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ये वो पहाड़ है जहां “जंग-ए-बद्र के वक़्त से फ़रिश्ते उतरे थे।

25,853 次观看 • 5 个月前 •via X (Twitter)

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अविनाश जैसे बौने बुद्धिजीवी साहिर के पीछे ना छुपें, इस लिए, साहिर का ही उत्तर, साहिर के शब्दों में। हम अम्न चाहते हैं मगर ज़ुल्म के ख़िलाफ़ गर जंग लाज़मी है तो फिर जंग ही सही ज़ालिम को जो न रोके वो शामिल है ज़ुल्म में क़ातिल को जो न टोके वो क़ातिल के साथ है हम सर-ब-कफ़ उठे हैं कि हक़ फ़तह-याब हो कह दो उसे जो लश्कर-ए-बातिल के साथ है इस ढंग पर है ज़ोर तो ये ढंग ही सही ज़ालिम की कोई ज़ात न मज़हब न कोई क़ौम ज़ालिम के लब पे ज़िक्र भी इन का गुनाह है फलती नहीं है शाख़-ए-सितम इस ज़मीन पर तारीख़ जानती है ज़माना गवाह है कुछ कोर-बातिनों की नज़र तंग ही सही ये ज़र की जंग है न ज़मीनों की जंग है ये जंग है बक़ा के उसूलों के वास्ते जो ख़ून हम ने नज़्र दिया है ज़मीन को वो ख़ून है गुलाब के फूलों के वास्ते फूटेगी सुब्ह-ए-अम्न लहू-रंग ही सही - साहिर लुधियानवी (सर-ब-कफ़: हाथ में सर लिए, हक़ फ़तह-याब: सच पाने वाला; लश्कर -ए -बातिल - झूठ की फौज, कोर बातिनों - मतांध (fanatics), बका- अस्तित्व )

saket साकेत ಸಾಕೇತ್ 🇮🇳

43,239 次观看 • 1 年前