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यतो धर्मस्ततो जयः

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धार की ऐतिहासिक भोजशाला में वर्षों के संघर्ष के बाद फिर गूंजी मां सरस्वती की वंदना! वर्ष 1997 में तुष्टिकरण की राजनीति ने हिंदुओं से पूजा का अधिकार छीन लिया। 2003 में बसंत पंचमी के पावन अवसर पर भोजशाला में पूजा करने पहुंचे श्रद्धालुओं पर लाठियां बरसाई गईं। तत्कालिन दिग्विजय सिंह सरकार ने अत्याचार की सारी सीमाएं लांघ दी, लेकिन हिंदुओं की आस्था नहीं टूटी। कांग्रेस की साजिशें और लाठियां भी उन श्रद्धालुओं के संघर्ष को रोक नहीं सकी। 2024 के ASI सर्वे और 2026 के हाईकोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने भोजशाला को मां वाग्देवी यानी, मां सरस्वती का मंदिर माना। और फिर हिंदू धर्म के लोगों को मिली पूजा-पाठ करने की इजाजत। सही कहा गया है— सत्य और धर्म को दबाया नहीं जा सकता... यतो धर्मस्ततो जयः 🚩 देखिए पूरा वीडियो...

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हमारे यहां शास्त्रों में कहा गया है- यतो धर्मस्ततो जयः! यानी, जय का शक्ति का मूल धर्म है। धर्म यानी, Duty, Justice, धर्म यानी, स्वभाव, सम्भाव, धर्म यानी, संवाद, संवेदना। और यही Nation First की भावना में भी समाहित है। भारत अपनी पावर को इसी लेंस से देखता है, इसी तराजू पर तौलता है। भारत की एक और विशेषता है, और अब तो दुनिया ने भी मान लिया है। हम किसी क्षणिक घटना पर उतावले होने वाले देश नहीं हैं। हम वो हैं, जिसने विकास और विनाश देखा भी है, झेला भी है। हम वो देश हैं, जिसके जेहन में युगों की मेमोरी चिप लगी हुई है। इसलिए भारत जो कर रहा है- वह आने वाले 1,000 वर्ष का Future लिखने वाला है, और यही दुनिया के लिए सबसे बड़ी भारत की गारंटी है। भारत, Fast-Growing Economy भी है और एक Credible Economy भी है, और भारत rising power के साथ-साथ reliable power है। - पीएम श्री Narendra Modi पूरा वीडियो देखें:

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🚨 Sabarimala Reference Hearing – Day 9 “All religions are not the same, Hindu scriptures do not threaten non-believers with hell” — सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता आदरणीय अश्विनी उपाध्याय “सत्यमेव जयते” — सत्य की ही जीत होती है “यतो धर्मस्ततो जयः” — जहाँ धर्म है, वहीं विजय है मेरे लॉर्ड्स के समक्ष रखे गए इस तर्क को सरल भाषा में समझिए: भारत का संविधान सिर्फ अधिकार देने का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि देश की एकता, संतुलन और वैज्ञानिक सोच को बनाए रखने का मार्गदर्शक है। अनुच्छेद 25 हर व्यक्ति को धर्म मानने, पालन करने और प्रचार करने का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार पूरी तरह खुला नहीं है। यह सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य, नैतिकता और अन्य संवैधानिक प्रावधानों के अधीन है। अनुच्छेद 26 धार्मिक संस्थाओं को अपने धार्मिक मामलों को चलाने का अधिकार देता है, लेकिन यह भी उन्हीं सीमाओं में बंधा हुआ है और अनुच्छेद 25 से बड़ा नहीं हो सकता। मुख्य बात यह है कि अनुच्छेद 25 एक सामान्य नियम है और अनुच्छेद 26 उसी का एक हिस्सा। कोई भी हिस्सा पूरे नियम से बड़ा नहीं हो सकता। सीधी बात: धर्म मानना आपका अधिकार है, लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया जा सकता जिससे समाज में तनाव, भ्रम या विभाजन पैदा हो। दुनिया के कई देशों में भी धर्म के प्रचार पर सीमाएं हैं। हर जगह यह अधिकार पूरी तरह से खुला नहीं होता। अगर “धर्म प्रचार” बिना संतुलन के होगा, तो इससे समाज में टकराव, अंधविश्वास और विभाजन बढ़ सकता है। हमारा लक्ष्य एक ऐसा भारत होना चाहिए जो एकजुट हो, वैज्ञानिक सोच पर चले और संविधान के मूल उद्देश्यों को पूरा करे। अधिकार जरूरी हैं, लेकिन सीमाओं के भीतर। धर्म व्यक्तिगत आस्था है, राष्ट्र की एकता सबसे ऊपर है। जहाँ संतुलन है, वहीं संविधान जीवित है। Ashwini Upadhyay

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महाराष्ट्र के 19 वर्षीय युवा वैदिक साधक श्री देवव्रत महेश रेखे जी ने अद्वितीय साधना और अद्भुत स्मरण शक्ति से 2000 वैदिक मंत्रों को कंठस्थ करते हुए जो अभूतपूर्व उपलब्धि अर्जित की है, वह पूरे आध्यात्मिक जगत के लिए प्रेरणा का नव-दीप है। शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा के 'दण्डकर्म पारायणम्' को 50 दिनों तक अखंड, शुद्ध और पूर्ण अनुशासन के साथ संपन्न करना, हमारी प्राचीन गुरु-परंपरा के गौरव का पुनर्जागरण है। मेरे लिए विशेष गर्व का विषय है कि यह वैदिक अनुष्ठान पवित्र काशी की ही दिव्य धरा पर सम्पन्न हुआ। उनके परिवार, आचार्यों, संत-मनीषियों और उन सभी संस्थाओं का हृदय से अभिनंदन, जिनके सहयोग से यह तपस्या सिद्धि को प्राप्त हुई। देवव्रत जी, आपकी यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का प्रकाश-स्तंभ बने, ऐसी मंगलकामना के साथ हार्दिक बधाई।

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