना कभी-कभी उसे नए साथी की तलाश में ले जाती है। ऐसे समाज में जहाँ बंधन कमजोर होते हैं, वहाँ यह बदलाव जल्दी हो सकता है। लेकिन बार-बार साथी बदलने से न तो मानसिक संतोष मिलता है और न ही परिस्थिति में कोई बदलाव। पुरुष तब तक सच्चे प्रेम में सफल नहीं हो सकता, जब तक वह अपनी आंतरिक प्रवृत्तियों को बाहर निकालने का रास्ता नहीं ढूंढता। इसी कारण, महिलाएं अक्सर उन पुरुषों की ओर आकर्षित होती हैं जो बागी और स्वतंत्र होते हैं। 😏 यही कारण है कि बिंदास और बिगड़े हुए लड़के अक्सर समर्पित प्रेमिकाएँ पा लेते हैं, जबकि सभ्य और संजीदा पुरुष पीछे रह जाते हैं। हालाँकि, यह केवल एक दृष्टिकोण है। हर व्यक्ति की प्रेम और आकर्षण की अपनी परिभाषा होती है, और सभी की अपनी पसंद होती है। 🌸💖 आखिर में, यह कहना उचित है कि पुरुष और महिला दोनों के संभोग और प्रेम की अपनी विशेषताएं होती हैं, लेकिन हर व्यक्ति के अपने विचार और मूल्य भी होते हैं। ✨
0:35

Sensitive content

महिलाएं एक संभोग के बाद तुरंत दूसरे के लिए तैयार हो सकती हैं, इसी कारण वेश्यावृत्ति जैसी प्रथाएँ सदियों से अस्तित्व में हैं। वहीं पुरुष के लिए दो संभोगों के बीच एक निश्चित अंतराल आवश्यक होता है। पहली बार के बाद वह तुरंत महिला से अलग हो जाता है और अक्सर सोने की इच्छा करता है — यह उसकी प्रकृति है। 😴 महिला की प्रवृत्ति इससे बिलकुल अलग होती है। वह संभोग के तुरंत बाद साथी से ऐसी बातें सुनना चाहती है जो उसे संतुष्टि और आनंद दें। 💖 अक्सर महिलाएं यह नहीं समझ पातीं कि पुरुष प्रेम के तुरंत बाद फिर से वही जुड़ाव महसूस नहीं कर सकता। पुरुष युद्ध की समाप्ति के बाद प्रेम की इच्छा रखता है। उसका मूल स्वभाव शिकारी जैसा होता है। 🏹 सभ्यता की चादर में उसकी इस प्रवृत्ति को ढक दिया जाता है, पर इसका अस्तित्व बना रहता है। इतिहास में क्रूर माने जाने वाले तानाशाहों की जीवन शैली भी कुछ ऐसी ही थी। उदाहरण के लिए, हिटलर, जिसने हजारों लोगों की जान ली, अपने प्रेमिका के पास आकर कोमल और प्रेमपूर्ण हो जाता था। उसकी प्रेमिका के साथ बिताए हुए पलों की याद में उसके आँसू बहते थे। 😢 अशोक, जिसने कलिंग युद्ध में भारी विनाश देखा, बाद में प्रेम और करुणा की ओर मुड़ गया। यही प्रेम और पश्चाताप उसे बौद्ध धर्म की ओर खींच ले गया, और आज अशोक और बौद्ध धर्म को एक-दूसरे से अलग करना कठिन है। नेपोलियन बोनापार्ट भी अपने युद्ध के कवच को उतारकर अपनी प्रेयसी के प्यार में डूब जाता था। युद्ध में जितना वह योद्धा था, उतना ही प्रेम में समर्पित। 🛡️❤️ सामान्य पुरुष, इतनी गहराई से प्रेम या इतनी घृणा के साथ युद्ध नहीं कर सकता। उसके लिए संभोग कुछ मिनटों का खेल मात्र है, जो उसे वास्तविक संतुष्टि नहीं दे पाता। 😕 असंतोष की यह भावना कभी-कभी उसे नए साथी की तलाश में ले जाती है। ऐसे समाज में जहाँ बंधन कमजोर होते हैं, वहाँ यह बदलाव जल्दी हो सकता है। लेकिन बार-बार साथी बदलने से न तो मानसिक संतोष मिलता है और न ही परिस्थिति में कोई बदलाव। पुरुष तब तक सच्चे प्रेम में सफल नहीं हो सकता, जब तक वह अपनी आंतरिक प्रवृत्तियों को बाहर निकालने का रास्ता नहीं ढूंढता। इसी कारण, महिलाएं अक्सर उन पुरुषों की ओर आकर्षित होती हैं जो बागी और स्वतंत्र होते हैं। 😏 यही कारण है कि बिंदास और बिगड़े हुए लड़के अक्सर समर्पित प्रेमिकाएँ पा लेते हैं, जबकि सभ्य और संजीदा पुरुष पीछे रह जाते हैं। हालाँकि, यह केवल एक दृष्टिकोण है। हर व्यक्ति की प्रेम और आकर्षण की अपनी परिभाषा होती है, और सभी की अपनी पसंद होती है। 🌸💖 आखिर में, यह कहना उचित है कि पुरुष और महिला दोनों के संभोग और प्रेम की अपनी विशेषताएं होती हैं, लेकिन हर व्यक्ति के अपने विचार और मूल्य भी होते हैं। ✨

तृप्त ...🖤

634,750 görüntüleme • 1 yıl önce

जिस माँ ने हर परिस्थिति में, हर मुश्किल घड़ी में अपने बेटे का हाथ थामे रखा, उसके हौसले को कभी टूटने नहीं दिया, आज वही माँ अपने बेटे की सफलता देखकर सबसे ज्यादा गर्व और खुशी महसूस कर रही है। ये सिर्फ एक बेटे की जीत नहीं है, बल्कि उस माँ के त्याग, विश्वास और आशीर्वाद की भी जीत है जिसने हर कदम पर उसे संभाला, प्रेरित किया और आगे बढ़ने का साहस दिया। आज विनोद जाखड़ जी ने अपनी माता जी का सिर चूमकर उनके प्रति अपना सम्मान, प्रेम और समर्पण व्यक्त किया, मानो इस एक पल में वर्षों का संघर्ष, आशीर्वाद और ममता समा गया हो। सच में, हर बड़ी सफलता के पीछे एक माँ की दुआएँ और उसका अटूट विश्वास खड़ा होता है❤️ VINOD JAKHAR

Mukesh pareek

10,663 görüntüleme • 6 ay önce

सभी स्त्री पुरुष को समर्पित 🙏🏻 जब तुम उस स्त्री को प्यार करना जो पहले प्रेम में छली गई थी तो पहले ये जान लेना ये देह एक यातना घर होगा ये समझ लेना के बरसों से बारिश से नही भीगी होगी उसकी देह न उठती होगी कोई महक लोबान की की तुम अकुलाहट से बेसब्र कहीं से उतार दो उसके कपड़े तुम समझना के उसने काली दीवारों के पार कितने ही वक़्त को काटा होगा उसके हिस्से की सुबहें उसकी शामों का सूरज उसकी नाभि के गढ्ढे में गुम हुआ पड़ा है क्या तुम एहतियात बरत सकते हो उसे प्यार करने का? अगर ना तो मुड़ जाओ किसी रास्ते अगर हाँ तो अपनी हथेलियों को दूब से धोकर उनकी कोमलता और रंग लाना अपने कंधे को सतर सीधा रखना के वो उसकी ओट से देख सके आंख भर उजाला अपनी आंख में भर लेना तमाम नदियों के जल के उसकी कहानी को सुनने का कलेजा रखना अपनी छाती में किसी पिता की तरह सुकून वाली धड़कनें उतार लेना के वो सुन सके इंसान को और कर सके यकीन प्रेम में छली औरत को प्यार करना आग से जले को फिर आग के सम्मुख रखना है उसे भरोसे की कहानी मत सुनाना उसकी सुनना उसकी हाथ की तपिश में आज भी गर्म है कोई आँच किसी ने उन हथेलियों से होंठ लगा अपनी प्यास बुझाई थी किसी ने उसके सिरहाने गुलाबी पंखुरियाँ बिछाई थी किसी रात के प्रेमी ने देह की सभी हदें तोड़ते उसके गाल चूमे थे कान की लौ पर दांत धसाते किसी ने कहा था तुम दुनियाँ की सबसे खूबसूरत औरत हो पर दुनियाँ और भी खूबसूरत औरतों से भरी है उसकी लस्त देह से उस प्रेमी ने खींच ली थी अपनी शर्ट उसके बाद और उसके भी बाद उस विक्षिप्त प्रेमिका ने न जाने कितने गरम झरनों में नहा कर साफ की अपनी देह अपनी आंखों को अंतहीन गढ्ढों के सुपुर्द कर दिया अपनी कलाई पर फेरती रही कोई धारदार चाकू पुरानी कहानी में बेतरह छली गई प्रेमिकाएं गीली लकड़ी की तरह होती हैं......... ❤️❤️

तृप्त ...🖤

77,593 görüntüleme • 2 yıl önce

हर बार जब किसी महिला का उत्पीड़न होता है या किसी दलित का शोषण होता है या किसी मुसलमान के ख़िलाफ़ हिंसा होती है तब हम सब सवाल पूछते हैं ‘हम कहाँ जा रहे हैं, हम क्या बन गये हैं’ पर आज ऐसे सवाल बेमानी हैं आज सवाल यह है कि इस देश को यहाँ कौन लेकर आया? कौन ले आया है इस देश को ऐसे मुक़ाम पर जहां ट्रेन में यात्रा कर रहे एक बुजुर्ग आदमी को उसका धर्म देख कर पीटा जाता है किसने भड़काई यह नफ़रत कि सिर्फ़ शक के आधार पर एक आदमी को मार मार कर मौत के घाट उतार दिया जाता है यह इक्का दुक्का होने वाले मामले नहीं हैं. यह धर्म और जाति के खिलाफ नफरत के बोए बीज हैं जो अब पनप रहे हैं. आख़िर क्यों कुछ मनबढ़ लफ़ंगों को यह लगता है कि वो कुछ भी कर लें पर वो बच जाएँगे? फिर चाहे वो लड़कियों का शोषण हो, दलितों पर अत्याचार हो या मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा यह कौन स्वयंभू ठेकेदार हैं - धर्म के, समाज के, क़ानून के जो लोगों को सबक़ सिखाते हुए घूमते हैं? असलियत यह है कि ऐसे गुंडों को हिम्मत आज की सरकार, नफ़रत की राजनीति, ज़हर उगलने वाले सत्ताधीश दे रहे हैं. खुलेआम संरक्षण देने वाले राजनेता इसके लिए ज़िम्मेदार हैं BJP की नफरत की राजनीति की वजह से आज देश में ऐसे हालात हैं नफ़रत के इस पागलपन का गुनहगार इस देश का मीडिया भी है, जो हैवानियत और दरिन्दगी में भी धर्म ढूँढता है जो चुनावी मंच से मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाते, मंगलसूत्र और मुजरे जैसे शब्द बोलते नरेंद्र मोदी को आईना नहीं दिखाता वरना जिस पुलिस को देख दुर्दांत अपराधियों की घिग्घी बंध जाती, इन उद्रवियों की इतनी हिम्मत है कि वो उनपर पत्थर फेंक रहे हैं, खुलेआम धमका रहे हैं. यह BJP की वजह से है. इन्हें कानून का डर नहीं, पुलिस प्रशासन का डर नहीं. वो जानते हैं उनको कुछ नहीं होगा दोषी आप भी हैं, क्योंकि आप चुप रहते हैं. पर यह नफ़रत की आग से तो बचेंगे आप भी नहीं इसलिए आवाज़ उठाइए, ग़लत को ग़लत कहिए, हिंसा का विरोध कीजिए, अन्याय के मूकदर्शक मत बने रहिए इस देश की मूल आत्मा को पहचानिए, अपने धर्म को पहचानिए - अपने धर्म के रक्षक बनिये - वो धर्म जो प्रेम, न्याय, शांति और सौहार्द सिखाता है क्योंकि जो हिंसक है, वो हिंदू नहीं है कुछ भी हो जाए हम इस देश के एकता के सूत्र को टूटने नहीं देंगे. ये मेरे देश की तासीर नहीं है. ये गांधी का देश है. ये प्रेम, सदभाव, अमन, चैन और भाईचारे का देश है. ये गंगा जमुनी तहज़ीब का देश है ये देश BJP की नफरत पर नहीं, कांग्रेस की मोहब्बत की राह पर चलेगा इस सियाह रात के बाद रोशनी में नहाया एक नया सूरज उभरेगा - नफरत हार जाएगी, मोहब्बत जीतेगी जय हिन्द ❤️🇮🇳

Supriya Shrinate

93,572 görüntüleme • 2 yıl önce

तीन दिन से सोशल मीडिया के माध्यम से हज़ारों श्रोताओं की शिकायतें लगातार मिल रही हैं कि वे इंदौर के अभय प्रशाल स्टेडियम में आयोजित मेरे कार्यक्रम में प्रवेश नहीं पा सके। आठ हज़ार की क्षमता वाले स्टेडियम में पहले ही दस हज़ार लोग घुस चुके थे और लगभग उतने ही बाहर आठ बड़े-बडे स्क्रीनों पर कवि-सम्मेलन को देख-सुन रहे थे। भारत-पाक क्रिकेट मैच के समय इतने लोगों का आगमन आयोजकों की आशा के अनुसार नहीं था इसलिए भी आप सबको कष्ट हुआ। मेरे कई निजी मित्र, प्रशासनिक अधिकारी-गण भी बाहर ही रह गए। अंदर भयानक उमस थी। मेरी स्वयं की तबीयत बार-बार बिगड़ रही थी किंतु दस हज़ार लोग आशा लगाए सामने थे तो दो घंटे से अधिक काव्यपाठ किया। आप सबसे क्षमा चाहता हूँ कि बाहर रह गए आप सबकी वाक्-सेवा ठीक से नहीं कर पाया। प्रिय अनुज विधायक गोलू शुक्ला व आत्मीय कैलाश भैया ने कहा है कि शीघ्र ही तीन-चार दिवसीय “अपने अपने राम” व “अपने अपने श्याम” का सुयोग बनेगा। तब आप सबको स्थान पाने का कष्ट न हो, यह मैं स्वयं सुनिश्चित करूँगा । मुझे अत्यंत प्रेम करने वाले आप सबसे एक बार फिर क्षमा माँगता हूँ । जय जय सियाराम ❤️🇮🇳🙏

Dr Kumar Vishvas

38,485 görüntüleme • 1 yıl önce

आपसे चार्ली चैप्लिन मिलना चाहते है बापू.. - कौन चार्ली चैप्लिन.. ?? गांधी फिल्में नही देखते थे। तो किसी ने बताया - जोकर है एक!!! दूसरे ने टोका - नही बापू, एक्टर है, बहुत फेमस है... - ठीक है। मैं अभी नही मिलना चाहता... ●● गोलमेज कॉन्फ्रेंस अटैंड करने को बापू लन्दन में थे। तमाम मुद्दे, राजनीतिक सवाल, दिमाग मे उलझ रहे थे। ऊपर से प्रेस वालो, सेलेब्रिटियों, पॉलिटिशियन्स का तांता लगा हुआ था। कोई "मैडम तुसाड म्यूजियम" वाले बुला रहे थे। अब पता नही कि ये मैडम तुसाद कौन है? कोई एक गौहर जान भी है, कहते है कि मशहूर गायिका है। मिलने को आतुर है- एक मुलाकात के लिए 12000 रुपये दान देने की चिट्ठी लिखी है। बस, वो अपना गाना सुनाना चाहती है गांधी को.. औऱ गांधी चाहते थे कि समय निकालकर लंकाशायर जायें। वहां के मिल मजदूरों से मिलें। चार्ली वाली बात आई गयी हो गई। ●● किंग्सले हॉल में उनके कार्यक्रम के आयोजक विलियम रिन्ड ने पूछा- आप चार्ली चैपलिन को मिलने समय नही दे रहे ? गांधी ने अपनी असमर्थता जताई। "आपको उससे मिलना चाहिए। वो दुनिया का सबसे मशहूर बन्दा है, ऑफकोर्स आपको छोड़कर.. रिन्ड हंसे। और फिर गम्भीरता से कहा- वो आपके उद्देश्य से सहानुभूति रखता है।उसने गरीबी देखी है, बड़े क्रांतिकारी विचार रखता है। उससे मिलना, आपके कॉज में सहायक होगा.. गांधी ने सर हिलाया ठीक है फिर.. ●● चार्ल्स स्पेन्सर चैपलिन, नाइट कमांडर ऑफ द मोस्ट एक्सीलेंट ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश एम्पायर, उर्फ चार्ली चैप्लिन (KBE)... एपोइंटमेंट लेकर, अपने पैरों चलकर उस फकीर से, जिसे 1982 में पिक्चर रिलीज होने के पहले कोई जानता नही था, मिलने आये। अपनी ऑटोबायोग्राफी में वे याद करते हैं, ईस्ट इंडिया डॉक रोड में, स्लम एरिया का वह घर, जहां गांधी ठहरे थे। और गांधी से मिलने के लिए सीढियां चढ़ते समय अपनी नर्वसनेस... वे गांधी से मिलकर क्या कहेंगे?? एक्टर थे, तो मन ही मन अपनी ओपनिंग लाइनें दोहरा रहे थे- "मि गांधी, मैं आपके देश और आपके लोगो की आजादी का समर्थक हूँ" ●● मुलाकात अच्छी हुई। ऑटोबायोग्राफी में चार्ली लिखते है- चरखे को देखकर मैनें पूछ ही लिया, मि. गांधी, मैं आपके सारे विचारों से सहमत हूँ, लेकिन आप मशीनों का विरोध क्यो करते हैं? गांधी बोले- चरखा चलाने का मतलब, सारी तकनीकी का विरोध नही। ये उससे जुड़े आर्थिक और राजनीतिक तंत्र का विरोध है। शोषण की व्यवस्था का विरोध है। गरीबो से समेटकर, चंद जेबें भरने का विरोध है। इंगलैंड ने भारत के सारे उद्योग नष्ट कर, यहां मशीनों से प्रोडक्शन शुरू किया है। ताकि यहां माल बनाकर भारतीयों को बेच सकें। वहां का धन, यहां लाया जा सके। हम मशीन से बने कपड़े का नही, उस शोषण के फ़लसफ़े का विरोध करते हैं। इसलिए चरखे से भारतीय खुद कपड़ा बनाये, खुद का उत्पाद पहने, चरखा चलाकर इसका संकेत देता हूँ। ●● बातचीत के बाद दोनो ने साथ साथ प्रार्थना की। गांधी ने अपने तरीके से, चार्ली ने अपने तरीके से.. गांधी का भजन जरा लम्बा चला, तो चार्ली भी सुनते रहे। फिर दोनो ने भोजन किया। ऑटोबायोग्राफी में चार्ली ने "मोस्ट ब्रिलिएंट मैन ही एवर मेट" और "वन ऑफ मोस्ट गॉड लाइक एज वेल" लिखकर गांधी से मुलाकात के अध्याय को समाप्त किया। ●● प्रेस और मीडिया से, 45- बेक्टन रोड के दोनो फ्लोर पैक थे। हजारों लंदनवासी , सड़क पर इकट्ठे थे। गांधी और चार्ली की मुलाकात का गवाह बनने के लिए.. वो 2 सितंबर 1931 की शाम थी। और 2024 की भी एक शाम है, जब पूड़ीपैक और 500 रुपये देकर, टेक्टरों से भीड़ इकट्ठा करवाने वाला नशेड़ी जोकर, गांधी की गुमनामी पर दया बरसा रहा है। ●● उसके जैसे ही एक सनकी, आत्ममुग्ध, बौने, अवतारी तानाशाह का मजाक उड़ाते हुए, चार्ली ने अपनी सर्वकालिक महान क्लासिक " द ग्रेट डिक्टेटर" बनाई। और उसके अंत में अपना सन्देश दिया। चैप्लिन शांति का, अहिंसा का प्रेम, साहचर्य, की बात करते हैं। जब वे गरिमा औऱ मानवता को लालच, नफरत, अहंकार और मशीनो से ज्यादा जरूरी बताते है.. तो उनकी बात में गांधी से मुलाकात की छाप दिखती है। और चैप्लिन की जुबान से जब गांधी बोलते दिखाई देते हैं, तब आपका, मेरा, और हिंदुस्तान का सीना.. गर्व से दोगुना हो जाता है। ❤️🙏

Manish Singh

75,767 görüntüleme • 2 yıl önce