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"मंदिर में फोटो खींचना मना है !" अब समझ आया है कि मंदिरों में यह क्यों लिखा रहता है !

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नर्मदा किनारे बड़ा दृश्य था, मंत्री जी पसीना बहा रहे थे, फावड़ा चला रहे थे, जैसे सदियों की गंदगी अकेले ही साफ कर देंगे। उनके पीछे जेसीबी मशीन खड़ी थी शांत, सक्षम और थोड़ी संकोची क्योंकि असली काम करने वालों को अक्सर फोटो में जगह कम मिलती है। जेसीबी मशीन सोच रही होगी “मुझे बुलाया क्यों गया? अगर सफाई करनी है तो मैं आधे घंटे में कर दूं, अगर फोटो खिंचवानी है तो मैं क्या करूं?” लेकिन मशीनों को यह समझ नहीं आता कि असली काम कई बार मिट्टी हटाना नहीं, छवि बनाना होता है। मंत्री जी का पसीना सच्चा हो सकता है, नीयत भी अच्छी हो सकती है, पर सवाल यह है कि जब जेसीबी मशीन मौजूद है, तो फावड़े की जरूरत क्यों पड़ी? जवाब शायद काम में नहीं, कैमरे में छिपा है। यह वही देश है जहां काम करने से ज्यादा जरूरी है, काम करते हुए दिखना। और नर्मदा किनारे आज यही सबसे साफ दिख रहा था।

Anurag Dwary

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