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वाह महाराज! आपको देखकर तो गिरगिट भी शर्मा जाए। वैसे, रंग बदलना तो आपके खून में है।

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भारत में जैसे जाति जीवन के अंत तक आपका पीछा नहीं छोड़ती उसी तरह रंगभेद भी बैताल के जैसे आपका पीछा नहीं छोड़ता। अख़बार के इश्तिहार में “ गोरी लड़की चाहिए” से ले कर “ हल्दी बेसन लगाओ रंग निखरेगा” कहने तक। बाहरी तो छोड़िए आपके अपने जानने वाले भी आपके मुँह पर कह देते है “ कटिंग तो बढ़िया है रंग थोड़ा “साफ़” होता तो बेहतर होता”! वो आपके सामने ऐसे बोलते है मानों आप वहाँ खड़े नहीं हो, आपके सामने ही आपको इनविज़िबलाइज़ कर दिया जाता है! ये सिलसिला बचपन से शुरू होता है और बाल अवस्था में मन पर गहरा प्रभाव भी छोड़ता है। आपके कॉन्फिडेंस को हिला कर रख देता है और उस कॉन्फिडेंस को दुबारा ज़िंदा कर पाना बहुत मुश्किल होता है। कई बार आपको ये भी कहा जाता है “अरे काली नहीं है साँवली है” तो कोई कहेगा “ गेहुआँ रंग है” , मानो आपको सांत्वना दी जा रही हो! और ये बात भी हमें समझनी होगी की इसके शिकार सिर्फ़ महिलायें नहीं पुरुष भी होते हैं। काली , कल्लू , कलुआ, कालिया , कल्लो, कारी ये सारी शब्दावली रंग देख कर ही तो गढ़ी और थोपी जाती है। इसलिए इन सबसे परेशान ना हो कर जीवन में आगे बढ़ते जाइए और जो ये शब्दावली आपके ऊपर थोप रहे थे वो बस पीछे छूटते जायेंगे। मुश्किल है बचपन से लादी गई सोंच को झटक कर फेंक देना लेकिन जीवन सुकून से आत्मसम्मान के साथ जीना है तो झटकना तो पड़ेगा।

Priyanka Bharti

59,160 Aufrufe • vor 10 Monaten