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गरीब का दाना फ्री में खाना, फिर क्या वापस आना है। सोचिए गए हैं मातम में, खा रहे हैं फ्री का मटर। जो नीला कुर्ता वाला खुद को कैलाश का सपोर्टर बताकर मित्र अनुराग से बकैती बतिया रहा था, नंबरी मुफ्तखोर निकला।उसने तो कई फलियां उठाई।

156,987 次观看 • 8 个月前 •via X (Twitter)

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🚨 सौरव दास जी का नया अकाउंटिंग सिस्टम सुनो 😂 पत्रकार: भैया प्रोटेस्ट और ट्रैवल के पैसे कहाँ से आए? सौरव: दुनिया भर से लोग खाना भेज रहे थे… लिफाफों में डोनेशन आ रहा था। पत्रकार: पैसे किसके अकाउंट में गए? कौन हैंडल कर रहा था? सौरव: सब ऑटोमैटिक हो रहा था यार… मैं तो इनवॉल्व ही नहीं था। मतलब अब फंडिंग भी AI से हो रही थी। लिफाफे खुद आ रहे हैं, खाना खुद पहुँच रहा है, हिसाब-किताब खुद हो रहा था… सौरव भाई सिर्फ बैठे हैं और “मैं नहीं जानता” वाला लुक दे रहे हैं। सरकार से अकाउंटेबिलिटी माँगने वाले खुद अकाउंटेबिलिटी से ऐसे भाग रहे हैं जैसे एग्जाम में कॉपी न देखने वाला बच्चा। अगला जवाब क्या होगा? “पैसे तो हवा में उड़-उड़ के आ रहे थे… मैंने तो सिर्फ साँस ली थी।” 🤣🤣🤣

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61,113 次观看 • 1 个月前

आख़िर उस फ़ाइल में ऐसा क्या था, जिसके लिए खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भागकर आना पड़ा और वह फ़ाइल अपने साथ लेकर चली गईं? अगर मामला मामूली था, तो इतनी हड़बड़ी क्यों? अगर सब कुछ साफ़ था, तो फ़ाइल वहीं छोड़ देने में डर किस बात का था? जो ममता बनर्जी हर मंच से “लोकतंत्र ख़तरे में है” का ढोल पीटती हैं, वही आज खुद क़ानून को हाथ में लेकर क्या संदेश दे रही हैं? अगर उन्हें आपत्ति थी, तो क़ानूनी रास्ता मौजूद था; लेकिन उन्होंने न क़ानून का सहारा लिया, न ही संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान किया। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है: आख़िर किसे बचाया जा रहा था? और किस सच्चाई को दबाया जा रहा था?

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संपत के इस्तीफ़े पर कल से देख रहा हूँ कुछ हुड्डा विरोधी खूब हिला रहे हैं। ज़रा संपत का इतिहास जान लो पहले, संपत सिंह कई बार इनेलो में मंत्री रह चुका है, यहाँ तक कि वित्त मंत्री भी रहा। जब पार्टी विपक्ष में रही तो नेता प्रतिपक्ष बनाया गया। फिर 2009 में जब लगा कि इनेलो खत्म हो गई है तो काँग्रेस में कूद गया। जब लगा काँग्रेस नहीं आएगी तो भाजपा में भागा। फिर जब काँग्रेस का माहौल दिखा तो किसान आंदोलन का बहाना बनाकर वापस काँग्रेस में आ गया। अब जब सरकार नहीं बनी तो इनेलो के ज़रिए अनौपचारिक रूप से भाजपा में ही जाना चाह रहा है। जब ये इनेलो छोड़कर आया था, तब भी इसका यही पत्र था, शब्द टू शब्द वही। क्या विचारधारा है संपत की? पैसा, पद और पावर? एक इंसान के विरोध में लोग इतने पागल हो गए हैं कि किसी का भी वैलिडेशन लेने को तैयार हैं।

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12,016 次观看 • 10 个月前

ये गोरखपुर की मनीषा पाण्डेय हैं। 2 वर्ष पहले इस लड़की का तीन बदमाशों ने फोन छीना था उसी समय फोन बचाने के चक्कर में हुई जद्दोजहद में इस बिटिया का हाथ और पैर टूट गए थे। आज तक बेचारी लड़की का पैर ठीक नहीं हो पाया है क्योंकि इसके पास इतना पैसा नहीं है कि प्राइवेट में इलाज करवा सके और सरकारी में कुछ हो नहीं रहा है। भाई Ravi Kishan जी आपके हिसाब। से अगर गोरखपुर स्पेन बन चुका है और हर सुविधा फ्री उपलब्ध है तो इस गरीब बेटी के पैर का इलाज करवा दो फ्री में। अगर बेटी के पैर का इलाज नहीं करवा पाए तो फिर आगामी भाषणों में आपके ऊपर ध्यान रखा जाएगा और हर तरीके से एक्पोज किया जाएगा।

विष्णु पाठक आजाद

97,388 次观看 • 25 天前